<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-20108582</id><updated>2011-12-03T07:44:49.897-05:00</updated><title type='text'>मनातलं सगळं</title><subtitle type='html'>सगळं मनातलंच!! मनापासून मनाला सांगितलेलं!!</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://meeakshay.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/20108582/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://meeakshay.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>Chakrapani</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06931612066464984955</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>24</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-20108582.post-7738619617430762122</id><published>2011-03-01T19:19:00.001-05:00</published><updated>2011-03-01T19:54:52.737-05:00</updated><title type='text'>बोलकढी</title><content type='html'>&lt;div class="content"&gt;      &lt;p&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span&gt;धक्के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बसतच&lt;/span&gt; &lt;span&gt;असतात&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आयुष्यात&lt;/span&gt;. &lt;span&gt;या&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;त्या&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कारणाने&lt;/span&gt;. &lt;span&gt;शारीरिक&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;मानसिक&lt;/span&gt;,  &lt;span&gt;सांस्कृतिक&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;सामाजिक&lt;/span&gt; - &lt;span&gt;कसेही&lt;/span&gt;! &lt;span&gt;कॅलिफोर्नियातल्या&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दुकानात&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चितळ्यांची&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;बाकरवडी&lt;/span&gt; '&lt;span&gt;क्रिस्पी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;स्पायसी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;स्प्रिंग&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रोल्स&lt;/span&gt;' &lt;span&gt;म्हणून&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आणि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बेडेकरांची&lt;/span&gt; &lt;span&gt;थालीपीठ&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;भाजणी&lt;/span&gt; '&lt;span&gt;ठेपले&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आटा&lt;/span&gt;' &lt;span&gt;म्हणून&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ठेवलेली&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दिसली&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तेव्हा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बसलेला&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सांस्कृतिक&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;धक्का&lt;/span&gt;; &lt;span&gt;मिसळ&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;साबुदाणा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वडा&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;थालीपीठ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;यांचा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जोडीला&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दादरच्या&lt;/span&gt; &lt;span&gt;प्रकाशमध्ये&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;डोसा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;किंवा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तत्सम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दाक्षिणात्य&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पदार्थ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मेन्यूकार्डावर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दिसले&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तेव्हा&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;साक्षात&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;सिंहगडाच्या&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पायथ्याशी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चाललेल्या&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नंग्यानाचाची&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बातमी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वाचली&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तेव्हा&lt;/span&gt;,  &lt;span&gt;रायगडावरच्या&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दारूपार्टीची&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पेपरात&lt;/span&gt; &lt;span&gt;छापून&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आलेली&lt;/span&gt; &lt;span&gt;छायाचित्रे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पाहिली&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तेव्हा&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;बसलेला&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सामाजिक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;धक्का&lt;/span&gt; &lt;span&gt;इत्यादी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;इत्यादी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;इत्यादी&lt;/span&gt;. &lt;span&gt;त्यामुळे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;धक्क्यांची&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तशी&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;नवलाई&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उरलेली&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नाही&lt;/span&gt;. &lt;span&gt;मराठी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;माणसाला&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आणि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मराठी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मानसाला&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नाहीच&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नाही&lt;/span&gt;! &lt;span&gt;असले&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;कित्येक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;धक्के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पचवल्याचं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मराठी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;माणूस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;छाती&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पुढे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;करून&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;असलेल्या&lt;/span&gt;-&lt;span&gt;नसलेल्या&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;मिशांना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पीळ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;देत&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;दंड&lt;/span&gt; &lt;span&gt;थोपटून&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सांगत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आला&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आहे&lt;/span&gt;. &lt;span&gt;त्यामुळे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;असल्या&lt;/span&gt; &lt;span&gt;छोट्यामोठ्या&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;धक्क्यांचं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;काय&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ते&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कौतुक&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;नाही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt;? &lt;span&gt;असले&lt;/span&gt; &lt;span&gt;धक्के&lt;/span&gt; &lt;span&gt;देण्याच्या&lt;/span&gt; &lt;span&gt;निमित्ताने&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;चितळे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बाजीराव&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रोडवरच्या&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दुकानातून&lt;/span&gt; &lt;span&gt;थेट&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कॅलिफोर्नियात&lt;/span&gt; &lt;span&gt;येऊन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पोहोचले&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;हे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;काय&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;कमी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आहे&lt;/span&gt;? &lt;span&gt;त्यांच्या&lt;/span&gt; &lt;span&gt;त्या&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पुण्यातल्या&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दुकानात&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जाऊन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पाव&lt;/span&gt; &lt;span&gt;किलो&lt;/span&gt; '&lt;span&gt;क्रिस्पी&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;स्पायसी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;स्प्रिंग&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रोल्स&lt;/span&gt;' &lt;span&gt;मागितले&lt;/span&gt; &lt;span&gt;असते&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;तर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कदाचित&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मला&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आर्थिक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दंडच&lt;/span&gt; &lt;span&gt;झाला&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;असता&lt;/span&gt;; &lt;span&gt;झालंच&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;खाकी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बुशशर्टातल्या&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;डोक्यावर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पांढरी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गांधीटोपी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मिरवत&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;दुकानातली&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गिर्&lt;/span&gt;‍&lt;span&gt;हाइकं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हाकणार्&lt;/span&gt;‍&lt;span&gt;या&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कुणी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;माझ्या&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सात&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पिढ्या&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दुकानाच्या&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आसपास&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;दिसू&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नयेत&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;अशी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सोयही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;करून&lt;/span&gt; &lt;span&gt;टाकली&lt;/span&gt; &lt;span&gt;असती&lt;/span&gt;. &lt;span&gt;पण&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जागतिकीकरणाच्या&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वार्&lt;/span&gt;‍&lt;span&gt;यावर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आरूढ&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;होऊन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;चितळ्यांनी&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;बेडेकरांनी&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;रामबंधूंनी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जी&lt;/span&gt; '&lt;span&gt;जंप&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मारली&lt;/span&gt;' &lt;span&gt;त्याचं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;एक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मराठी&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;माणूस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;म्हणून&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मला&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कौतुक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वाटलंच&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पाहिजे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;राव&lt;/span&gt;! &lt;span&gt;मग&lt;/span&gt; &lt;span&gt;थालीपीठ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ठेपल्यातला&lt;/span&gt;,  &lt;span&gt;बाकरवडी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;स्प्रिंग&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रोल्स&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मधला&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आणि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;त्यायोगे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;एकंदरच&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मराठी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भाषा&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;संस्कृती&lt;/span&gt;,  &lt;span&gt;मराठी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मानसं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आणि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मराठी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;माणसं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आणि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बाकी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सगळे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;यांच्यातला&lt;/span&gt; &lt;span&gt;फरक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दुर्लक्षित&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;करता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;यायलाच&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हवा&lt;/span&gt;. &lt;span&gt;मराठी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आहेच&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मुळी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सोशिक&lt;/span&gt;!!&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;'&lt;span&gt;जंप&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मारण्या&lt;/span&gt;'&lt;span&gt;वरून&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आठवलं&lt;/span&gt;. &lt;span&gt;आजकाल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मराठीत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;काहीही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मारता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;येऊ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लागलं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आहे&lt;/span&gt;.  &lt;span&gt;शाळाकॉलेजातली&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पोरंपोरीही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;एकमेकांना&lt;/span&gt; '&lt;span&gt;फोन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मारून&lt;/span&gt;', &lt;span&gt;कोणत्या&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सरांच्या&lt;/span&gt; &lt;span&gt;किंवा&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;बाईंच्या&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तासाला&lt;/span&gt; '&lt;span&gt;कल्टी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मारायची&lt;/span&gt;', &lt;span&gt;ते&lt;/span&gt; &lt;span&gt;झाल्यावर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कुठे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भेटून&lt;/span&gt; '&lt;span&gt;चहा&lt;/span&gt;-&lt;span&gt;सिगरेट&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;मारायची&lt;/span&gt;', &lt;span&gt;कोणता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पिच्चर&lt;/span&gt; '&lt;span&gt;टाकायचा&lt;/span&gt;' &lt;span&gt;आणि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;या&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सगळ्या&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बेतात&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आडकाठी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आणायचा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कोणी&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;प्रयत्न&lt;/span&gt; &lt;span&gt;केलाच&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;त्याची&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कुठे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कशी&lt;/span&gt; '&lt;span&gt;मारायची&lt;/span&gt;'  &lt;span&gt;हे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सगळं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आधीच&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ठरवून&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;विद्यालयांमध्ये&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जात&lt;/span&gt; &lt;span&gt;असतात&lt;/span&gt;. &lt;span&gt;अर्थात&lt;/span&gt; &lt;span&gt;यात&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वावगं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;काहीच&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नाही&lt;/span&gt;. &lt;span&gt;मराठी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आहेच&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मुळी&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;सोशिक&lt;/span&gt;!! &lt;span&gt;आणि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नुसतीच&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सोशिक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नाही&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;तर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लवचिक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आणि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सर्वसमावेशक&lt;/span&gt;!! &lt;span&gt;आणि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ती&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तशी&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;नसती&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;तर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आहे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;त्या&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अढळपदाला&lt;/span&gt; &lt;span&gt;येऊन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पोचली&lt;/span&gt; &lt;span&gt;असती&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt;?&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span&gt;पोचण्यावरून&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आठवलं&lt;/span&gt;. &lt;span&gt;मराठी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पिच्चर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आणि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नाटकं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कुठे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;येऊन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पोचलीयेत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;राव&lt;/span&gt;!  &lt;span&gt;संगीत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नाटकांच्या&lt;/span&gt; &lt;span&gt;टेस्ट&lt;/span&gt; &lt;span&gt;म्याचेसवरून&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आम्ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;थेट&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दीड&lt;/span&gt;-&lt;span&gt;दोन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अंकी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नाटकांच्या&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;ट्वेन्टी&lt;/span&gt;-&lt;span&gt;ट्वेन्टीवर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;येऊन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पोचलोत&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;आहात&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कुठे&lt;/span&gt;??!! &lt;span&gt;आणि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आमचे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आजकालचे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पिच्चर&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;क्कस्सले&lt;/span&gt; &lt;span&gt;झगामगा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;झालेत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बघितलेत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt;? &lt;span&gt;अशोक&lt;/span&gt;-&lt;span&gt;लक्ष्या&lt;/span&gt;-&lt;span&gt;सचिनच्या&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वेळचे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बजेट&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;पिच्चर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जाऊन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जमाना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;झाला&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आता&lt;/span&gt;! &lt;span&gt;आता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आमच्या&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पिच्चरमध्ये&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पण&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आयटम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;साँग&lt;/span&gt; &lt;span&gt;असतं&lt;/span&gt; -  &lt;span&gt;ते&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सुद्धा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हिंदी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आणि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;इंग्रजीत&lt;/span&gt;!! &lt;span&gt;कानावर&lt;/span&gt; '&lt;span&gt;चमचम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;करता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;है&lt;/span&gt; &lt;span&gt;यह&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नशीला&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बदन&lt;/span&gt;' &lt;span&gt;पडतं&lt;/span&gt;;  &lt;span&gt;पण&lt;/span&gt; &lt;span&gt;डोळ्यांना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मादक&lt;/span&gt;, '&lt;span&gt;मस्तीभरी&lt;/span&gt;' &lt;span&gt;सोनाली&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बेंद्रे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दिसते&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ना&lt;/span&gt;! &lt;span&gt;सध्या&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;ऑस्ट्रेलियात&lt;/span&gt; &lt;span&gt;असते&lt;/span&gt;. &lt;span&gt;नवरा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पंजाबी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आहे&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;पण&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आपल्याला&lt;/span&gt; &lt;span&gt;काय&lt;/span&gt; &lt;span&gt;त्याचं&lt;/span&gt;?! &lt;span&gt;सोनाली&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;मराठी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आहे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मूळची&lt;/span&gt;? &lt;span&gt;तिच्या&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मूळच्या&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मराठी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;असण्याचा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आपल्याला&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भारी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अभिमान&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;असायला&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हवा&lt;/span&gt;!&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span&gt;मराठीपणाचा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अभिमान&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वाटण्यावरून&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आठवलं&lt;/span&gt;. &lt;span&gt;सुनील&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गावस्करपासून&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ते&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अजित&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;आगरकरपर्यंत&lt;/span&gt; (&lt;span&gt;झालंच&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रमेश&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पोवारपर्यंत&lt;/span&gt;), &lt;span&gt;शांतारामबापूंपासून&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ते&lt;/span&gt; &lt;span&gt;महेश&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;मांजरेकरपर्यंत&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;दुर्गाबाई&lt;/span&gt; &lt;span&gt;खोट्यांपासून&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ते&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सोनाली&lt;/span&gt; '&lt;span&gt;अप्सरा&lt;/span&gt;' &lt;span&gt;कुळकर्णीपर्यंत&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;सग्गळ्या&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मराठी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;माणसांचा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आम्हांला&lt;/span&gt; '&lt;span&gt;बाय&lt;/span&gt; &lt;span&gt;डिफॉल्ट&lt;/span&gt;' &lt;span&gt;अभिमान&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वाटत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आला&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आहे&lt;/span&gt;;  &lt;span&gt;नव्हे&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;तो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तसा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वाटलाच&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पाहिजे&lt;/span&gt;. &lt;span&gt;तेच&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मराठीपणाचं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;व्यवच्छेदक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt; &lt;span&gt;काय&lt;/span&gt; &lt;span&gt;म्हणतात&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ते&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;लक्षण&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आहे&lt;/span&gt;. &lt;span&gt;तो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तसा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वाटला&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नाही&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;तर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लेंगा&lt;/span&gt;-&lt;span&gt;बनियनवर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भिंतीला&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तुंबड्या&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लावून&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;चहा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ढोसत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;महाराष्ट्र&lt;/span&gt; &lt;span&gt;टाईम्स&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वाचायचीही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आमची&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लायकी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नाही&lt;/span&gt;.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span&gt;महाराष्ट्र&lt;/span&gt; &lt;span&gt;टाईम्सवरून&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आठवलं&lt;/span&gt;. '&lt;span&gt;नॉट&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ओन्ली&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मिस्टर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;राऊत&lt;/span&gt;' &lt;span&gt;पण&lt;/span&gt; &lt;span&gt;केतकर&lt;/span&gt;,  &lt;span&gt;टिकेकर&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;कुवळेकर&lt;/span&gt;  - &lt;span&gt;एकुणातच&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सग्गळे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;क्कस्सले&lt;/span&gt; &lt;span&gt;धंदेवाले&lt;/span&gt; - &lt;span&gt;आय&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मिन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;व्यावसायिक&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;झालेत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ना&lt;/span&gt;?! &lt;span&gt;झगामगा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;फोटो&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;म्हिंग्लिश&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बातम्या&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;असंख्य&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जाहिराती&lt;/span&gt;. &lt;span&gt;त्यांच्या&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;सायटी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पाहिल्यात&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt; &lt;span&gt;राव&lt;/span&gt;!! &lt;span&gt;महाराष्ट्र&lt;/span&gt; &lt;span&gt;टाईम्स&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वृत्तपत्र&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कमी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आणि&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;काव्यपत्र&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जास्त&lt;/span&gt; &lt;span&gt;झाल्यासारखा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;असतोय&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आज&lt;/span&gt; &lt;span&gt;काल&lt;/span&gt;. &lt;span&gt;परवा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भारत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वि&lt;/span&gt;. &lt;span&gt;दक्षिण&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आफ्रिका&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;कसोटी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सामन्याच्या&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वृत्ताचं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शीर्षक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;काय&lt;/span&gt; &lt;span&gt;होतं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;माहितीये&lt;/span&gt;? '&lt;span&gt;कॅलिसच्या&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मदतीला&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;आमला&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जमला&lt;/span&gt;; &lt;span&gt;भारत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दमला&lt;/span&gt;' (!!!) &lt;span&gt;सकाळसकाळचा&lt;/span&gt; '&lt;span&gt;सकाळ&lt;/span&gt;' &lt;span&gt;पण&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मागे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नाही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बरं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt;!  &lt;span&gt;समाजातल्या&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तळागाळातल्या&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हौशी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लेखकुंना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मराठी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;साहित्याचे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पाईक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आणि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मानदंड&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;बनवण्यात&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सकाळाच्या&lt;/span&gt; &lt;a href="http://72.78.249.125/esakal/20100726/4848686754808203812.htm"&gt;मुक्तपिठाने&lt;/a&gt;  &lt;span&gt;जो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;खारीचा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वाटा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उचललाय&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;त्याचा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;एक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मराठी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;माणूस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;म्हणून&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तरी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मला&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जाज्ज्वल्य&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;अभिमान&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वाटलाच&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पाहिजे&lt;/span&gt;. &lt;span&gt;किंबहुना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अशाच&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सदरांमुळे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तरुणाईला&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आणि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मराठीतील&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;नवागतांना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मराठी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;साहित्यात&lt;/span&gt; &lt;span&gt;रुची&lt;/span&gt; &lt;span&gt;निर्माण&lt;/span&gt; &lt;span&gt;होईल&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;असा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दृढ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;विश्वास&lt;/span&gt;  '&lt;span&gt;सकाळ&lt;/span&gt;'&lt;span&gt;प्रमाणेच&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मलासुद्धा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वाटत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आला&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आहे&lt;/span&gt;.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span&gt;मराठी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;साहित्यावरून&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आठवलं&lt;/span&gt;. &lt;span&gt;आजकालचं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मराठी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;साहित्य&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;केवळ&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;वह्यापुस्तकांमध्येच&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अडकून&lt;/span&gt; &lt;span&gt;न&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पडता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;संगणकावर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आणि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;त्याच्या&lt;/span&gt; &lt;span&gt;माध्यमातून&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;जगाच्या&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कानाकोपर्&lt;/span&gt;‍&lt;span&gt;यात&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जाऊन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पोचलंय&lt;/span&gt; &lt;span&gt;म्हणे&lt;/span&gt;. &lt;span&gt;खूप&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मराठी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सायटी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पण&lt;/span&gt; &lt;span&gt;निघाल्यात&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;म्हणे&lt;/span&gt;. &lt;span&gt;मराठीत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;त्यांना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;संकेतस्थळं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कायतरी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;म्हणतात&lt;/span&gt;. &lt;span&gt;कविता&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;गद्य&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;चर्चा&lt;/span&gt;,  &lt;span&gt;पाककृती&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;क्रिकेट&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;विज्ञान&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;भाषाशास्त्र&lt;/span&gt; - &lt;span&gt;जगातला&lt;/span&gt; &lt;span&gt;एकही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;विषय&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बाकी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नाही&lt;/span&gt;,  &lt;span&gt;ज्यावर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मराठीत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आणि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मराठी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सायटींवर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लिहिलं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गेलं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नाही&lt;/span&gt;. &lt;span&gt;इन्टरनेटने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जगाला&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जवळ&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;आणलं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आणि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;या&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सायटींनी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जगभरातल्या&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मराठी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;माणासांना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आणि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मराठी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मानसांना&lt;/span&gt;.  &lt;span&gt;साहेबाचा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;साम्राज्यसूर्य&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जसा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जगातल्या&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कोणत्याच&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भूमीवर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कधीच&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मावळायचा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नाही&lt;/span&gt;,  &lt;span&gt;तसंच&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अगणित&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मराठी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;माणसं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;असंख्य&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मराठी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सायटींवरून&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कधीच&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मावळत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नाही&lt;/span&gt;. &lt;span&gt;अर्थात&lt;/span&gt;,  &lt;span&gt;जिकडे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मराठी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;माणूस&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आला&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;तिकडे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हेवेदावे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आले&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;खटके&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उडणे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आले&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;हमरीतुमरी&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;आली&lt;/span&gt;, '&lt;span&gt;बा&lt;/span&gt;'&lt;span&gt;चा&lt;/span&gt;'&lt;span&gt;बा&lt;/span&gt;'&lt;span&gt;ची&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आली&lt;/span&gt;; &lt;span&gt;पण&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ते&lt;/span&gt; &lt;span&gt;असो&lt;/span&gt;. &lt;span&gt;तेच&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मराठीपणाचं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आणखी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;एक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;व्यवच्छेदक&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;लक्षण&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नाही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt;?! &lt;span&gt;अनेकजण&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उपद्रवी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;असले&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तरी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मराठीच&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आहेत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ना&lt;/span&gt;?! &lt;span&gt;मग&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मोठ्या&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;उदार&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;अंतःकरणाने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वगैरे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;त्यांना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;माफ&lt;/span&gt; &lt;span&gt;करायचे&lt;/span&gt;. &lt;span&gt;मराठी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आहेच&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मुळी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सोशिक&lt;/span&gt;!! &lt;span&gt;आणि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नुसतीच&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;सोशिक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नाही&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;तर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लवचिक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आणि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सर्वसमावेशक&lt;/span&gt;!! &lt;span&gt;आणि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ती&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तशी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नसती&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;तर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आता&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आहे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;त्या&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;अढळपदाला&lt;/span&gt; &lt;span&gt;येऊन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पोचली&lt;/span&gt; &lt;span&gt;असती&lt;/span&gt; &lt;span&gt;का&lt;/span&gt;?&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span&gt;आजकाल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;काहीजण&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उगाचच&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तिच्या&lt;/span&gt; &lt;span&gt;र्&lt;/span&gt;‍&lt;span&gt;हासाच्या&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नावाने&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गळे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;काढत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;असतात&lt;/span&gt;. &lt;span&gt;मग&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;जागतिक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मराठी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दिन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वगैरे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;साजरे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;करून&lt;/span&gt; &lt;span&gt;त्यांना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दाखवून&lt;/span&gt; &lt;span&gt;द्यावे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लागते&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मराठी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;काय&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;आहे&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;मराठी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कुठे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आहे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ते&lt;/span&gt;. &lt;span&gt;आमची&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आजची&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मराठी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पिढी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बर्गरग्रस्त&lt;/span&gt; &lt;span&gt;असली&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;तरी&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;महाराष्ट्र&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मंडळाच्या&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कार्यक्रमाच्या&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वेळी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आमच्याकडे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;खाद्यपेयांचे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;स्टॉल&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;लावतात&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ना&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;तेव्हा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;त्यांना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;साबुदाणा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;खिचडीच&lt;/span&gt; &lt;span&gt;खावी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लागते&lt;/span&gt;; &lt;span&gt;बटाटावडाच&lt;/span&gt; &lt;span&gt;खावा&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;लागतो&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आणि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मसाला&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दूधच&lt;/span&gt; &lt;span&gt;प्यावं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लागतं&lt;/span&gt;. &lt;span&gt;नको&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तिकडे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लाड&lt;/span&gt; &lt;span&gt;करायला&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मराठी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कधीच&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शिकवत&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;नाही&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;कधी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शिकवलंही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नाही&lt;/span&gt;. &lt;span&gt;आम्ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तिची&lt;/span&gt; &lt;span&gt;डोळ्यांत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तेल&lt;/span&gt; &lt;span&gt;घालून&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;महाराष्ट्र&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;मंडळं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;काढून&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;मराठी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पिच्चर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बघून&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;बालमंदिरांमधून&lt;/span&gt; '&lt;span&gt;देवा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तुझे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;किती&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सुंदर&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;आकाश&lt;/span&gt;' &lt;span&gt;वगैरे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;शिकवून&lt;/span&gt; &lt;span&gt;इतकी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;काळजी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;घेतो&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;तर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तिचा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;र्&lt;/span&gt;‍&lt;span&gt;हास&lt;/span&gt; &lt;span&gt;होईलच&lt;/span&gt; &lt;span&gt;कसा&lt;/span&gt;?  &lt;span&gt;देशातल्यांना&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उगाचच&lt;/span&gt; &lt;span&gt;काळजी&lt;/span&gt;. &lt;span&gt;डोन्ट&lt;/span&gt; &lt;span&gt;यू&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वरी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मराठी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मानूस&lt;/span&gt;! &lt;span&gt;आमच्याकडे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आम्ही&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;विश्व&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मराठी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;साहित्यसंमेलनसुद्धा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;केलंय&lt;/span&gt;. &lt;span&gt;आम्ही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सुरुवात&lt;/span&gt; &lt;span&gt;केल्यावर&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मग&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मागाहून&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;दुबई&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;लंडन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;वगैरेची&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मंडळं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जागी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;झालीत&lt;/span&gt;!!&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span&gt;विश्व&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मराठी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;साहित्य&lt;/span&gt; &lt;span&gt;संमेलनावरून&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आठवलं&lt;/span&gt;. &lt;span&gt;पुढच्या&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जागतिक&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मराठीदिनी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;विश्व&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;मराठी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;खाद्ययात्रा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भरवायचा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;प्रस्ताव&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मंडळाकडे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ठेवला&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तर&lt;/span&gt;? &lt;span&gt;निलेश&lt;/span&gt; &lt;span&gt;लिमयेला&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;वगैरे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आम्हीही&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सारे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;खवय्ये&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आहोत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दाखवून&lt;/span&gt; &lt;span&gt;द्यायचे&lt;/span&gt;; &lt;span&gt;सरकारकडून&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मस्त&lt;/span&gt; &lt;span&gt;अनुदान&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;वगैरे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मिळवायचे&lt;/span&gt;; &lt;span&gt;शनिवार&lt;/span&gt;-&lt;span&gt;रविवारच्या&lt;/span&gt; &lt;span&gt;नाश्तापाण्याची&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;जेवणाची&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सोय&lt;/span&gt; &lt;span&gt;करायची&lt;/span&gt;.  &lt;span&gt;त्याच&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सुमाराला&lt;/span&gt; &lt;span&gt;हिची&lt;/span&gt; &lt;span&gt;डिलिवरी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पण&lt;/span&gt; &lt;span&gt;असेल&lt;/span&gt;; &lt;span&gt;म्हणजे&lt;/span&gt; &lt;span&gt;खाद्ययात्रेच्या&lt;/span&gt; &lt;span&gt;निमित्ताने&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;आईबाबांची&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तिकिटंपण&lt;/span&gt; &lt;span&gt;स्वस्तात&lt;/span&gt; &lt;span&gt;होऊन&lt;/span&gt; &lt;span&gt;जातील&lt;/span&gt;! &lt;span&gt;काय&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आहे&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;या&lt;/span&gt; &lt;span&gt;माझ्या&lt;/span&gt; &lt;span&gt;बोलकढीपेक्षा&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;खरीखुरी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गुलाबी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;सोलकढी&lt;/span&gt;, &lt;span&gt;पांढराशुभ्र&lt;/span&gt; &lt;span&gt;फळफळीत&lt;/span&gt; &lt;span&gt;भात&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आणि&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पापलेटचा&lt;/span&gt; &lt;span&gt;गरमागरम&lt;/span&gt; &lt;span&gt;तुकडा&lt;/span&gt;  &lt;span&gt;ताटात&lt;/span&gt; &lt;span&gt;पडला&lt;/span&gt; &lt;span&gt;की&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आमचं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;मराठीपण&lt;/span&gt; &lt;span&gt;आणखी&lt;/span&gt; &lt;span&gt;उठून&lt;/span&gt; &lt;span&gt;दिसतं&lt;/span&gt; &lt;span&gt;ना&lt;/span&gt;!&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;    &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/20108582-7738619617430762122?l=meeakshay.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://meeakshay.blogspot.com/feeds/7738619617430762122/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=20108582&amp;postID=7738619617430762122' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/20108582/posts/default/7738619617430762122'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/20108582/posts/default/7738619617430762122'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://meeakshay.blogspot.com/2011/03/blog-post.html' title='बोलकढी'/><author><name>Chakrapani</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06931612066464984955</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-20108582.post-3740548419614926601</id><published>2010-04-21T02:13:00.000-05:00</published><updated>2010-04-21T02:14:13.224-05:00</updated><title type='text'>अ‍ॅटमबॉम्ब, खिमा पॅटिस नि चाय</title><content type='html'>&lt;p&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span&gt;मध्यपूर्व&lt;/span&gt; आशिया हा संपूर्ण जगासाठी अनेक कारणांमुळे महत्त्वाचा,  कुतूहलाचा नि विवादांचा ठरलेला भूप्रदेश. प्राचीन काळी जेव्हा पौर्वात्य नि  पाश्चिमात्य जगाचे ऋणानुबंध मध्यपूर्वेतून खुष्कीच्या मार्गे होणार्‍या  व्यापारातून जुळले, तेव्हापासून ते आज अगदी इराणवर आर्थिक निर्बंध लादणे,  इराकवर युद्ध (नि लोकशाही!) लादणे, दुबईमधील समुद्रकिनार्‍यांवर उन्हात  चिंब होऊन पडणे, तिथल्या बुर्ज दुबईच्या गच्चीवरून सगळ्या पृथ्वीकडे डोळे  भरून पाहणे अशा येनकेनप्रकारेण जुळलेलेच राहिले आहेत. शाळेत इतिहास शिकताना  क्वचित एखादा धडा अरबी टोळ्या, अल-जेब्रा, हादिस नि कुर-आन, नौरूज याबद्दल  बोलू लागला की इतिहासासारखा विषयही आवडू लागायचा (इतर वेळी १८५७ ते १९४७  सोडून काही वाचायला मिळायचे नाही, हा भाग वेगळा!) अगदी अलीकडेपर्यंत  अयातुल्ला खोमेनी, माह्मूद अह्मदेनिजाद वगैरे नावे कानावर पडत;  इराण-पाकिस्तान-भारत गॅस पाइपलाइनसंबंधीच्या बातम्या वाचायला-ऐकायला मिळत;  तेव्हाही कान आणि डोळे त्यांच्या दिशेने आपसूकच वळायचे. गाडी घेऊन  सनीवेलातल्या &lt;a href="http://www.yelp.com/biz/rajjot-sweet-and-snacks-sunnyvale"&gt;रज्जो&lt;/a&gt;  मध्ये पराठे खायला बाहेर पडावे नि बाजूच्याच &lt;a href="http://www.chelokababi.com/default.htm"&gt;चेलोकबाबी&lt;/a&gt; मधील  लाल-पिवळा मंद प्रकाश नि ताज्या, गरम कबाबांचा वास पराठ्यांच्या बेताबद्दल  मनात 'सेकन्ड थॉट' निर्माण करून जावा, असे आजवर अनेकदा घडले आहे. कालच्या  टॅब्लॉइड ऑफ इन्डिया मधील &lt;a href="http://timesofindia.indiatimes.com/world/middle-east/Iranian-cleric-Promiscuous-women-cause-quakes/articleshow/5833574.cms"&gt;ही&lt;/a&gt;  बातमी वाचली आणि पर्शियाशी (आताचा इराण) आपले पोट, राजकीय नि ऐतिहासिक  संबंध - नि सगळ्यात महत्त्वाचे म्हणजे सांस्कृतिक भूक - किती घट्ट जोडले  गेले आहेत, याचा विचार नकळतच मनात डोकावला. कचेरीतील सोमवार संध्याकाळची  वेळ, हातात गरमागरम चहा, कचेरीतील जवळच्या मित्राशी या सगळ्यावरून झालेल्या  गप्पा आणि विचारांची देवाणघेवाण याची परिणती म्हणजे ही खरड.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;मुळात तेहरानला नजीकच्या भविष्यकाळात प्रचंड मोठ्या भूकंपाचा गंभीर धोका  आहे, हे राष्ट्राध्यक्षांनी जाहीर करावे नि त्यानुसार पावले उचलायच्या  तयारीस लागावे, याला खूळ म्हणावे की दूरदृष्टी हे कळण्याइतपत पुरेशी माहिती  माझ्यापाशी नाही. तसेही इराणला भूकंपांचे वावडे नसावे. १८२०-३० मध्ये तेथे  सगळ्यात मोठा भूकंप झाला होता. त्यानंतर अमेरिकेशी सततची भांडणे,  पाकिस्तानातून अण्वस्त्र निर्मितीसंबंधित तंत्रज्ञानाची चोरी, इराकबरोबरचे  युद्ध नि आता अमेरिकेच्याच पुढाकाराने संयुक्त राष्ट्रांमार्फत आर्थिक  निर्बंध लादून इराणची कोंडी अशा एक ना अनेक कारणांनी इराण हादरत असतेच. पण  बातमीतील इराणी महाशयांच्या वक्तव्याने इराण नाही तर बाकीची दुनिया हादरेल,  हे मात्र नक्की! लौकिकार्थाने कापसाची किंवा तागाची शेती, कृत्रिम  धाग्यांची निर्मिती, गिरण्यांचे संप, रेडीमेड कपड्यांची आयात, फॅशन,  जगप्रसिद्ध फॅशन डिझाइनर्स यांच्याशी फारसे जवळचे संबंध असणार्‍यांपैकी  इराण नाही. तसे असतानाही धर्मात नमूद केल्यानुसार स्त्रियांनी नखशिखान्त  अंग झाकणारी वस्त्रे परिधान करण्याचा पुरस्कार करणारे हे इराणी महाशय तसे  संकुचित विचारांचेच म्हटले पाहिजेत. आकाराने तसेच संख्येने कमीत कमी कपडे  वापरून त्यायोगे यंत्रमागांची घरघर, वातावरणातील कार्बनचे वाढते प्रमाण,  ग्लोबल वॉर्मिंग वगैरे कमी करण्याच्या दृष्टीने सगळे जग पावले उचलत असताना  हे महाशय मात्र अगदी विरुद्ध दिशेने वाटचाल करू पाहत आहेत. याबद्दल खरे तर  इराणाचा सार्वत्रिक निषेध व्हायला हवा; पण इराणने आपल्याला इतके काही  भरभरून दिले आहे की निदान मला तरी असा निषेध करवत नाही.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;इराण म्हटले की सगळ्यात पहिल्यांदा मला आठवतो तो 'कोपर्‍यावरचा इराणी'.  मुंबईत एके काळी बहराला आलेली ही जमात आजकालच्या पिढीला माहीतदेखील असेल की  नाही, अशी शंका येते. बरे आपण म्हणावे "तो कोपर्‍यावरचा इराणी.." आणि  समोरच्याने "कोण रे?" असे विचारून आपलेच दात घशात घालावेत, अशी स्वतःची गत  करून घ्यायला मला तरी आवडायचे नाही. इराण्याला नाव नसतेच. ज्याच्या  हाटेलावर नावाची पाटी असेल, तो अस्सल इराणी नाहीच. किंबहुना तो नेहमी  कुठल्यातरी कोपर्‍यावरचाच असल्याने नि तुम्ही मुंबईत जेथे कोठे असाल, तिथून  कोपरभरच लांब असल्याने 'कोपर्‍यावरचा इराणी' इतकीच त्याची ओळख पुरेशी  असते. मग ते भेटीचे ठिकाण असो, नवख्या माणसाने पत्ता चुकू नये म्हणून  सांगायची खूण असो, सकाळी कचेरीत जायच्या आधी ब्रून-मस्का किंवा बन-मस्का,  आम्लेट-पाव नि कटिंग हा ठरलेला नाश्ता हाणायची जागा असो की फुकटात पेपर  वाचायला मिळायचे नि त्यातील बातम्यांचा काथ्याचे (व घड्याळ्याच्या  काट्यांचे!) कूट करायचे वाचनालय! कॉलेजात जायला लागल्यावर मग घरी येताना  मटण पॅटिस किंवा खिमा पॅटिस, टोस्ट किंवा खारी, कधी लहर आलीच तर पुडिंग,  चहा नि सिगरेट असा शाही बेत मित्रांच्या संगतीने जमवायचा. तुम्ही नेहमीचे  गिर्‍हाइक असाल, तर तुम्हाला खुर्ची उलटी फिरवून बसण्याचीही मुभा असते.  शक्य तितक्या जुनाट काळ्या रंगाची खुर्च्या-टेबले, त्यांवर तितक्याच उठून  दिसणार्‍या पांढर्‍या कपबशा नि बाउल्स, स्टीलचे चकचकीत चमचे आणि रोमन आकडे  असलेले, टोल्यांचे पण कधी टोले न वाजणारे घड्याळ ही अस्सल इराण्याची ओळख  आहे. कालौघात त्याच्या पुढील पिढीतील नतद्रष्टांनी हाटेलांना 'कॅफे गुडलक'  किंवा तत्सम नावे देणे, आतले फर्निचर नूतनीकरणाच्या नावाखाली बदलणे,  विनाकारण उत्तर भारतीय नि दाक्षिणात्य पदार्थही उपलब्ध करून देणे वगैरे  सांस्कृतिक भेसळ करून ही ओळख पुसायला सुरुवात केली. मॅक्डोनाल्ड वगैरे चालू  झाल्यावर तर सगळी पिढीच बिघडू लागली; पण निष्ठावान खवय्या इराण्याला  विसरला नाही नि त्याच्याच जिवावर उरलासुरला इराणी अजूनही तग धरून आहे.  अंधेरी स्टेशनबाहेरील मॅक्डोनाल्ड मध्ये जितकी गर्दी असते त्याच्या अनेकपट  गर्दी समोरच्या इराण्याकडे असते! मॅक्डीच्या बाहेरील जोकर जितके लक्ष वेधून  घेत नाही तितके इराण्याच्या बसक्या कपाटाच्या काचेमागील पिवळाजर्द वर्ख नि  पापुद्रे ल्यालेले नि वेड लावणारा घमघमाट सुटलेले खिमा पॅटिस, मटण पॅटिस,  खारी, मावा केक वगैरे मला खुणावत असतात.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;नदीचे मूळ नि ऋषीचे कूळ विचारू नये असे काहीतरी ऐकून आहे. इराण्याच्या  बाबतीतही हे तितकेसे खोटे नसावे. कारण ज्याला भारतात लौकिकार्थाने पारशी  समजले जाते तो मूळचा इराणी (पर्शियन) आहे, आणि इराणी असूनही त्याचा धर्म  मुस्लिम नाही, त्याला दाढी नाही तर डोकीवर ज्यूंसारखी छोटी लाल गोल टोपी नि  अंगात पैरण आहे वगैरे लक्षात येऊ लागले की गोंधळ उडालाच म्हणून समजा.  अलीकडे महंमद अली रोड वर काही इराणी ढंगाची हाटेले दिसली ते हायब्रिड इराणी  किंवा अस्सल मुसलमान असावेत, असे वाटते. त्यांच्याकडे बिर्याणी, खिमा,  चिकन कोर्मा, कबाब वगैरे हाणायला मिळते; त्याची लज्जत औरच. पण त्याची  ब्रून-मस्का नि चायशी तुलना करू नये. यू कॅनॉट कम्पेअर अ‍ॅपल्स अ‍ॅन्ड  ऑरेन्जेस! (यू मे लव बोथ, दो!) त्यामुळे इराणी ईद साजरी न करता नौरूज कसा  काय साजरा करतो, मशिदीत न जाता अग्यारीत कसा सापडतो इ. प्रश्नांचे खरे  उत्तर इराणमध्ये ईद आणि नौरूज दोन्ही जोरदार साजरे कसे होतात, याच्याच  उत्तरात दडले आहे. किंबहुना इराणमधील बिगरमुस्लिम इराणी तेथील जाचक धार्मिक  निर्बंधांना कंटाळूनच भारतात येऊन थडकला असावा की काय, अशी कधी कधी शंका  येते. प्रत्यक्षात, हा झोराष्ट्रीयन समाज बव्हंशी इराणबाहेर स्थलांतरीत  झाल्यानंतरच तेथे मुस्लिमप्राबल्य असलेले लोकजीवन रुजले, असे कुठेतरी  वाचायला मिळाले. आणि ते नुसतेच रुजले नाही तर बहरलेसुद्धा! &lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;शॉर्ट स्कर्ट्स, फ्रॉक्स आणि डोक्याला रुमाल बांधलेल्या पारशी तरुणींचे  मूळ मुस्लिमप्राबल्य असलेल्या मध्यपूर्वेतील इराणमध्ये आहे, यावर तर  सुरुवातीला विश्वासच बसत नसे. खरे तर गोरा रंग, धनुष्याकृती रेखीव भिवया,  सरळ तजेलदार नाक, पाणीदार डोळे, मधाळ हसू आणि कमनीय बांधा यांच्या कसोटीवर  खरी उतरणारी पारशी तरुणी विरळीच. पारशी तरुणींनी जमाना नाचवावा तो फॅशन,  बिनधास्तपणा नि रंगीबेरंगी फुलांची किंवा इतर मुक्तहस्त चित्रे असलेल्या  वैशिष्ट्यपूर्ण कपड्यांच्या जोरावर. याउलट उपरोल्लेखित गुणविशेष असलेली  इराणी मुस्लिम तरुणी तुलनेने कमी बोलकी, अदबशीर, सोज्वळ चेहरेपट्टी असलेली;  गोड बोलणारी. अर्थात पारशी संस्कृती भारतात बहरली नि इराणी मुस्लिम  संस्कृती इराणमध्ये. त्यामुळे इराणमधील स्त्रियांच्या जीवनाबद्दल जे काहीशा  विस्ताराने ऐकता आले, ते कचेरीतील दोन इराणी स्त्री सहकार्‍यांकडूनच.  इराणमधील स्त्रीवर्गात शिक्षणाचे वाढू लागलेले प्रमाण, गणित नि विज्ञानातील  तसेच स्थापत्यशस्त्रातील प्रगती व त्यातील स्त्रियांचे योगदान,  स्त्रीवर्गाचा कला, साहित्य नि पत्रकारिता क्षेत्रातील वाढता प्रभाव  याबद्दल त्या भरभरून बोलतात तेव्हा इराणमधील स्त्रीजीवनाची व त्यातील  स्थित्यंतराची पुसटशी तरी कल्पना यावी. असे असताना टाइम्स ऑफ इन्डियामधील  उपरोल्लेखित बातमीमधील मुक्ताफळे उधळणार्‍या इराणी मुल्लाची मते या  प्रगतीशील समाजाला कशी मागे खेचू पाहत आहेत, हे स्पष्ट व्हायला हवे.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;बर्‍यापैकी खुलेआम पद्धतीने इराणमध्ये चालू असलेली अण्वस्त्रनिर्मिती;  पाकिस्तानातून झालेली तंत्रज्ञानाची चोरटी आयात; धगधगते, प्रतिकूल,  इराणविरोधी आंतरराष्ट्रीय वातावरण नि दबाव या सगळ्याला सध्या सामोरा जात  असलेला इराणी गझला, रुबाया, फार्सी भाषा, प्रिन्स ऑफ पर्शियासारखे लोकप्रिय  संगणकी खेळ, सोहराब नि रुस्तुम च्या रंजक गोष्टी, आशियाई फुटबॉल,  वेगवेगळ्या प्रकारच्या चहांची चाहत, गोलाब नि त्याचे अत्तर या सगळ्याशीही  थेट संबंधित आहे, हे नजरेआड करता येत नाही. मध्यपूर्वेतील या  अ‍ॅटमबॉम्बच्या पोटात दडलेली ही सगळी रसायने जगात अगोदरच सर्वसमाविष्ट झाली  आहेत. पुढेमागे काही स्फोट व्हायचाच असेल तर तो अशा सर्वदूर  संस्कृतीप्रसाराचाच व्हावा, म्हणजे अमेरिकेत बसूनही आम्हांला भायखळ्याच्या  रिगल किंवा ग्रान्ट रोडच्या मेरवानच्या सुखाला पारखे झाल्याची चुटपुट लागून  रहायची नाही.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/20108582-3740548419614926601?l=meeakshay.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://meeakshay.blogspot.com/feeds/3740548419614926601/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=20108582&amp;postID=3740548419614926601' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/20108582/posts/default/3740548419614926601'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/20108582/posts/default/3740548419614926601'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://meeakshay.blogspot.com/2010/04/blog-post.html' title='अ‍ॅटमबॉम्ब, खिमा पॅटिस नि चाय'/><author><name>Chakrapani</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06931612066464984955</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-20108582.post-2565182327190032913</id><published>2010-03-09T23:43:00.000-05:00</published><updated>2010-03-09T23:44:00.787-05:00</updated><title type='text'></title><content type='html'>&lt;span style="font-size:130%;"&gt;२००८ मधे १० लोकांनी साकारलेल्या शब्दबंधने मागच्या वर्षी २९ लोकाना  सामावून घेतलं! मराठी ब्लॉगर्सच्या या जागतीक ई-सभेचे आयोजन आपण याही वर्षी  दिमाखात करणार आहोत. &lt;span style="font-size: large;"&gt;मित्रहो तारखांची  नोंद करा - ५ आणि ६ जुन २०१०!&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; &lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;br /&gt;परत एकदा आपण सर्वजण या सभेत भेटायचंय. काही नवे तर काही जुने शब्दबंधी  घेऊन यायचंय. जिथे आहात तिथून, थेट सर्वांच्या हृदयापर्यंत पोहोचायचंय. परत  एकदा सर्व हौशी मराठी ब्लॉगर्सना त्यांचं लिखाण त्यांच्या थाटात व्यक्त  करण्यासाठी हे खास व्यासपीठ सजवायचंय.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मागील वेळेसारखेच, &lt;/span&gt; &lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;u&gt;मराठीमध्ये १०० % स्वतःचं लेखन असलेला किमान एक ब्लॉग  असलेल्या कुठल्याही ब्लॉगकाराला यात सहभागी होता येईल&lt;/u&gt;. या सभेची  व्याप्ती अधिकाधिक वाढवणे आणि अधिकाधिक मराठी ब्लॉगर्सना त्यांनी  लिहिलेल्या, त्याना आवडणाऱ्या, आणि त्यांच्या लिखाणाचं वाचन करण्यासाठी  ई-व्यासपीठ ऊपलब्ध करून देणे हा यावेळीही हेतू आहे. मराठीमधलं लिखाण हा एकच  समान दुवा पकडून आपण सर्वजण एकत्र येणार आहोत. प्रवास वर्णनं, अनुभव, कथा,  कविता, व्यक्तीचित्रं, लघुनिबंध, तंत्रज्ञान आणि अशाच कित्येक छटांनी  सजलेल्या मराठी ब्लॉगविश्वाची छोटीशी झलक आपल्याला या सभेमधे साकार  करायचीये. तेही अनौपचारीक पद्धतीने.&lt;br /&gt;सर्वसाधारणतः या सभेचं स्वरूप असं असेल. स्काईप, किंवा तत्सम साधन वापरून,  आपण वेगवेगळी सत्रं आयोजीत करू. सहभागी होणाऱ्या सर्व हौशी ब्लॉगर्सना या  तंत्राची माहिती सभेच्या आधी करून देण्यात येईल. जपान-ऑस्ट्रेलियापासून ही  सभा सुरू होईल. सत्रांची सूत्रं क्रमाक्रमाने पश्चिमेकडे हस्तांतरीत होऊन  भारत-आफ़्रिका-युरोप-अमेरिका या क्रमाने अभिवाचनाचं सत्र सुरू राहील.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शब्दबंध-२०१० मधे सहभागी होणं सोपं आहे. सहभाग घेण्यासाठी किंवा  केवळ आयोजनामधे मदत करण्यासाठीही, कृपया या फॉर्मवर नोंद करावी -&lt;/span&gt; &lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;a href="https://spreadsheets.google.com/viewform?formkey=dHhIT3dWN21tYWpDVHo4UG9yMlZycWc6MA" target="blank"&gt;https://spreadsheets.google.com/viewform?formkey=dHhIT3dWN21tYWpDVHo4UG9yMlZycWc6MA&lt;/a&gt;.  तुमच्याबद्दलची माहिती आणि तुमच्या सहभागाचं स्वरूप आम्हाला  या फॉर्मवरून कळेल. &lt;u&gt;सर्व जुन्या आणि नव्या शब्दबंधीनी या फॉर्मवरून नोंद  करावी ही विनंती&lt;/u&gt;. ईथे नाव नोंदवणाऱ्या सर्वाना आपोआप &lt;a href="mailto:shabdabandha@googlegroups.com"&gt;shabdabandha@googlegroups.com&lt;/a&gt;  मधे प्रवेश दिला जाईल आणि तिथेच पुढच्या सर्व चर्चा होतील. (तुम्ही  आधीपासून जरी &lt;a href="mailto:shabdabandha@googlegroups.com"&gt;shabdabandha@googlegroups.com&lt;/a&gt;  चे सभासद असाल, तरीसुद्धा शब्दबंध-२०१० मध्ये सहभागासाठी, कृपया फॉर्ममधे  नोंद करावी. तसदीबद्दल क्षमस्व.)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लवकरच भेटू. आपली वाट बघतोय. &lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/20108582-2565182327190032913?l=meeakshay.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://meeakshay.blogspot.com/feeds/2565182327190032913/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=20108582&amp;postID=2565182327190032913' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/20108582/posts/default/2565182327190032913'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/20108582/posts/default/2565182327190032913'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://meeakshay.blogspot.com/2010/03/blog-post.html' title=''/><author><name>Chakrapani</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06931612066464984955</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-20108582.post-7579545451143933634</id><published>2009-10-15T17:13:00.003-05:00</published><updated>2009-10-15T17:15:38.756-05:00</updated><title type='text'>पाऊस कधीचा पडतो</title><content type='html'>&lt;span style="font-size:130%;"&gt;दुर्दैव, अस्वस्थता या आणि अशा काही संज्ञांच्या व्याख्या जडगोळा तत्त्वज्ञानाची पुस्तके, वर्तमानपत्रांतील लक्षवेधी लेख किंवा थोरामोठ्यांची टाळीबाज व्याख्याने यांतून होतच नसतात. त्या होतात स्वानुभूतीतून. म्हणजे रविवारी ग्यालरीत उभे असताना खालून जाणार्‍या कोळणीच्या टोपलीत ताजा फडफडीत बांगडा दिसावा; बांगड्याची भूक तिला द्यायच्या हाकेच्या रुपाने अगदी स्वरयंत्रापर्यंत यावी आणि अचानक आज संकष्टी असल्याचा साक्षात्कार व्हावा, हे खरे तर दुर्दैव आणि या साक्षात्कारानंतर होणारी 'कसंनुसं' झाल्याची जाणीव म्हणजे अस्वस्थता. "च्यायला!" हा उद्गार म्हणजे त्या दुर्दैवाचे, अस्वस्थतेचे उत्स्फूर्त, मूर्तीमंत, सगुण रूप. परवाच्या दिवशीचा कोसळणारा पाऊस कार्यालयातील माझ्या खुराडात बसून (नुसताच) ऐकताना पदोपदी मला हेच 'च्यायला' माझ्याच आतून ऐकायला मिळत होते.&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;महिनाभरापूर्वीच भारतात असताना तिथला पाऊस अंगावर झेलला होता. खरे तर भाद्रपदातला पाऊस अंगावर घेणे म्हणजे दुधाची तहान ताकावर भागवण्यासारखे आहे. त्यातून दौर्‍यातला प्रत्येक क्षण 'मंगऽलमूर्ती मोऽरया, गऽणपती बाप्पा मोऽरया' च्या जयघोषात बुडवून घेतलेला. तब्बल चार वर्षांनंतर ऐकलेले ते 'तत्तर तत्तर तत्तर तत्तर..' कानात साठवून घेताना पावसाकडे लक्ष कधी आणि कसे द्यावे?! नाही म्हणायला दोनदा शिवनेरीने मुंबई-पुणे केले तेव्हा घाटात त्याची नि माझी भेट झाली खरी; पण ती सुद्धा एका बंद काचेच्या अल्याड-पल्याडच्या अवस्थेत. एखादा कैदी नि त्याला भेटायला येणारे नातेवाईक जसे बंद गजांच्या अलीकडे-पलीकडे भेटावेत, अगदी तसे! किंवा अमेरिकन दूतावासात व्हिसाच्या रांगेत ताटकळल्यावर बुलेटप्रूफ काचेपल्याडच्या गोर्‍या अधिकार्‍याच्या प्रश्नांची इमानेइतबारे उत्तरे देण्यासाठी उभे रहावे, तसे! फरक इतकाच, की चार वर्षांपूर्वी मी मुंबईतला पाऊस मनात कैद करून घेऊन अमेरिकेत आलो होतो; नि या वर्षी मीच त्याच्याकडे त्याचाच कैदी म्हणून गेलो होतो. ते सुद्धा कोणत्याही व्हिसाशिवाय!&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;घाटातला पोपटीपिवळा रंग उतरणीला लागलेल्या पावसातही आपला ताजेपणा टिकवून होता. नुकतीच पावसाला सुरुवात झाल्यासारखा. खोपोली ते लोणावळा पट्ट्यामध्ये कोसळणारे दुधी धबधबे, कड्याकपारीमधून अचानक दिसणारे फेसाळते झरे मनातही कित्येक खळखळत्या आठवणी जागे करून जात होते. अशाच एका पावसाने कधी माझी आजी माझ्यापासून हिरावली होती; आणि त्याच वेळी नव्याने ओळख झालेल्या नि कालौघात सर्वोत्तम ठरलेल्या मित्रांशी गाठ घालून दिली होती. चार वर्षांपूर्वीच्या पावसाने मातृभूमी सोडताना असे काही रौद्र रूप दा़खवले होते की हाच पाऊस आपला इतका लाडका का आणि कसा असू शकतो, असा प्रश्न पडला होता. त्यावेळी नवीकोरी पुस्तके नि दप्तरे घेऊन शाळेची धरलेली वाट, रेनकोटाची टोपी मुद्दामहून काढून भिजत घरी आल्यावर आईचा खाल्लेला मार, आले-लिंबू-वेलची-पुदिना घातलेला गरमागरम चहा, हवाहवासा वाटणारा एक चेहरा, निरोप देताना पाणावलेले आईवडिलांचे डोळे, मायभूमीतला चिखल, चौपाटी, ओल्या मातीचा वास, टपरीवरचा चहा आणि वडापाव, उद्यान गणेश च्या मागचा भजीपाव, मित्रमैत्रिणीसोबतचा भिजता टाइम् पास्, सॅन्डविच् नि कॉफी, सगळे डोळ्यांतल्या ढगांमागे सारून विमानात बसलो होतो. आणि यावेळी मात्र कोणाचीतरी आयुष्यभराची साथ, स्वप्ने, आशाअपेक्षा, जबाबदारी आणि प्रेम - सगळे सामावलेली अंगठी बोटात मिरवत! पाऊस मात्र कधीचा पडतच होता नि पडतच राहिला.&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;पाऊस काय फक्त रेल्वे वाहतूक नि जनजीवनच विस्कळीत करण्यासाठी असतो? छे! तो विस्कळीत करतो एक चाकोरीबद्ध राहणीमान. तुमच्याआमच्यासारख्यांचे भावविश्व खुंटवणारी घर ते ऑफिस, ऑफिस ते घर, लन्च टाइम्, जिम्, स्वयंपाक ही चौकट. पावसासोबत न जगता आल्याने झालेली एकटेपणाची जाणीव आणि पावसाशिवायच्या स्वयंसिद्ध जगण्याची मिजास. मग काहीतरी सुचते, लिहावेसे-बोलावेसे वाटते, कोणासोबत तरी बाहेर जाऊन चिंब भिजावेसे वाटते; वाटते घरी जाऊन दिवाणावर अंग टाकून हजारदा वाचलेले एखादे आवडते पुस्तक हातात घ्यावे, आवडती गझल लावावी आणि कोणतेही पान उघडून वाचायला सुरुवात करावी; उगाचच दूरच्या मित्राला फोन लावून वाफाळत्या कॉफीचा कप हातात घेऊन तासन् तास गप्पा छाटाव्यात आणि ते सुद्धा पॅशिओचा दरवाजा सताड उघडा टाकून त्यालाही फोनवर तो पाऊस ऐकवत. वाटते जमेल तेव्हढा काळोख करून कोचावर पडावे आणि कोसळणारा पाऊस नुसता कानभर साठवून घ्यावा. बोलायचे, सांगायचे तर असते पुष्कळ पण..&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;.. पण आउटलुक मधला मीटिंग रिमाइन्डर् त्याच वेळी समोरच्या स्क्रीनवर कडमडतो. 'डिस्मिस्' म्हणावे की 'स्नूझ इन् फाइव् मिनट्स ' वर क्लिक् करावे या विचारापर्यंत पोचण्याच्या आतच हृदयाने नकळत उत्स्फूर्त प्रतिसाद दिलेला असतो - "च्यायला!"&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/20108582-7579545451143933634?l=meeakshay.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://meeakshay.blogspot.com/feeds/7579545451143933634/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=20108582&amp;postID=7579545451143933634' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/20108582/posts/default/7579545451143933634'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/20108582/posts/default/7579545451143933634'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://meeakshay.blogspot.com/2009/10/blog-post.html' title='पाऊस कधीचा पडतो'/><author><name>Chakrapani</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06931612066464984955</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-20108582.post-6864826652529539877</id><published>2009-04-07T17:38:00.009-05:00</published><updated>2009-06-07T21:04:26.146-05:00</updated><title type='text'>जेंव्हा तुझ्या बुटांना ...</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_FQLtzf2SP6k/SixxjfxpNxI/AAAAAAAABdw/qkddAoGM18g/s1600-h/shabdabandha-2009-logo.JPG"&gt;&lt;img style="TEXT-ALIGN: center; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 294px; DISPLAY: block; HEIGHT: 320px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5344771712421017362" border="0" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_FQLtzf2SP6k/SixxjfxpNxI/AAAAAAAABdw/qkddAoGM18g/s320/shabdabandha-2009-logo.JPG" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="font-size:0;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;लहानपणी अभ्यास केला नाही, पानातले सगळे विनातक्रार संपवले नाही, 'वेड्यासारखे' वागले की आई-बाबा यऽ यऽ बुकलायचे. स्वयंपाकाच्या ग्यासची हिरवी रबरी नळी, छडी, झाडू, कमरेचा पट्टा, लाटणे, सांडशी, कपडे वाळत घालायची काठी यांपैकी कशाकशाचाही काहीही उपयोग होत नाही, हे कळून चुकल्यावर चपलेने अगर बुटाने मार खाणे ठरलेले असायचे. "जोड्याने हाणले पाहिजे कार्ट्याला!"असे त्यांच्यापैकी एकानेही जरी म्हटले तरी त्याचा अर्थ आई-बाबा उभयतांनी हाणणे म्हणजे 'जोड्याने' हाणणे हाच होतो, अशी बालमनाची पक्की समजूत झालेली. सत्यनारायणाच्या पूजेला जसे मेहूण जेवते (जोडा जेवतो), तसाच प्रसाद 'जोड्याने' मिळायचा. त्यामुळे अगदी आजतागायत अभ्यास न करणार्‍या नतद्रष्ट लहानग्यांपासून ते अगदी अमेरिकेच्या अध्यक्षमहाशयांपर्यंत कोणालाही 'जोड्याने' हाणले पाहिजे असे कोणी म्हटले की हाणणार्‍या किमान दोन व्यक्ती तरी असाव्यात, असे चित्र आपसूकच उभे राहते. मात्र नजीकच्या भूतकाळात आमचा हा समज एका इराकी पत्रकाराने चुकीचा ठरवला. त्याने बुश महाशयांना चढवलेल्या बुटांच्या प्रसादावरून जोड्याने हाणणे म्हणजे एकाच व्यक्तीने दोन जोडे मारणे हा सुद्धा अर्थ होतो, हे सुद्धा मान्य करावे लागले. एका अर्थाला दुसर्‍या अर्थाची जोड (की जोडा) मिळाला.&lt;br /&gt;काही संस्कृतींमध्ये जोडे फेकून मारणे हे उच्च प्रतीच्या, नीचपणे केलेल्या अपमानाचे व्यवच्छेदक लक्षण कसे काय असू शकते, हे बाकी आम्हांला अजून समजलेले नाही. पुण्यात कमीत कमी शब्दांत जास्तीत जास्त जोडे हाणायची जी संस्कृती विकसित झाली आहे, तिची लागण या बाकीच्या संस्कृतींना झाली नसावी. बाटा, लखानी किंवा तत्सम सिंधी-गुजराती चप्पल-बूट विक्रेत्यांचे धंदे पुण्यात नीटसे चालत नसल्याचे हेच एक मुख्य कारण असावे की तिथे जोडे हाणायचे असल्यास ते पायात घालावेच लागतात अशातला भाग नाही. तिथला मराठी माणूस जोडे हाणण्यात पटाईत असल्याने वडेवाले जोशी जरी एकमेवाद्वितीय असले, तरी जोडेवाले जोशी बरेच आहेत. चप्पलबुटांची खरी गरज पडते ती मुंबईत. तिथे कफ परेड, नेपिअन्सी रोड सारख्या उच्चभ्रू वस्त्यांमधली कुत्रीमांजरीही अगदी रिबिन् बिबिन् लावलेले डिजाइनर् शूज् घालून हिंडताना आम्ही पाहिली आहेत. वार्धक्याकडे झुकू लागलेल्यांसाठी किंवा नेमाने लाफ्टर् क्लबात, प्रभातफेरीला (मॉर्निंग् वॉक् !) जिम् मध्ये जाणार्‍यांसाठी स्पोर्ट्स शूज् ; कार्यालयात जाताना, लोकलमधून प्रवास करताना घालायचे चप्पल-बूट वेगळे नि मंगल कार्यालयात जातानाचे, प्रवासाला जातानाचे वेगळे; महाविद्यालयीन युवक-युवतींसाठी आठवड्याला जो पोशाख घालायचा त्या प्रत्येक पोशाखामागे एक या दराने घालायचे चप्पल-बूट आणि सप्ताहाअंतीच्या स्नेहसंमेलनांसाठी, पार्ट्यांसाठी, ट्रेकिंग-हायकिंग साठीचे, लग्नमुंजीदी समारंभप्रसंगी घालायचे वेगळे बूट; असा सगळा जय्यत जामानिमा असतो. टाकून दिलेल्या चपला-बुटांचे पुनर्नवीकरण करायचे, पुनर्निर्माणाचे जे प्रकल्प धारावीसारख्या उद्योगजगतात आकाराला आले आहेत, त्यांच्या यशामागेही याच बहुरंगी बहुढंगी पादत्राणांचा फार मोठा हातगुण (की 'पाय'गुण) आहे.&lt;br /&gt;पादत्राणे या शब्दांपासून तयार झालेल्या विशिष्ट शब्दचमत्कृतीची मजा बालसुलभवयात सगळ्यांनीच घेतलेली आहे, याबाबत दुमत नसावे. पण नेहमीची बस/ट्रेन पकडण्यासाठी धावताना अथवा ती चुकल्यावरची पायपीट करताना, शेजारी बसलेल्या किंवा उभे असलेल्या सहप्रवाशाच्या जड ब्यागेचा किंवा त्याच्या स्वतःच्या जडत्त्वाचा त्रास सहन करताना, टॅक्सी-रिक्षावाल्यांच्या संपासारख्या बिकट परिस्थितीत तंगडतोड करताना जी पायातले (पादण्यातले नव्हे! काढलेत ना दात लगेच?!) त्राण कायम ठेवतात ती पादत्राणे हा गर्भितार्थ केवळ अनुभवातूनच उलगडत जातो. पूर्वी वधुपित्यांची पादत्राणे त्यांच्यातले त्राण जिवंत ठेवण्याऐवजी काढून घेत असल्याचे ऐकायला मिळे. मात्र हल्ली ऑनलाइन् म्याट्रिमोनीज् चे दिवस आल्यापासून हे चित्र आजकालच्या वधूंसारखेच काहीसे बदलू लागले आहे. पादत्राणांचा उपयोग फोटोत दिसणारी आपली उंची वाढवण्यासाठी, कोणत्या पोशाखावर कोणते चप्पल-बूट म्याच् होतात हा 'ड्रेसिंग् सेन्स्' दाखविण्यासाठी, आणि झालेच तर लग्नानंतर नवरा व बायको यांच्यापैकी कोणाच्या पायात किती त्राण उरणार नि कुणाचे किती संपणार, हे दाखविण्यासाठी केला जाऊ लागला आहे. एकंदरीतच चप्पल-बुटांमधील फ्याशनसंबंधी कमी पर्याय उपलब्ध असल्याने हा प्रकार वरांपेक्षा वधूंच्या बाबतीतच जास्त होतो, असे आमचे निरीक्षण आहे. गर्दीत पर्स किंवा गळ्यातली सोनसाखळी चोरणारा भुरटा चोर, विनाकारण मागे लागणारा रोड् रोमिओ किंवा नवखा, अननुभवी प्रेमवीर यांना प्रसाद म्हणून चढवायलाही आजकालच्या मुली पादत्राणांचा वापर करू लागल्या आहेत. त्यामुळे आता 'जुळले मनामनाचे नाते तुझे नि माझे' या ऐवजी 'जुळले बुटाबुटाचे नाडे तुझे नि माझे'; 'फुलले रे क्षण माऽझे फुलले रे' ऐवजी 'झिजले रे बुट माऽझे झिजले रे' अशी मंगलगीते कधी ऐकायला मिळणार याचीच आम्ही वाट पाहत आहोत. अशा बहुपयोगी उपलब्धीचे महत्त्व पटल्यामुळेच सारसबागेतला गणपती, अरण्येश्वर, पर्वती अशा ठिकाणांहून पादत्राणांच्या चोर्‍यांमध्ये लक्षणीय वाढ झाल्याचेही ऐकायला मिळते आहे.&lt;br /&gt;आज भारताच्या माननीय गृहमंत्र्यांना बूट फेकून आपल्या इराकी मित्राचे अंधानुकरण करण्याचा चावटपणा एका शीख पत्रकाराने केल्याचे पाहण्यात आले. पण मुळातच शीख बाणा हा बुटासारखे तुच्छ हत्यार न वापरता लढवय्या वृत्तीने सीमेवर छातीचे कोट करून बंदुका चालवायचा (किंवा भारतात ट्रक नि अमेरिकेत-क्यानडात टॅक्सी चालवायचा) आहे. त्यामुळे इराकी पत्रकाराच्या बूट फेकण्यातला तो जोश या मा. पत्रकार सरदारजींच्या जोडा हाणण्यात दिसून आला नाही. आणि सदैव हसतमुख नि शांत असणारे आदरणीय गृहमंत्री सुरुवातीला जरी त्या अनपेक्षित प्रीतीसुमनांनी किंचित गांगरल्यासारखे वाटत असले, तरीसुद्धा पाडगावकरांच्या 'जेंव्हा तुझ्या बटांना उधळी मुजोर वारा' च्या चालीवर 'जेंव्हा तुझ्या बुटांना उडवी दलेर माझा' असे काहीसे त्यांना सुचले असण्याची शक्यता त्यांच्या मिस्किल हसण्यावरून तरी अगदीच नाकारता यायची नाही.&lt;br /&gt;=====================================================================================&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;प्रस्तुत लेखनातून निखळ करमणूक हाच एकमेव उद्देश आहे. जाणतेपणे कुणाच्याही धार्मिक, प्रादेशिक वगैरे प्रकारच्या भावना दुखावण्याचा दुष्ट हेतू मुळीच नाही, याची कृपया नोंद घ्यावी. अजाणतेपणे कुणी दुखावेले गेले असेल, तर उदार मनाने हा लेखनापराध पोटात घालावा, ही कळकळीची नम्र विनंती&lt;br /&gt;=====================================================================================&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/20108582-6864826652529539877?l=meeakshay.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://meeakshay.blogspot.com/feeds/6864826652529539877/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=20108582&amp;postID=6864826652529539877' title='7 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/20108582/posts/default/6864826652529539877'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/20108582/posts/default/6864826652529539877'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://meeakshay.blogspot.com/2009/04/blog-post.html' title='जेंव्हा तुझ्या बुटांना ...'/><author><name>Chakrapani</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06931612066464984955</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_FQLtzf2SP6k/SixxjfxpNxI/AAAAAAAABdw/qkddAoGM18g/s72-c/shabdabandha-2009-logo.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-20108582.post-8957531538092497446</id><published>2007-09-27T04:58:00.000-05:00</published><updated>2007-09-28T20:45:12.749-05:00</updated><title type='text'>... 'परी' हिच्यासम हीच!</title><content type='html'>&lt;div align="center"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;"ऐ फूलों की रानी, बहारों की मलिका, तेरा मुस्कराना गजब हो गया" हे अख्खं गाणं साधनासाठी चुकूनच लिहिलंय असं मला फार वर्षांपासून वाटत आलं आहे. फार वर्षांपासून म्हणजे, एक - जेव्हा हे गाणं ऐकलं-बघितलं तेव्हापासून, आणि दोन - साधना कोण आणि मधुबाला कोण हे कळायला लागल्यापासून. ज्या वयात मी माधुरीच्या 'एक-दोन-तीन' वर फिदा होऊन स्वतःला अनिल कपूर समजायला सुरुवात केली होती, त्यावेळी बबिता-नंदा, नर्गिस-मीनाकुमारी, साधना-वैजयंतीमाला या जोड्या माझ्यासाठी 'कन्फ्यूजन'चं जिवंत उदाहरण ठरायच्या. पण या सगळ्यांमध्ये आपलं वेगळेपण जाणवून द्यायची, ती एक आणि एकच - मधुबाला. मधुबालाच्या बाबतीत कधीच कन्फ्यूजन झालं नाही आणि तसं होण्याचा चान्सच नव्हता!&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;टपोरे पाणीदार डोळे, गुलाबाच्या पाकळ्यांसारखे जिवंत, रसरशीत ओठ, जीव ओवाळून टाकावंसं खळखळणारं हसू, कपाळावर एकाच किंवा दोन्ही बाजूंना मिरवणारं बटेचं अर्धवर्तुळ आणि एकूणच टवटवीत व्यक्तिमत्त्वाच्या मधुबालाने कोणाच्याही मनात घर न केलं तरच नवल! मधुबालाला घडवल्यानंतर देवाने जगात सुंदर स्त्री निर्माण केलीच नाही, या माझ्या ठाम मताला अद्यापही तडा गेलेला नाही. बहुधा तिच्या जन्मानंतर देवानं तो साचाच मोडून टाकला असावा. काय योगायोग आहे पहा, मधुबालाचा जन्म १४ फेब्रुवारीचा (सन १९३३) - म्हणजे साक्षात व्हॅलेन्टाइन डे च्या दिवशीच! या दिवशी एका गुडघ्यावर अर्धवट खाली बसून तिला साधं गुलाबाचं फूल देण्याचाही योग कुणाच्या नशिबात आल होता की नाही कोण जाणे; पण हिनं मात्र उण्यापुर्‍या छत्तीस वर्षांच्या अल्पायुष्यात करोडो हृदयांवर अधिराज्य गाजवलं. वयाच्या तेराव्या वर्षी रुपेरी पडद्यावर पदार्पण करणार्‍या मधुबालानं अशोककुमारबरोबर बॉम्बे टॉकिजच्या 'महल' (आयेगा, आयेगा, आयेगा...आयेगा आनेवला...आयेगा...) मधून हिंदी चित्रपटसृष्टीत आपल्या दणदणीत पदार्पणाची वर्दी दिली आणि चाहते आणि चित्रपत्रकारिता विश्वाकडून 'वीनस ऑन द स्क्रीन'ची उपाधी मिळवली. अशोककुमारबरोबर 'हावडा ब्रिज', देव आनंद बरोबर 'काला पानी', किशोरकुमारबरोबर 'चलती का नाम गाडी' आणि 'हाफ तिकीट', भारतभूषण नावाच्या ठोकळ्याबरोबर (!! अरेरे!!) 'फागुन', 'गेटवे ऑफ इन्डिया' आणि 'बरसात की रात' हे तिचे लक्षात राहण्यासारखे काही चित्रपट. माझ्या तर ते एक से एक बढकर गाण्यांमुळे आणि त्यात दिसणार्‍या मधुबालेमुळेच लक्षात राहिलेत. हावडा ब्रिज मध्ये गोड हसून, मान वेळावून "आईयेए ए ए ए ए.......मेहेरबाँ" म्हणणारी मधुबाला कोण कशी विसरेल! चलती का नाम गाडी मध्ये "एक लडकी भिगी भागी सी" मधली साडीचा पदर पिळताना वैतागलेली आणि किशोरकुमारला करारी नजरेने खुन्नस देणारी, "पाँच रुपय्या बारा आना" मध्ये त्याच्याचबरोबर बागडणारी आणि निरागसपणे, अल्लडपणे त्याला "हाल कैसा है जनाब का" विचारणारी खट्याळ 'रेणू' कशी बरं लक्षात राहणार नाही?! गेटवे ऑफ इन्डिया मधली "दो घडी वो जो पास आ बैठे" म्हणणारी शांतस्वभावी, मंद हसणारी मधुबाला, काला पानी मध्ये "अच्छा जी मैं हारी चलो मान जाओ ना" म्हणूण देव आनंदच्या नाकदुर्‍या काढणारी मधुबाला आठवणींच्या पडद्यावरून कशी पुसली जाईल? आणि तिच्या कारकिर्दीचा कळस ठरलेला 'मुघल-ए-आझम' - तो कसा विसरता येईल? "मोहे पनघट पे नंदलाल छेड गयो रे" म्हणताना लाजून घूंघट उचलणारी पण त्याचबरोबर भर दरबारात षंढ सलीमला त्याच्या(च!) बापासमोर(च!) छातीठोकपणे "जब प्यार किया तो डरना क्या"विचारणारी अनारकली - विसरू शकू आपण तिला? मुळीच नाही!&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;या सौंदर्यदेवतेचं पडद्यामागचं आयुष्य मात्र बरंचसं इतरांसाठी जगण्यातच गेलं. आधी दिलीपकुमारची (आइच्यान!!!...दिलीपकुमार????? :( ) प्रेयसी म्हणून, मग किशोरकुमारची बायको म्हणून आणि सदान् कदा अताउल्ला खान या 'पठाणाची मुलगी' म्हणून. दिलीपकुमार आणि मधुबालाचा रोमान्स 'ज्वार भट्टा'च्या (सन १९४४) सेट्सवर चालू झाला, 'तराना' (१९५१) च्या वेळी भरात आला. 'नया दौर'च्या वेळेचे शूटिंगचे शेड्यूल दिलीपकुमारने आपल्या मुलीशी रोमान्स करण्यासाठी सोईचे असे बनवून घेतले आहे, या कारणास्तव अताउल्लासाहेबानं विरोध केला आणि मधुबालाची 'नया दौर' मधून हकालपट्टी होऊन वैजयंतीमाला त्यात आली. सायनिंग अमाउन्टच्या वादावरून निर्माते बी आर चोप्रा यांनी मधुबालाला कोर्टात खेचले आणि दिलीपकुमारने तिच्या व अताउल्लांच्या विरोधात शपथपत्र दिले. सहा वर्षांचा रोमान्स सहा मिनिटांपेक्षा कमी वेळात संपला. किशोरशी मात्र तिचा संसार तसा (बर्‍यापैकी) सुरळीत(च) पार पडला (किशोर अगदी रंगेल गडी असूनसुद्धा!) तिच्या हृदयाला भोक असल्याचे निदान होऊन ती लंडनला उपचारांसाठी गेली आणि तिकडून 'केवळ काही दिवसांचीच पाहुणी'चं सर्टिफिकेट घेऊनच आली. तरीही न खचून जाता तिने राज कपूर बरोबर सिनेसृष्टीत पुनरागमन करायचा प्रयत्न केला. पण सततच्या आजारपणामुळे तो यशस्वी ठरला नाही. डॉक्टरांना आश्चर्याचा धक्का देत लंडनहून आल्यावर मधुबाला ९ वर्षे जगली! ५० च्या दशकात तिच्या हॉलिवूडमधल्या पदार्पणाचेही प्रयत्न चालू झाले होते. 'थिऍटर आर्ट' सारख्या मासिकात तिच्यावर पानभर मोठ्या छायाचित्रासह एक लेखही छापून आला होता. पण तिचे हॉलिवूड पदार्पण तसेच राहून गेले. अन्यथा मर्लिन मन्रो वगैरेंसारख्यांना तिने टफ फाइट दिली असती, यात शंकाच नाही. २३ फेब्रुवारी १९६९ ला, आपला ३६ वा वाढदिवस साजरा केल्यानंतर १० दिवसांत मुमताज बेगम जेहान् देह् लवी - अर्थात आपल्या लाडक्या मधुबालाने सगळ्यांचा कायमच निरोप घेतला. गंमत अशी की त्या काळात तिच्यावर जी शस्त्रक्रिया होऊ शकली नाही किंवा अयशस्वी झाली, ती सध्या बरीच कॉमन समजली जाते.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;आयुष्याच्या वेगवेगळ्या टप्प्यांवर मला मधुबाला वेगवेगळ्या रूपांत दिसत आली आहे. अगदीच नकळत्या वयात मला ती नेहमीच परीकथांमधली पांढराशुभ्र फ्रॉक घातलेली, पाठीवर दोन पंख आणि हातात जादूची कांडी असलेली परी वाटायची. चलती का नाम गाडी मधली तिची खट्याळ, अल्लड, केसांना दोन रिबिनी बांधलेली निरागस रेणू कॉलेजात जाणार्‍या ताईसारखी वाटली. काला पानी मध्ये ती देवआनंदची प्रेयसी नाही, तर माझी स्वतःची गर्लफ्रेन्ड वाटली. तीच गोष्ट 'मिस्टर एन्ड मिसिज ५५' ची. आणि इतकी सालस आणि सोज्वळ की असे 'बायको मटिरिअल' आईपुढे उभे केले असते, तर तिने हसतहसत, आनंदाने होकार दिला असता ;) मधुबालानंतर माधुरी दिक्षित सोडून इतर कोणातही असा 'कुलीन गृहकर्तव्यदक्षपणा' सापडला नाही, आणि कदाचित सापडायचाही नाही. माधुरीचं मराठमोळेपण कोळणीची चोळी घालून "हमको आजकल है इन्तजार" वर नाचताना जितकं प्रसन्न आणि 'ऑब्विअस' आहे, तितकंच मधुबालाचं निर्मळ, शालीन असणं प्रसन्न आणि स्वाभाविक आहे. मराठमोळी मधुबाला पहायची असेल, तर परकर-पोलकं नेसून आणि काळ्या रिबिनी बांधून केसांच्या दोन वेण्या घातलेली 'नाच रे मोरा अंब्याच्या वनात'वर नाचणारी मधुबाला इमॅजन करा ;) म्हणजे मी काय म्हणतोय, ते ध्यानात येईल. सगळ्यात महत्त्वाचं म्हणजे अनेकदा ती माझ्या लेखनाची प्रेरणा ठरली आहे. भिंतीवरच्या तिच्या भल्यामोठ्या पोस्टरशी संवाद साधताना अस्वस्थ शब्दांना प्रसन्नतेकडे जाण्यासाठीचं तिकीट मधुबालानं फाडावं; तिला कुर्निसात करूनच शब्दन् शब्द कागदावर उतरावा, आणि भानावर यायच्या आत एखादी कविता किंवा गझल तिकडे अवतीर्ण व्हावी; केवळ शब्दांनाच नव्हे, तर मनालाही उभारी यावी, आणि या देवतेला मनोमन मानाचा मुजरा करून आपण एक 'फ्रेश' सुरुवात करायला घ्यावी, यापेक्षा अधिक समर्थ प्रेरणा दुसरी काय असेल? पडद्यावरचा तिचा सफाईदार वावर, कधी लडिवाळ, कधी करारी तर कधी धीरगंभीर, अश्रूपूर्ण डोळ्यांनी आणि कमनीय भिवयांनी बोललेले लाखो संवाद आणि गालावरच्या खळीतून उधळलेले आनंदाचे कित्येक क्षण कैक लोकांच्या आयुषातले हजारो सेकंद उजागर करून गेले असणार, यात शंकाच नाही. मधुबाला 'हॉट' नव्हती, सुंदर होती. शी वाज नॉट 'हॉर्नी', शी वाज ब्यूटिफुल. ती केवळ नावापुरती नाही, तर लौकिकार्थानं 'वीनस ऑन द स्क्रीन' होती, 'गॉडेस्' होती याबाबत दुमत नसावे. मधुबाला हे फक्त एक व्यक्तिमत्त्व, सौंदर्य, वाद, गॉसिप्स, झगमगाट नाही; ते एक चिंतन आहे, समाधी आहे, असं मला वाटतं. आणि अशी समाधी लागली की मी नेहमीच म्हणतो -&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;दो घडी वो जो पास आ बैठे, हम जमाने से दूर जा बैठे... &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;br /&gt;...झाल्या बहु, होतीलही बहु, 'परी' हिच्यासम हीच...&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;center&gt;&lt;img height="550" src="http://pic.gansudaily.com.cn/0/10/08/15/10081584_898844.jpg" width="356" /&gt;&lt;/center&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;लेखातील चित्रपटविषयक व इतर माहितीपूर्ण संदर्भः &lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Madhubala" target="_blank"&gt;विकिपिडिया&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;छायाचित्रांचे सौजन्यः गूगल इमेज सर्च&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/20108582-8957531538092497446?l=meeakshay.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://meeakshay.blogspot.com/feeds/8957531538092497446/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=20108582&amp;postID=8957531538092497446' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/20108582/posts/default/8957531538092497446'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/20108582/posts/default/8957531538092497446'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://meeakshay.blogspot.com/2007/09/blog-post.html' title='... &apos;परी&apos; हिच्यासम हीच!'/><author><name>Chakrapani</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06931612066464984955</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-20108582.post-3727800175946495134</id><published>2007-07-13T02:43:00.000-05:00</published><updated>2007-07-13T02:50:27.745-05:00</updated><title type='text'>रॅट-अ-टुइ</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_FQLtzf2SP6k/RpcuS98q3WI/AAAAAAAAAZg/bhhAnR3vVQQ/s1600-h/rat_wallsRemy_1024.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5086585207539817826" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; CURSOR: hand" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_FQLtzf2SP6k/RpcuS98q3WI/AAAAAAAAAZg/bhhAnR3vVQQ/s400/rat_wallsRemy_1024.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;आपल्याकडे संजीव कपूरच्या पुस्तकांमधून पाककृती वाचून नानाविध प्रयोग करणाऱ्या शास्त्रज्ञांच्या यादीत रेमी नावाचा एखादा उंदीरसुद्धा सामील झाला, तर तुमची काय प्रतिक्रिया असेल? जास्त विचार करू नकात. तुमच्यासमोर हे कल्पनाविश्व 'रॅट-अ-टुइ' नावाच्या एका दे-धमाल चित्रपटातून वॉल्ट डिस्ने पिक्चर्स-पिक्सार यांच्या संयुक्त विद्यमाने उभे करण्यात आले आहे. अकादमी पुरस्कार विजेते दिग्दर्शक ब्रॅड बर्ड आणि 'कार्स','फ़ाइंडिंग निमो' सारख्या चलतचित्रपटांचे निर्माते पिक्सार ऍनिमेशन्स हे या चित्रपटाच्या माध्यमातून एकत्र काअम करताना दिसणार आहेत.&lt;br /&gt;गुस्तॉव्ह नावाच्या फ़्रान्समधील संजीव कपूरचे दूरदर्शनवरील कार्यक्रम आणि त्याच्या पाककृतींचे पुस्तक यांवरून पदार्थ 'चवीने' खाण्यात आणि बनवण्यात रुची निर्माण झालेला रेमी नावाचा उंदीर पाकशास्त्राचा अभ्यास करतो. 'एनीवन कॅन कुक' हा गुस्तॉव्हचा मंत्र हा रेमीच्या आयुष्याचा मंत्र बनलाय. गुस्तॉव्हनेच रेमीला वेगवेगळ्या चवी 'शिकवल्या' आहेत. त्यामुळे समस्त उंदीर ज़मातीत रेमी एक क्रांतिकारी बनलाय. लाडका भाऊ एमिल आणि वडील, मित्रपरिवार यांच्याशी एका अपघाती विरहानंतर रेमी गुस्तॉव्हच्याच बंद पडण्याच्या मार्गावर असलेल्या पूर्वप्रसिद्ध रेस्तराँ मध्ये शिरतो. पारंपारिक प्रसिद्ध खाद्यपदार्थांची वाट न चोखाळता चायनीज़, मेक्सिकन अशा पदार्थांतून रेस्तराँचा कायापालट करणाचे गुस्तॉव्हचा उज़वा हात असलेल्या स्किनरचे बेत दिवंगत गुस्तॉव्हचा मुलगा लिंग्विनीच्या अनपेक्षित आगमनामुळे उधळले ज़ाण्याच्या बेतात आहेत. आधी पोऱ्या म्हणून भटारखान्यात रुज़ू झालेला लिंग्विनी रेमीच्या करामतींमुळे कोणतेही पाककौशल्य नसतानाही एक अप्रतिम, चवदार सूप बनवतो आणि अल्पावधीतच एक कुशल आचारी म्हणून ओळखला ज़ाऊ लागतो. लिंग्विनीमुळे आपले बेत उधळले ज़ाणार असल्याची तसेच लिंग्विनीकडे कोणतेही पाककौशल्य नसून कोणाच्यातरी 'छुप्या' मदतीने निरनिराळे पदार्थ बनवले ज़ात आहेत, याची ज़ाणीव झाल्यावर स्किनरने या प्रकरणाचा छडा लावायचा निश्चय केलाय; ज्याने लिहिलेल्या प्रतिकूल समीक्षेच्या धक्क्याने गुस्तॉव्ह मरण पावला, तो एगो नामक पाकसमीक्षक लिंग्विनीवरही डोळा ठेवून आहे; एकीकडे भाऊ, वडील, मित्रपरिवार आणि दुसरीकडे गुस्तॉव्हचा मूलमंत्र आणि सदैव बरोबर असलेले त्याचे आभासी अस्तित्त्व (त्याला 'भूत' म्हणवत नाही) अशा द्विधा मन:स्थितीत रेमी सापडलाय; भटारखान्यातलीच एक उत्तम आचारी असलेल्या कॉलेटच्या प्रेमात लिंग्विनी अडकलाय, हे रेमीला कळलंय, त्याला ते प्रेम सफल व्हावंसं वाटतंय पण त्याला एगो आणि स्किनर दोघांशी भिडायचंयसुद्धा! तुम्हाला कल्पनाही करता येणार नाही, इतक्या विविधांगी कल्पना आणि मानवी भावनांचे चित्रण रेमी, एमिल,लिंग्विनी,कॉलेट, स्किनर, एगो यांच्यापासून रेस्तराँमधील ग्राहक, भटारखान्यातील इतर कर्मचारीवर्ग, रस्त्यावरचे लोक, पशुपक्षी यासारख्या बारीकसारीक गोष्टी या सगळ्यांमधून करण्यात आले आहे. रेमी आणि लिंग्विनीची अपघातानेच झालेली मैत्री, रेमीच्या वडिलांचे त्याचे मन वळवण्याचे प्रयत्न, एमिल आणि रेमीचे अपघाती पुनर्मिलन, स्किनरशी दुष्मनी, कॉलेट आणि लिंग्विनीचं प्रेम, रेमीने बाबांना ऐकवलेलं 'चेन्ज इज़ नेचर' हे वाक्य, समस्त उंदीरमित्रांनी स्किनरची खाद्यपदार्थांच्या गोदामात बांधलेली मुटकुळी हे सगळंच प्रेक्षणीय आणि कौतुकास्पद! मनापासून दाद देण्याज़ोगं! रेमीच्या साथीने आणि प्रमुख सहभागाने बनवलेली 'रॅट-अ-टुइ' खाऊन एगोला आठवलेली स्वत:च्या आईच्या हातची चव आणि त्याच्या डोळ्यांत तरळलेलं पाणी हा चित्रपटाचा 'डिफ़ायनिंग सीन'!&lt;br /&gt;भिवया आणि डोळ्यांच्या कल्पक हालचाली आणि त्यातून जिवंत झालेली पात्रं हे डिस्नेच्या चित्रपटांचं वैशिष्ट्य या चित्रपटातही ठळकपणे ज़ाणवतं. आनंदित रेमी, रात्रीचे झगमगीत पॅरीस पाहून भारावलेला रेमी, घाबरलेला रेमी जितक्या कल्पकतेने रंगवलाय, तितक्याच कल्पकतेने त्याचे टवटवीत, उभारलेले कान गळपटवून आणि भिवया कपाळाच्या मध्यभागी एकवटवून 'तो निराश आहे' हे दाखवलंय. आळशी, बावळट लिंग्विनी, कॉलेटचे चुंबन घेऊन चक्रावलेला लिंग्विनी, 'टॉमबॉय' कॉलेट आणि लिंग्विनीवर रागावून मग रडणारी कॉलेट - एकूण एक पात्रे प्रेमात पडावीत अशी आहेत. चित्रपटाचा नायक रेमी हा तर टॉम ऍंन्ड जेरीमधल्या जेरीनंतर नंबर दोनचा 'क्यूट' उंदीर असावा; कदाचित मिकी माउसपेक्षाही जास्त. एक 'काहीच्या बाही', 'इमॅजन व्हॉटेवर' प्रकारची गोष्ट असली, तरीही तर्कसुसंगत आहे. कोठेही विस्कळीत झालेली नाही. 'लिंक तुटली' हा प्रकार कोठेही बघायला मिळत नाही. प्रसंगानुरूप श्रवणीय पार्श्वसंगीत आणि त्याला अनुकूल असा रंगीबेरंगी बॅकड्रॉप ही डिस्नेची खासियत प्रत्येक फ़्रेममधून ज़ाणवते. रंगसंगतीही प्रसंगानुरूप आणि भावानुरूप. पात्रांना त्यांचे वय, स्वभाव आणि कथानकातील भूमिका यांच्या अनुसारच आवाज़ देण्यात आले आहेत; आणि ते देताना फ़्रेंच उच्चारांकडे कटाक्षाने लक्ष पुरवण्यात आले आहे. अंधाऱ्या गोदामाचा दरवाज़ा उघडल्यानंतर आत येणाऱ्या प्रकाशाचा मार्ग, त्यानुसार होणारी सावल्यांची हालचाल, विविध प्रकारच्या भाज्या ठराविक पद्धतीने कापण्याचे आचाऱ्यांचे कौशल्य हे बारकावेही अचूकपणे टिपण्यात आले आहेत. आयसोमेट्रिक प्रोजेक्शन्स (आपण पात्राकडे/वस्तूकडे/दृश्याकडे वरच्या दिशेने तिरकस पाहत आहोत, असे मानून त्या वस्तू/पात्राचे/दृश्याचे केलेले चित्रण), 'ओवर द शोल्डर्स' शॉट्स (मुख्य पात्रावर एखाद्या दुय्यम वस्तू अगर पात्राच्या आडून केंद्रित केलेला कॅमेरा आणि टिपलेल्या हालचाली) अशा उत्कृष्ट चित्रणकौशल्याची ज़ोड मिळाल्यानंतर चित्रपट प्रेक्षणीय आणि खासम् खास झाला नाही तरच नवल. आणि चित्रपट आणखी छान करायचा म्हटला तर तो फ़ोर-डी करता येईल (तो 'छोटा चेतन' बघताना लावलेला काळा गॉगल म्हणजे थ्री-डी आणि त्याच्या ज़ोडीला तुमची सीट हादरवणारे, तिची उंची अलगद कमीजास्त करून नि कार्पेट सळसळवून किंवा तत्सम पद्धतीने तुम्ही स्वत: पडद्यावरील घटनांमध्ये सामील आहात, असा भास निर्माण करणे म्हणजे फ़ोर-डी) पण दोन-एक तासांच्या चित्रपटासाठी असे आभास निर्माण करणे आव्हानात्मक आणि कदाचित आर्थिक तसेच तांत्रिकदृष्ट्या, कथानकाच्या दृष्टिकोनातून 'फ़िज़ीबल' (मराठी प्रतिशब्द? नकोच!) नसावे.&lt;br /&gt;भारतात हा चित्रपट आहे त्या स्वरूपात पहायला मिळाल्यास उत्तम! नाहीतर रेमीचे 'रामू' करून नि हास्यास्पद भाषांतरे करून उत्तम चित्रपटांना गालबोट लावण्याची परंपरा कायम राखली ज़ाण्याचीच शक्यता जास्त. मात्र असा उत्तम चित्रपट प्रत्येक लहान मुलापर्यंत सर्वदूर पोचवण्याचे, त्यांच्या चेहऱ्यावर हसू फुलवण्याचे चित्रपट वितरकांचे प्रामाणिक प्रयत्न असतील, तर निदान पात्रांच्या नावांशी आणि संवादांशी झालेली तडज़ोड सहन करण्याचीही तयारी ठेवणे श्रेयस्कर.&lt;br /&gt;एकुणातच, लहानांबरोबरच मोठ्यांनीही मनमोकळेपणाने आनंद लुटावा, असा मस्त चित्रपट!&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;अधिक माहितीसाठी: &lt;/span&gt;&lt;a href="http://disney.go.com/disneypictures/ratatouille/main.html" target="_blank"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;रॅट-अ-टुइ&lt;/span&gt;&lt;/a&gt; &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/20108582-3727800175946495134?l=meeakshay.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://meeakshay.blogspot.com/feeds/3727800175946495134/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=20108582&amp;postID=3727800175946495134' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/20108582/posts/default/3727800175946495134'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/20108582/posts/default/3727800175946495134'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://meeakshay.blogspot.com/2007/07/blog-post_13.html' title='रॅट-अ-टुइ'/><author><name>Chakrapani</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06931612066464984955</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_FQLtzf2SP6k/RpcuS98q3WI/AAAAAAAAAZg/bhhAnR3vVQQ/s72-c/rat_wallsRemy_1024.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-20108582.post-5757127616408431496</id><published>2007-07-03T21:39:00.000-05:00</published><updated>2007-07-13T02:50:47.965-05:00</updated><title type='text'>एका पदवीदान समारंभाची गोष्ट</title><content type='html'>&lt;span style="font-size:130%;"&gt;मे २००५ मध्ये मला अभियांत्रिकीची पदवी मिळाल्यानंतर ती काळी की गोरी हे सुद्धा पहायला मिळाले नव्हते. मुंबई विद्यापिठाचा पदवीदान समारंभ डिसेंबर २००५ मध्ये पार पडला आणि तेव्हा अमेरिकेतील माझे पदव्युत्तर शिक्षण २५% पूर्ण झाले होते. त्यामुळे काळा डगला, डोक्यावर ती चौकोनी टोपी आणि हातात पदवीचे भेंडोळे अशा अवतारातला फोटो काढून मिरवायची संधी कधी मिळते, याकडे लक्ष लागून राहिलेले. साधारण दोन महिन्यांपूर्वी अमेरिकेतील माझे पदव्युत्तर शिक्षण पूर्ण होऊन 'मास्टर ऑफ़ कंप्यूटर सायन्स' ही पदवी मिळाली आणि ते स्वप्न साकार झाले. आईबाबांना समारंभाचे आमंत्रण पाठवून, त्यांचे व्हिज़ाचे सोपस्कार उरकून त्यांनी इकडे येण्यासाठी विमानात पाय ठेवेस्तोवर पदवीदान समारंभ अवघ्या तीन दिवसांवर येऊन ठेपला होता. त्यांचे तिकीट दोन वेळा बदलणे, प्रवासाची तयारी, औषधे या सगळ्यात मी अमेरिकेत असून आणि परीक्षा चालू असूनही अडकलोच होतो. आयुष्यात पहिल्यांदाच इतका मोठा प्रवास करून येण्याचा तणाव, लेकाच्या भेटीची तळमळ या सगळ्यात अनावश्यक सामानाचा व्यत्यय नको म्हणून त्यांची बॅगही मुंबई-पुणे प्रवासातल्या सामानासारखी भलतीच आटोपशीर झाली होती. आईबाबा येणार आणि आपले कौतुक करणार, शाबासकी देणार याची उत्सुकता लागून राहिली असल्याने तीन दिवसही खूप मोठा काळ वाटत होता. अमेरिकेत पहिल्यांदाच पाऊल ठेवणाऱ्या मातापित्याचे स्वागत करायला हा गडी साधारण दोन-एक तासांचा प्रवास करून डेट्रॉइटला ज़ायचा होता; पण ऐन वेळी खराब हवामानामुळे अस्मादिकांचे विमान त्यांच्या नंतर पोचले आणि मी माझ्या आईबाबांचे स्वागत करण्याऐवजी त्यांनीच माझे स्वागत केले. &lt;a href="http://www.manogat.com/node/10670"&gt;मीराताईंच्या चिरंजिवांच्या पदवीदान समारंभाबाबतचे लेखन वाचल्यानंतर&lt;/a&gt; तर खराब हवामान आणि पदवीदान यांचे जन्मजात वैर असावे, असेच वाटून गेले. विमानात मिळालेली काळीकुट्ट, दूध-साखर नसलेली कॉफ़ी आणि एका मुज़ोर हवाईसुंदरीबद्दलची तक्रारसुद्धा आई ज्या कौतुकाने सांगत होती, ते पाहिल्यावर माझ्या उच्च शिक्षणाचे आणि तिच्या डोळ्यांत तरळलेल्या आनंदाश्रूंचे चीज़ झाल्याचे वाटले.&lt;br /&gt;डेट्रॉइटला माझ्या मावसबहिणीकडे दोन दिवस घालवून आम्ही आमच्या गावी समारंभाच्या आदल्या दिवशी परतलो. आईबाबांच्या लग्नाचा आणि आईचा असे लागोपाठच्या दिवशीचे दोन्ही वाढदिवस त्यांना विमानात झोपा काढून साज़रे करायला लागल्याने आम्ही डेट्रॉइटलाच एक छोटीशी पार्टी उरकून घेतली. पदवीदान समारंभाच्या दिवशी माझ्यापेक्षा जास्त उत्साहाने आईबाबाच तयार होत होते. बाबांचा कडक इस्त्रीचा सफारी, आईची शिफ़ॉन साडी आणि मॅचिंग ब्लाउज़ आधीच ठरले असल्याने त्यांना तयार व्हायला मुळीच वेळ लागला नाही. मात्र कोणता शर्ट, कोणता टाय हे ठरवताना मात्र माझी बरीच पर्म्युटेशन्स-कॉंबिनेशन्स चालू होती. अखेर मनासारखा नट्टापट्टा झाल्यावर आम्ही घरून निघालो तेव्हा पदवीदान समारंभ अवघ्या १५ मिनिटांवर येऊन ठेपला होता. आईबाबांबरोबरच सुपरिचित &lt;a href="http://www.manogat.com/"&gt;मनोगती&lt;/a&gt; विनायककाका आणि रोहिणीकाकू, माझे मित्रमैत्रिणी, खोलीमित्र (रूममेटस) आमच्याबरोबर. त्यातच माझे दोन रूममेटसही माझ्याबरोबर ग्रॅज्युएट होणार आणि त्यातल्या एकाचे कुटंब त्याच्याबरोबर. एकूणच मोठा लवाज़मा होता.&lt;br /&gt;संपूर्ण विद्यापिठाचा पदवीदान समारंभ खूप मोठा, धडाकेबाज़ काहीसा नखरेल पण तरीही हवाहवासा. प्रॉव्हिडन्स बॅप्टिस्ट चर्चमध्ये झालेला आमच्या संगणकशास्त्र विभागाचा पदवीदान समारंभ मात्र सुनियोजित आणि आटोपशीर. मोज़की पण मोलाची भाषणे, विचारांची देवाणघेवाण आणि मग पदव्या प्रदान करण्याचा सोहळा आटोपून बाहेर पडेस्तोवर साधारण तीन तास उलटून गेले होते. छायाचित्रे काढणे, मास्तरांना भेटणे, आईबाबांच्या सगळ्यांशी औपचारीक ओळखी, गप्पाटप्पा, हास्यविनोद यांत पोटात कावळे ओरडायला लागल्याची ज़ाणीव झाली नव्हती; पण 'बिर्याणी हाउस'च्या दारातून आत शिरल्यावर मात्र गप्पांपेक्षा अधिक - खाण्यासाठी - तोंड चालू लागले. जेवण आटोपून आणि नंतरच्या गावजेवणासाठीची आवश्यक खरेदी करून घरी गेलो तेव्हा संध्याकाळचे सात वाज़ून गेले होते. विनायककाका आणि रोहिणीकाकूंना त्यांच्या गावी वेळेत पोचणे आवश्यक असल्याने गरमागरम चहा झाल्यावर त्यांनी आमचा निरोप घेतला. रात्रीच्या जेवणासाठी त्यांना थांबता आले असते तर काकूंच्या हातची कोणती डिश चाखायला मिळाली असती, हे स्वप्नरंजन मी आज़ही अधूनमधून करत असतो&lt;br /&gt;अमेरिकेतील विद्यार्थी समुदायामध्ये आपल्यातल्याच कोणाचीतरी आई आल्याचा आनंद हा इतर कोणत्याही आनंदापेक्षा मोठा असतो. आणि त्या आनंदाचा चवदार मोठेपणा हा दरदिवशी एक पदार्थ या हिशेबाने साठ-एक बटाटेवडे, तितक्याच इडल्या, चार किलो चिकन, कोलंबीभात आणि सोलकढी, पावभाजी, झुणकाभाकर नि चटणी, पराठे, थालिपिठे, पोहे नि उपमा, छोले/मटार उसळ, नानाविध भाज्या आणि मुख्य म्हणजे गरमागरम, तूप लावलेल्या पोळ्या यांच्या डिशच्या डिश काही मिनिटातच संपायला लागल्या की ठळकपणे ज़ाणवतो. एरव्ही अमेरिकेत असताना पोळी-भाजी, आमटीभात आणि बाज़ूला आंबा किंवा मिरचीचे लोणचे, पापड/तळलेली मिरची/सांडगे किंवा कोशिंबीर यांपैकी काहीतरी असा चौरस आहार दिवसातून दोन वेळा सोडाच पण दोन महिन्यांतून एकदा मिळण्याचेही सुख नाही फक्त काही दिवसच मिळालेल्या या सुखाने आम्हां सगळ्यांचे आमच्याआमच्या 'लोडशेडिंग'चे बेत एकहाती उधळून लावले; पण त्या पंधरा-सोळा मुखांनी प्रत्येक डिश चाटूनपुसून खाताना दिलेला ढेकररूपी दुवा ही माझ्या आईबाबांसाठी पुत्रविरहावरची दवा ठरणार यात मुळीच शंका नाही. आमेन!!!&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;समारंभाची छायाचित्रे &lt;/span&gt;&lt;a href="http://picasaweb.google.com/chakrapani.chitnis/Graduation" target="_blank"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;येथे&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt; पाहता येतील.&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/20108582-5757127616408431496?l=meeakshay.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://meeakshay.blogspot.com/feeds/5757127616408431496/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=20108582&amp;postID=5757127616408431496' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/20108582/posts/default/5757127616408431496'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/20108582/posts/default/5757127616408431496'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://meeakshay.blogspot.com/2007/07/blog-post.html' title='एका पदवीदान समारंभाची गोष्ट'/><author><name>Chakrapani</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06931612066464984955</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-20108582.post-5263323694172353904</id><published>2007-04-04T14:53:00.000-05:00</published><updated>2007-04-04T15:01:47.765-05:00</updated><title type='text'>शब्दसाधना</title><content type='html'>&lt;span style="font-size:130%;"&gt;मनोगत या संकेतस्थळावर श्री. द्वारकानाथ कलंत्री यांनी शब्दसाधना नावाचा एक चांगला प्रयोग चालवला आहे. व्यवहारातील, शास्त्रीय शिक्षणातील अनेक प्रचलित बिगर-मराठी शब्दांसाठी पर्यायी मराठी शब्द शोधणे/तयार करणे असे या प्रयोगाचे स्वरूप आहे. प्रस्तुत शब्दसाधना एक 'प्रयोग' म्हणून निश्चितच स्तुत्य आहे. प्रयोगातून काय साध्य होणार आहे, माहीत नाही. पण 'करून पहायला काय हरकत आहे' या भूमिकेतून करण्यास हरकत नसावी. एडिसनच्या बाबतीत असे ऐकले आहे की फ़िलामेंट म्हणून १२०० विविध वस्तू अयशस्वीपणे वापरून झाल्यानंतर तो म्हणाला की "या १२०० वस्तू फ़िलामेंट म्हणून वापरता येणार नाही, हे तरी मी आता १००% खात्रीने सांगू शकतो". शब्दसाधनेचेही असेच काहीसे असावे असे वाटते. मुद्दा हा आहे, की एडिसनकडे १२०० वस्तू वापरण्याइतकी चिकाटी होती, ती या प्रयोगात असावी. प्रयोगाअंती ज़े गवसेल, त्याचा उपयोग काय आणि/किंवा कसा, ही चर्चा काहीतरी गवसल्यानंतरच करता येईल. प्रस्तुत प्रयोगामागील प्रयोगशीलता, जिज्ञासू वृत्ती आणि धडपड याला सक्रीय पाठिंबा द्यायला निश्चितच आवडेल.&lt;br /&gt;प्रयोगाच्या संभाव्य निकालांचा किंवा त्याच्या अधिक्षेत्राचा सखोल विचार केल्यावर, शास्त्रीय लेखन, संशोधन आणि अभ्यास या क्षेत्राकडून या प्रयोगाला तसेच त्याच्या निकालाला मिळणारी मान्यता याबाबत मी पूर्णपणे साशंक आहे. नवनवीन आणि कदाचित शुद्ध मराठी शब्दांमुळे प्रचलित सोप्या आणि कदाचित अमराठी शब्दांद्वारे चालू असलेल्या अभ्यासाला,संशोधनाला प्राप्त होणारे अतिक्लिष्ट रूप निश्चितच मान्यताप्राप्त आणि उपयुक्त नाही. ऑपरेटिंग सिस्टमचा अभ्यास करताना थ्रेडसना 'धागा', प्रोसेसेसना 'प्रक्रिया' असे संभाव्य शब्द योजणे (मराठीच्या दुराग्रहापायी हे आणि असे शब्द इतरत्र पाहण्यात आले आहेत) हे त्यांच्यातला 'शास्त्रीय'पणा किंवा त्यांमागे दडलेला शास्त्रीय अर्थ यांसाठी निश्चितच मारक आहे. त्यातून ज़वळपास सारखेच भासणारे शास्त्रीय शब्द त्यांच्या अंगभूत गुणधर्मांमुळे शास्त्रीय संदर्भांत वेगळे असतात. ही सूक्ष्म अर्थभिन्नता (subtle differences) पर्यायी मराठी शब्दांच्या माध्यमातून समाविष्ट केली ज़ाईलच असे नाही. उदाहरणार्थ डेटाबेस आणि डेटा वेअरहाउस. डेटाबेस म्हणजे विदागार. मग डेटा वेअरहाउस म्हणजे काय? डेटाबेस क्रॅश झाला म्हणजे विदागार कोसळले. पण 'कोसळणे' या क्रियापदाला अपेक्षित असलेला 'डोलारा', 'उत्तुंग बहुमज़ली इमारत', आशाअपेक्षा, स्वप्नांचे बंगले यांपैकी त्या बिचाऱ्या विदागारात काहीच नाही. त्यातून शास्त्रीय संशोधन हे केवळ महाराष्ट्र किंवा भारतापुरतेच अर्यादित नाही; ते जगभर चालू असते. शास्त्रीय ज्ञानाची वैश्विक देवाणघेवाण होत असते. उद्या अशाच एका जागतिक परिसंवादात अमेरिकन, चिनी, जपानी, युरोपीय संशोधकांच्या खांद्याला खांदा लावून काम करताना डेटाबेससाठी 'विदागार'चा हट्ट धरणे यात काही समंजसपणा दिसत नाही. शास्त्रीय शिक्षणाच्या क्षेत्रात तरी शब्दसाधनेच्या संभाव्य निकालांचा आवाका इयत्ता दहावीच्य पठ्यपुस्तकांच्या पुढे ज़ाईलसे दिसत नाही, आणि तसा ज़ाऊही नये! मूलभूत शास्त्रीय शिक्षणातून अशा योग्य शब्दांची ओळख होणे स्पृहणीय आहे, पण या पायाभूत शिक्षणाद्वारे एकदा उच्च शिक्षणाचे दरवाज़े खुले खाले, की मराठमोळ्या शास्त्रीय शब्दांचे महत्त्व 'अँटिक पीस'पेक्षा फार वेगळे असेल, असे मला वाटत नाही. विमान आकाशात उडवायलाच आणि उडायला लागेपर्यंतच लाँचपॅड आवश्यक असते ऍट्रिअम आणि व्हेंट्रिकलसाठी अलिंद आणि नीलय माहीत असावे; पण माहीतच असावे.&lt;br /&gt;प्रादेशिक संपर्क आणि प्रसार माध्यमे, दृक् श्राव्य माध्यमे (ज़से बातम्या इ.), व्यासपिठावरील मराठी या क्षेत्रांमध्ये शब्दसाधनेच्या माध्यमातून अपेक्षित सुधारणा निश्चितच घडवता येतील. मात्र चित्रपट, मालिका इत्यादींमध्ये - जे साहित्यिक किंवा लिखित मराठीपेक्षा दैनंदिन जीवन, व्यापारउदीम, शास्त्रीय/राजकीय/सर्वसामान्य आणि सर्वमान्य सामाजिक कल्पना यांचे प्रतिबिंब आहेत; ज्यातून 'बोलले' ज़ाते, संवाद साधला ज़ातो - या साधनेच्या निकालाबरहुकूम नवीन (योग्य?) शब्दांचा भरणा झाला, तर त्याला मान्यता मिळणे नाही. साधेसोपे शब्द सापडले, ते ज़र सद्य शब्दांची क्लिष्टता कमी करत असतील, तरच त्यांना मान्यता मिळावी. पण बोली मराठी, शास्त्रीय शिक्षण या क्षेत्रामधील डेटाबेससारख्या शब्दांमधला सोपेपणा विदागारसारख्या शब्दांतून आणखी सुधारेल, असे म्हणणे मला पटत नाही. किंबहुना त्यामुळे क्लिष्टता वाढते. उद्या माझ्या बंगाली मैत्रिणीला 'चल चित्रपट देखने जाते है' म्हटले (चित्रपट हा हिंदी शब्दही आहे आणि आम्हा दोघांची संवाद साधण्याची सामाईक भाषा हिंदी किंवा इंग्रजी आहे, हे गृहीत धरून), तर संपलेच! भिन्न संस्कृती, भाषा, आचारविचार यांची सरमिसळ आपल्याच समृद्धीसाठी उपयुक्त ठरत असेल, तर आपलेच पाय ओढण्याचा पारंपारीक मराठी बाणा काय कामाचा? मराठी भाषा प्राचीन काळापासून आज़तागायत कित्येक अमराठी शब्दांच्या समावेशातूनही समृद्धच होत आली आहे, आणि राहीलही. त्यामुळे अमराठी शब्दांच्या समावेशातून तिच्या अस्तित्त्वाबाबत चिंता करण्याचे काहीच कारण नाही. त्याचबरोबर शब्दसाधनेच्या प्रयोगाला तात्त्विक विरोध असणाऱ्यांच्या मराठिविषयीच्या प्रेमाबाबत शंका घेण्याचेही कारण नाही. इंग्रज़ाळलेली व्यापारी मराठी वर्तमानपत्रे, बातमीपत्रे, सरकारी दप्तरे, लिखित साहित्य इत्यादींमधील अपेक्षित सुधारणा हे या साधेनेचे उद्दिष्ट असलेच पाहिज़े, त्याबाबत हट्ट ज़रूर असावा; पण दैनंदिन व्यवहार आणि शास्त्रीय शिक्षण या क्षेत्रांमध्ये अशा शब्दांचा प्रवेश ही घुसखोरी किंवा अतिक्रमण ठरू शकेल आणि हट्टाला दुराग्रहाचे किंवा अतिरेकाचे स्वरूप प्राप्त होईल, ज़े निश्चितच अपेक्षित नसावे. प्रयोगाचे अपेक्षित अधिक्षेत्र निश्चित करून ही धडपड पुढे रेटली, तर उत्तम!&lt;br /&gt;तेव्हा हा प्रयोग यापुढे या निश्चित मर्यादित उद्दिष्टांसह पुढे नेल्यास आनंद होईल. शब्दसधनेत याआधीही काही वेळा सहभागी होतो, पुढेही राहीन. पण त्याचबरोबर मराठीतीलच एक ख्यातनाम साहित्यिक दत्तो वामन पोतदार यांचा 'बहुभाषक व्हा' हा संदेश येथे उधृत करायचा मोह आवरत नाही.&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/20108582-5263323694172353904?l=meeakshay.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://meeakshay.blogspot.com/feeds/5263323694172353904/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=20108582&amp;postID=5263323694172353904' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/20108582/posts/default/5263323694172353904'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/20108582/posts/default/5263323694172353904'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://meeakshay.blogspot.com/2007/04/blog-post_04.html' title='शब्दसाधना'/><author><name>Chakrapani</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06931612066464984955</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-20108582.post-8426762892978818281</id><published>2007-04-02T05:34:00.000-05:00</published><updated>2007-04-02T05:36:36.262-05:00</updated><title type='text'>मैंने प्यार किया - सुरुवात</title><content type='html'>&lt;span style="font-size:130%;"&gt;प्रेमाच्या बाबतीत तर मला पाडगावकरांचं 'तुमचं आमचं अगदी सेम असतं', हे मुळीच पटत नाही. म्हणजे प्रत्येकाचं प्रेम त्याच्या किंवा तिच्यासाठी इतकं जिवलग आणि खास असतं की ते इतर कुणासारखं होऊच शकत नाही. मग त्यात फोनवरचं तासन् तास बोलणं असो; समुद्रकिनाऱ्यावर एकत्र हिंडणं, एकत्र खाल्लेली भेळ किंवा भुट्टा किंवा 'कच्ची कैरी'चा गोला असो; की क्लासला ज़ातो/ते आहे सांगून बागेत भेटणं असो. सगळं अगदी स्पेशल आणि इतरांपेक्षा वेगळंच असतं. वह्यापुस्तकांतून 'आज़ कुठे कधी भेटायचं' ठरवणाऱ्या चिठ्ठ्या पास करणं हे प्रेम असतं; दूधवाला, किराणा सामान, डॉक्टर, इलेक्ट्रिसिटी यांची बिलं त्या त्या पाकिटात भरून ठेवताना चुकणारे हिशेब आणि त्यावरून ऐकू येणारे 'तू म्हणजे ना डोक्याला ताप आहेस नुसता/ती!', हे प्रेम असतं; आणि ज्या भावलीसाठी आजीकडून स्वेटर विणून घेतला, तिच्या डाव्या डोळ्याच्या ज़ागी दिसत असणारं नुसतंच भोक आणि डोक्यावरचे तुरळक केस यांची पर्वा न करता तिला कुशीत घेऊन झोपणं, हे सुद्धा प्रेमच असतं. इतकं विविधांगी प्रेम कसं बरं सेम असू शकेल? मी प्रेम केलंय ते अशा सेम नसलेल्या प्रेमावर.&lt;br /&gt;प्रेम ही संकल्पना, किंवा तिचा आपण लावत असलेला अर्थ, या दोन गोष्टी एकत्र किंवा आळीपाळीने स्थलकालपरत्त्वेच नव्हे तर वयपरत्त्वेही बदलत असतात, असं माझं ठाम मत आहे. मी जेव्हा पहिल्यांदा प्रेमात पडलो, तेव्हा भातुकली खेळणाऱ्या माझ्या बालमैत्रिणीच्या प्रेमात पडलो होतो; भातुकली खेळताना ती ज्या रिअल लाइफ़ 'सांसारीक' सिच्युएशन्स तयार करायची, त्यांच्या प्रेमात पडलो होतो; की भातुकलीसाठी तिच्या घरून मिळणाऱ्या 'पेप्पी' आणि 'अंकल चिप्स'च्या प्रेमात पडलो होतो, हे सांगणं कठीण आहे. आमच्याच काही मित्रमैत्रिणींची त्या 'अंकल चिप्स'सारखीच कुरकुरीत प्रेमं (प्रेम या शब्दाचं अनेकवचन काय आहे हो?) आम्ही  आज़ही एन्जॉय करतो. तेव्हा आम्हा दोघांची एक प्रतिक्रिया नेहमीच असते - "आपलं 'लफ़डं' कधी झालंच नाही!" पोरं कसली दिवटी आहेत, याची ज़ाणीव आमच्याआमच्या आईबाबांना वेळीच झाल्याने भातुकलीमधले आमचे 'आई-बाबा' हे रोल्स 'ताई-दादा' मध्ये बदलणे, हे असं लफ़डं न होण्याचं कारण असावं. लफ़डं हे 'प्रेम इन इटसेल्फ़' आहे, असं मला नेहमीच वाटत आलंय. प्रेमाची खुमारी लफ़ड्यात अनुभवायला मिळण्याचं भाग्य फार कमीज़णांच्या नशिबात असतं. तुमचंआमचं लफ़डं सलमान-कतरीनाच्या लफ़ड्यासारखं स्टारडस्ट किंवा चित्रलेखाच्या मुखपृष्ठावर झळकणारं, झगझगीत नसलं तरी किमान आईबाबांपासून चोरून ठेवण्यासारखं, मित्रमैत्रिणींच्या कौतुकाचा आणि वाती वळताना साठेमामींच्या जिव्हाळ्याचा विषय ठरू शकणारं नक्कीच असतं. मराठीच्या पुस्तकातली बालकवींची 'पारवा' तोंडी परीक्षेला आहे, हे माहीत असूनही पाठ नसते, आणि करताही येत नाही. पण परदेसमधलं 'दो दिल मिल रहे हैं' अथपासून इतिपर्यंत मुखोद्गत व्हायला अजिबात कष्ट पडत नाहीत. क्लास बंक करून प्लाझाला पिक्चर बघायचा. मग बिल्डिंगखाली आल्यावर आधी वर कोणी ज़ायचं आणि मग अर्ध्या तासाने कोणी ज़ायचं याचं प्लानिंग करायचं. झालंच तर गणपतीच्या मखराची सज़ावट करताना, तिची किंवा त्याची आयडिया कितीही आवडली, तरी मुळीच पाठिंबा न देता इतरांवर त्याचा निर्णय सोपवून, 'मी डावा गाल खाज़वला म्हणजे मला तुझी आयडिया आवडली', हे प्लान करायचं. किती ही सृजनशीलता! प्रेमात पडल्यावर काय काय पापड लाटावे लागतात, हे त्या बिचाऱ्या प्रेमवीरांनाच ठाऊक असतं. आणि त्यांच्या या धाडसाला 'लफ़डं' म्हणून सारी दुनिया या प्रेमाला एक नकारात्मक छटा देऊन टाकते. अशा कित्येक लफ़ड्यांवर मी मनापासून प्रेम केलंय - स्वत:ची नसली तरी!&lt;br /&gt;'बाज़ारात दालचावलचे भाव काय आहेत', किंवा 'प्रेम कशाशी खातात कळतं का तुला' वगैरे घिसेपिटे प्रश्न प्रेमात तहानभूक हरवलेल्यांना कसे हो पडणार? आपल्या जानेमनला शाहरूख 'जाम म्हणजे जाम' इतका (कदाचित आपल्यापेक्षाही जास्त!) आवडतो, हे माहीत असलं की 'कुछ कुछ होता है' बघताना तिकिटावर किती उडाले की उडवले, याचा विचार करायचा नाही, हे त्यांना कळतं. त्याचबरोबर जिप्सीतली पावभाजी या महिन्याच्या उरलेल्या पॉकेटमनीत बसणार नाही, हे सुद्धा त्यांना नक्कीच माहीत असतं. त्याला आवडतो म्हणून मी माझा मोरपिशी पंजाबी घालायचा नि त्यावर काळी ओढणी घ्यायची; आणि तिला आवडत नाही म्हणून मी पर्पल लूज़र घालायचा नाही, हे त्यांना कळतं. पहिल्या मज़ल्यावरून ती बघते आहे म्हणून चौकात क्रिकेट खेळताना आपली विकेट ज़ाऊ द्यायची नाही हा त्याचा निर्धार असतो - बॉल मांड्यांवर ज़बरी शेकत असला तरी! आणि वर्गात बसून असाइनमेंट पूर्ण करत असला, तरी त्याचं लक्ष नाटकाच्या तालमीत आहे, हे माहीत असल्याने डायलॉग विसरायचा नाही, याकडे तीही कटाक्षाने लक्ष देते. शाळाकॉलेजातून बाहेर पडल्यावर नोकऱ्या केल्या, गाठीशी चार पैसे ज़मायला लागले, आणि घरच्यांनी स्थळं बघायला सुरुवात केली, की घरी सांगायचं हा बेत तर कितीतरी आधीपासून तयार असतो. नव्या ज़मान्यातले साहित्यविश्वातले कित्येक अनामिक कवी हे प्रेमाचीच देणगी आहेत. चार ओळी असोत किंवा चाळीस; छंदात असो वा नसो, गझल असो की मुक्तक की चारोळी; पण ते कविता करतात आणि स्वतःला व्यक्त करतात. सुरात गाता येत नसलं तरीही ऑर्केस्ट्रा ऑडिशन्ससाठी किंवा अभिनयाचं अंग नसतानाही नाटकासाठी नाव देतात. असं अचूक प्लानिंग, असंख्य तडज़ोडी शिकवणारं प्रेम, काहीतरी करून दाखवण्याची आणि स्वतःचं वेगळं अस्तित्त्व निर्माण करण्याची ऊर्मी ज़ागवणारं प्रेम, असंख्य कवितांमधून व्यक्त होणारं प्रेम - या प्रेमावर मी प्रेम केलंय. डाळतांदळाचे भाव आणि गझलेचं व्याकरण माहीत असूनही!&lt;br /&gt;कधीकधी नकोसं वाटतं असं प्रेम करणं. जेव्हा कुणी अमृता देशपांडे, रिंकू पाटील जिवंत ज़ाळली ज़ाते. जेव्हा आपण हृतिक रोशनसारखे दिसत नाही किंवा आपल्याकडे होंडा सिविक नाही, हे कोणालातरी कळतं. आमच्या वयात वर्षाचं अंतर आहे; ती जैन आहे, मी कोकणस्थ चित्पावन आहे आणि आम्ही पुढे गेलोच तर नक्की कोणालातरी हार्ट ऍटॅक येणार, याची ज़ाणीव होते. तिचे बाबा लार्सन ऍंड टूब्रोमध्ये जी एम आहेत आणि माझे बाबा मंत्रालयात हेडक्लार्क, हे लक्षात येतं. आधीचं गुलाबी लफ़डं नुसतं लफ़डं राहत नाही, तर त्याचं 'सॉलिड प्रकरण' बनतं, कधीकधी दारावर पोलीसही येतात. मोरपिशी पंजाबी घालावासा वाटत नाही की जिप्सीत ज़ावंसंही वाटत नाही. क्रिकेट खेळताना क्लीन बोल्ड होऊनही फरक पडत नाही. मग एकमेकांच्या सुखासाठी प्रार्थना करत प्रेमवीर आपापल्या रस्त्याने चालू पडतात. पण प्रेमाची अनुभूती घेऊन आणि त्या अनुषंगाने मिळणारे 'लाइफ़ मॅनेजमेंट'चे धडे घेऊनच.&lt;br /&gt;इतक्या गहन आणि सर्वांगसुंदर विषयावर सर्वसमावेशक धडी देणारा मी कोणी 'लव्ह गुरु' नाही. पण ढोबळमानाने या प्रेमाचे अनेक प्रकार आणि स्वतःला तसेच इतरांना आलेले अनुभव, प्रेमातल्या टिप्स आणि पिटफ़ॉल्सचं प्रामाणिक चित्रण या मालिकेद्वारे करण्याचा प्रयत्न आहे. अनुभवी प्रेमवीरांना यात स्वतःला हुडकता आले, तर आनंदच आहे. आणि होतकरू प्रेमवीरांसाठी ही मालिका अगदी नवनीत गाईड नाही, पण किमान क्विक रेफ़रन्स पॉकेट डिक्शनरी स्वरूपातले मार्गदर्शक ठरले, तरी खूप आहे!&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/20108582-8426762892978818281?l=meeakshay.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://meeakshay.blogspot.com/feeds/8426762892978818281/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=20108582&amp;postID=8426762892978818281' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/20108582/posts/default/8426762892978818281'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/20108582/posts/default/8426762892978818281'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://meeakshay.blogspot.com/2007/04/blog-post.html' title='मैंने प्यार किया - सुरुवात'/><author><name>Chakrapani</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06931612066464984955</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-20108582.post-6281710083149711871</id><published>2007-03-07T12:48:00.000-05:00</published><updated>2007-03-07T12:49:32.906-05:00</updated><title type='text'>ऍडवायज़र &lt;-&gt; बडवायज़र &lt;-&gt; अपार्टमेंट &lt;-&gt; डिपार्टमेंट (३) - अ</title><content type='html'>&lt;span style="font-size:130%;"&gt;सध्या अमेरिकेतील विद्यापिठांमध्ये पैशाची अतिशय चणचण भासते आहे, असे सगळीकडे ऐकायला मिळते. त्याला अनुसरूनच, पदव्युत्तर शिक्षणासाठी इकडे येणाऱ्या भारतीय विद्यार्थ्यांना विद्यापिठाकडूनच आर्थिक मदत मिळण्याचे सुगीचे दिवस आता सरलेत. कोणत्याही ज्ञानशाखेत केवळ 'मास्टर्स' करायचे असेल, तर विद्यापिठाकडे पैसा नाही; मात्र 'डॉक्टरेट' करायची असेल, तर शुल्कमाफ़ी आणि ज़ोडीला अध्यापन अगर संशोधनात प्राध्यापकांना सहाय्य करण्याच्या मोबदल्यात मासिक भत्ता द्यायला ज़वळपास सगळीच विद्यापिठे एका पायावर तयार आहेत. आमचे विद्यापीठही याला अपवाद नाही. मात्र पैसा नसल्याची ओरड करणाऱ्या विद्यापिठांमधील एकेका प्राध्यापकाची विद्यापिठीय जन्मकुंडली (म्हणजे त्यांनी आतापर्यंत विद्यापिठात राहून काय काय संशोधन केले आहे, कुठले कुठले विषय शिकवले आहेत इ.) पाहिली, की त्यात सगळेच शुभग्रह धनलाभाच्या घरात ठाण मांडून बसलेले दिसतात. आणि गंमत म्हणजे या घरात कधीच शनी वक्री किंवा राहूकाल वगैरे प्रकार नसतो!&lt;br /&gt;विद्यापिठात पाय ठेवताक्षणी 'मध्यमवर्गीय' भारतीय विद्यार्थ्याने करावयाची गोष्ट म्हणजे प्राध्यापकांच्या भेटीगाठी घेणे आणि कुणाकडे काही छोटेमोठे संशोधन संबंधित काम असेल, तर ते बिनपगारी करण्याची तयारी दर्शविणे. त्यामागे, पुढेमागे या महाशयांना आपले काम आवडेल, आणि आपल्याला पुढच्या सत्रापासून शुल्कमाफ़ी तसेच मासिक भत्त्याची दिवाळी भेट मिळेल, हे प्राध्यापक महोदय मग आपल्याला प्रबंधलेखनात नि संबंधित संशोधनात मार्गदर्शन करण्यासाठी आपले 'ऍडवायज़र' होतील, अशी भाबडी अपेक्षा! आल्याआल्याच ज्या महाभागाला आपण ओळखतही नाही, त्याच्यावर 'इंप्रेशन' मारायचे म्हणजे काय काय करायला लागते, यासंबंधीचे आवश्यक (?!) मार्गदर्शन इतर सिनिअर मंडळींकडून झालेले असतेच. प्राध्यापकाला आधी पत्र लिहून, त्यासोबत आपला 'रेझ्युमे' ज़ोडून भेटीची वेळ ठरवणे, इथपर्यंत बहुतेक सगळेच विद्यार्थी यशस्वी होतात, आणि भेटीच्या दिवशी ठरलेल्या वेळेच्या अर्धा तास आधीच प्राध्यापकाच्या कार्यालयाबाहेर येऊन बसतात. २००५ सालच्या ऑगस्ट महिन्यात मी सुद्धा असाच एका विद्वानाच्या कार्यालयाबाहेर ताटकळत होतो.&lt;br /&gt;"कम इन छ.. छचछ..क..र..पॅ.. नि.." माझ्याच नावातली शेवटची तीन अक्षरे उच्चारल्याची ज़ाणीव जेव्हा मला झाली, तेव्हा मी आत ज़ायला उठेपर्यंत प्राध्यापकसाहेब स्वतः मला रीतसर आत घेऊन ज़ाण्यासाठी आले होते. त्यांच्याशी हस्तांदोलन करून आत गेलो नि त्यांच्या समोर बसलो. माझी प्राथमिक ओळख वगैरे करून दिल्यानंतर मग मुद्द्याचे बोलणे चालू झाले.&lt;br /&gt;"सो विच ऑफ़ माय प्रॉजेक्टस फ़सिनेट यू द मोस्ट?" या त्यांच्या प्रश्नाला मी पाठ केलेले उत्तर दिले. आदल्या रात्री साहेबांची प्रॉजेक्टस नज़रेखालून घालून त्यांवरची टिपणे तयार करण्यात, त्यांच्याशी संबंधित तांत्रिक बाबींचा अभ्यास करण्यात मी जी तन्मयता आणि वेळ खर्च केले होते, तेच मी इंजिनिअरींगला असताना तेव्हाच्या अभ्यासात केले असते, तर फ़र्स्ट क्लास ऐवजी डिस्टिंक्शन नक्कीच मिळवले असते.&lt;br /&gt;"बट यू सी धिस प्रॉजेक्ट हॅज़न्ट गॉट एनी फ़ंडस यट! आय हॅव फ़ाइल्ड ए नाइस प्रपोज़ल फ़ॉर इट ऍंन्ड आय ऍम होपिंग टु गेट टु मिलिअन डॉलर्स फ़ॉर इट. बिसाइडस दॅट रेस्ट ऑफ़ माय प्रोजेक्टस आर बिंग हॅन्डल्ड बाय माय पी एच डी स्टुडन्ट्स ऑलरेडी. सो डु यू वॉंट टु वेट फ़ॉर द अप्रूव्हल फ़ॉर धिस वन?"&lt;br /&gt;माझ्या वडिलांच्या चाळीसएक वर्षांच्या सरकारी नोकरीत त्यांनी घेतलेल्या पगारांची नि भत्त्यांची बेरीज़सुद्धा दोन मिलिअन डॉलर्स झाली नसती. मी न म्हणण्याचा प्रश्नच नव्हता; पण महाशयांच्या आणखीही अटी होत्याच.&lt;br /&gt;"यू विल ऑल्सो हॅव टु टेक माय कोर्स इन द नेक्स्ट सेमेस्टर ऍंड ऑब्टेन ऍन ए ग्रेड इन इट. बाय द वे शी इज़ माय वाइफ़ एलिया..." संगणकाच्या पडद्यावरील आपल्या नि आपल्या सौभाग्यवतींच्या, ग्रीसच्या कुठल्याशा समुद्रकिनाऱ्यावर घालवलेल्या सुटीतील, 'स्क्रीनसेव्हर' म्हणून अवतरलेल्या एका फ़ोटोकडे निर्देश करून ते म्हणाले.&lt;br /&gt;"ही आमची कवळ्याची शांतादुर्गा. हे माझे आईबाबा. आणि ही माझी गर्ल..फ़्रें....." 'सांगू का मी पण सांगू' या आवेशात पण मनातल्या मनातच मीही.&lt;br /&gt;म्हणजे आता पुढच्या सत्रापर्यंत थांबायचे? तोवर एखादी कामचलाऊ नोकरी करणे आलेच. नोकरी, अभ्यास सांभाळून यांचे काम करायचे म्हणजे मी लवकरच निजधामाच्या वाटेवर निघणार, हे मला डोळ्यांसमोर दिसू लागले.&lt;br /&gt;"वुड यू लाइक टु हॅव सम फ़्राइज़? लेट अस गो फ़ॉर लंच इफ़ यू आर नॉट डुइंग एनिथिंग ग्रेट" महाशय खाण्यापिण्याच्या बाबतीत अगदी उदार दिसतायत. पण आज़च्या संकष्टीच्या दिवशी यांच्याकडे साबुदाणा खिचडीची मागणी कशी करायची? बरे पहिल्याच भेटीत कॉफ़ी किंवा सरबत तरी कसे मागायचे? माझा भिडस्तपणा असा नको तिथे नडतो! शेवटी कशीबशी उरलीसुरली भेट संपवून बाहेर पडलो. इतर दोन प्राध्यापकांकडूनही ज़वळपास सारखीच उत्तरे मिळाली. कोणाकडेच बिनपगारी काम न करता मी गपगुमान माझे स्वतःचे काम करायला सुरुवात केली.&lt;br /&gt;माझ्याचसारखे अनुभव इतर काही मित्रांनाही आले होतेच. अशाच एका संध्याकाळी घराबाहेरच्या कट्ट्यावर अड्डा ज़मला असताना सगळ्यांनी आपापले अनुभव वाटून घेतले.&lt;br /&gt;"अरे वो बंदा बोला उसको सी प्लस प्लस मे कोड करनेवालाही कोई चाहिये"&lt;br /&gt;"क्या बात कर रहा है! मुझे तो बोला प्रॉजेक्ट मे सी प्लस प्लस की कोई ज़रूरत है ही नही वैसे. अजीब आदमी है यार!"&lt;br /&gt;"मैने तो सोचा था उसके लिये वो गणेशजी की छोटीवाली मूर्ती और एक बॉक्स आग्रे का पेठा लेके जाउंगा. पर भूल गया..."&lt;br /&gt;"अबे तू प्रॉफ़ के पास जानेवाला था की मंदिर में? पागल हो गया है क्या तू?"&lt;br /&gt;अशी कित्येक सुखदु:खं मी पहिल्या सत्राच्या सुरुवातीच्या दोनेक महिन्यात बऱ्याचदा ऐकली होती.&lt;br /&gt;अभ्यासक्रमाच्या तिसऱ्या सत्रात मात्र एका भारतीय प्राध्यापकाच्या मार्गदर्शनाखाली स्वतंत्र संशोधन करण्याची संधी मिळाली आणि तिथूनच ऍडवायज़र या व्यक्तिरेखेशी ज़रा ज़वळून संबंध आला.&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/20108582-6281710083149711871?l=meeakshay.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://meeakshay.blogspot.com/feeds/6281710083149711871/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=20108582&amp;postID=6281710083149711871' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/20108582/posts/default/6281710083149711871'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/20108582/posts/default/6281710083149711871'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://meeakshay.blogspot.com/2007/03/blog-post_07.html' title='ऍडवायज़र &lt;-&gt; बडवायज़र &lt;-&gt; अपार्टमेंट &lt;-&gt; डिपार्टमेंट (३) - अ'/><author><name>Chakrapani</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06931612066464984955</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-20108582.post-5235282650565871642</id><published>2007-03-02T04:14:00.002-05:00</published><updated>2008-06-18T04:18:04.886-05:00</updated><title type='text'>बायको</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_FQLtzf2SP6k/SFjSxj-47MI/AAAAAAAAAzY/J8y52dIXqA4/s1600-h/shabdabandha-firstoriginal.JPG"&gt;&lt;img style="margin: 0pt 10px 10px 0pt; float: left; cursor: pointer;" src="http://1.bp.blogspot.com/_FQLtzf2SP6k/SFjSxj-47MI/AAAAAAAAAzY/J8y52dIXqA4/s200/shabdabandha-firstoriginal.JPG" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5213148317595790530" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;'बायको' या शब्दाशी ओळख पहिल्यांदाच झाली, ती परीकथांमधून. राजाची 'बायको' म्हणजे राणी; वाघीण किंवा सिंहीण ही सुद्धा अनुक्रमे वाघाची नि सिंहाची 'बायको'च असायची. अगदी रामायण-महाभारतापासून ते अलीकडच्या परीकथांपर्यंत सगळीकडे राक्षससुद्धा कोणाला पळवायचे असले, की नेमका 'बायको'लाच पळवायचा. त्यामुळे 'बायको' ही जगातील सगळ्यात मौल्यवान गोष्ट आहे, अशी बालमनाची पक्की समज़ूत झालेली. परिणामी, "यावर्षी वाढदिवसाला काय घ्यायचं बंड्याला?", असं आजीने विचारलं की मीही बिनधास्त "आजी, आपण मला बायको घेऊया का?" म्हणत असे. मुंजीच्या वेळी मामालाच "मुलगी बायको म्हणून दे नाहीतर चाललो काशीला!", असे धमकावून सांगायची संधी मिळाली खरी, पण माझ्या परमप्रिय प्रतापी मामेबहिणीकडून बार्बी, मोटारगाड्या आणि भातुकलीवरून  गालावर उमटवून घेतलेली बोटं आणि ओरखडे (वेळीच!) आठवले आणि 'काशी नको, पण ही महामाया आवर' स्थितीत मामाही स्वस्तात सुटला. अशा 'बायको'ला राक्षस का नि कसा पळवतो, याचं राहून राहून आश्चर्य वाटायचं.&lt;br /&gt;परीकथांचे दिवस संपले आणि बायको ही संकल्पनाही हळूहळू बदलत गेली. एक पळवायची गोष्ट या स्थानावरून 'बायको'ला बढती मिळाली आणि ती उटीच्या बॉटनिकल गार्डनवरच्या उतरत्या हिरवळीवरून  सलमान खानबरोबर लोळत येणारी 'मैंने प्यार किया' मधली भाग्यश्री पटवर्धन (पटवर्धन!), 'कयामत से कयामत तक' मधल्या आमीर खानला मागून धावत येऊन मिठी मारणारी जुही चावला किंवा झालंच तर ज्याचं नावही आज़ आठवत नाही अशा तद्दन टुकार चित्रपटातली, मिथुन चक्रवर्तीने झोपेतच हात पकडला म्हणून (आनंदाने!!!) दचकलेली रती अग्निहोत्री, अशा निरनिराळ्या (हव्याहव्याशा!) रुपात समोर यायला लागली. 'हम आपके हैं कौन' मधली सोज्वळ माधुरी हीच बायको आणि 'सबसे बडा खिलाडी' मध्ये कितीतरी मादकपणे 'भरो, मांग मेरी भरो' गाणारी ममता कुलकर्णी (कुलकर्णी!!) ही ('मांग मेरी भरो' म्हणाल्याने कितीही वाटली तरी) बायको नाहीच, हे सुद्धा व्यवस्थित समज़ायला लागलं. शाळेतलं आपलं पहिलं क्रश म्हणजेच आपली बायको, या समज़ुतीतून मग कविताबिविता लिहिणं, तिच्याचसाठी मधल्या सुटीत मैदानात भटकणं, ती शाळेत यायच्याआधी नि शाळा सुटल्यावर तिच्या बसस्टॉपवर घुटमळणं असली मजनुगिरी; आणि याचंच थोडं 'ज़ाणकार'(!) रूप म्हणजे कॉलेजात साज़रे केलेले व्हॅलेंटाइन डेज़, रोझ डेज़, भेट म्हणून दिलेली चॉकलेटं वगैरे सगळं. बहुभार्याप्रतिबंधक कायदा वगैरे गोष्टींच्या अस्तित्त्वाचीही ज़ाणीव नसल्याने या सगळ्या गोष्टी केवळ एकाच मुलीपुरत्या मर्यादित न ठेवता आज़वर 'बायको'साठी म्हणून निश्चित केलेल्या निकषांवर खरी उतरणारी किंवा उतरवली ज़ाणारी कुणीही मुलगी लैलाच्या भूमिकेत चपखल बसायला लागली आणि आयुष्यातलं बायकोचं स्थान पटकावायला कित्येक पर्याय उपलब्ध झाले.&lt;br /&gt;तेही वय मागे पडल्यानंतर मात्र मित्रमैत्रिणींसोबत दंगामस्ती नि उनाडक्या करण्याबरोबरच बायको 'कशी' हवी, 'का' हवी अशा अनेक प्रश्नांवर 'गंभीर' या प्रकारात मोडणाऱ्या चर्चा होऊ लागल्या. 'दिल चाहता है' मध्ये 'जो खुद जिये और मुझे जिने दे, ज़्यादा इमोशनल-विमोशनल ना हो' म्हणून आमीर खानने 'बायको'ला आणखी एक 'डायमेन्शन' ('मिती' हा काय बोअर शब्द आहे!) दिलं. सासूसुनांच्या मालिकांमधून स्मृती मल्होत्रा ज़शी बायको असू शकते, तशीच सुप्रिया पिळगावकरही बायको असू शकते, हे सुद्धा ज़ाणवलं. मग मला समज़ून घेणारी, माझ्या आवडीनिवडींशी बऱ्यापैकी मिळत्याज़ुळत्या आवडीनिवडी असणारी, मतमतांतरांचा आदर करणारी नि त्याबरोबरच स्वतःला मोकळेपणाने व्यक्त करू शकणारी, सुखदु:खात साथ देणारी, उच्चशिक्षित नि नोकरी करणारी, माझ्या आईबाबांचा आदर असणारी पण तरीही बऱ्यापैकी 'मॉड' (म्हणजे काय ते अज़ून माहीत नाही!) वगैरे वगैरे 'स्टिरिओटिपिकल' अपेक्षा असणं ओघाओघाने आलंच. माझ्या मित्रमंडळींपैकी अनेकांनी तर पदवीधर झाल्याझाल्या आपापली 'प्रकरणं' रीतसर 'अप्रूव्ह'ही करून घेतली. मायदेशापासून हज़ारो मैल दूरवर आमच्या इनबॉक्समध्ये चक्क मित्रमैत्रिणींच्या लग्नाच्या आमंत्रणपत्रिका येऊन पडू लागल्या! नको त्या वेळी आपल्यालाही या दिव्यातून कधी तरी ज़ावं लागेल, अशी भयानक ज़ाणीवही झाली. पण त्याचबरोबर 'मुलगा गझलाबिझला, कविता लिहितो म्हणे', 'पुढे आणखी शिकायचं म्हणतोय हो, बघा बुवा काय ते!', झालंच तर 'बाकी सगळं ठीक आहे, पण तसं बऱ्यापैकी दिसण्याइतकं (!) पोट आहे (?!)' असे (अगदी आमच्या खात्यापित्या घराण्यावर ज़ाणारे!) अनेक शेरेही मिळणारच, याची खात्री झाली, की लगोलग सुरक्षिततेची  भावनाही निर्माण व्हायची. बायको हे किती अजब रसायन आहे, हे आज़वर इतरांच्या अनुभवांवरून, बोलण्यावरून, (अगदी प्रसाद शिरगावकरांच्या 'बायको नावाचं वादळ' सारख्या भन्नाट साहित्यकृतींवरूनसुद्धा) लक्षात आलंच होतं. म्हणजे उद्या मी (ज़र!) गज़रा घेऊन आलो(च!), तर तो माळून मला स्वतःबरोबर मटार सोलायला बसवणारी बायको आवडेल, की नाटकाला ज़ाऊया म्हटल्यावर "डार्लिंग, किटी पार्टीला ज़ाऊया का आज़चा दिवस?" विचारणारी बायको आवडेल, हे ज़ोवर ठरवता येत नाही, हॉटेलात जेवल्यावर माझ्याच ग्लासातून रोझ मिल्कशेक पिणारी बायको हवी की शँपेनचा ग्लास उंचावून 'चिअर्स' करणारी बायको हवी, हे ठरवता येत नाही (म्हणजे 'विच ऑफ़ द टु इज़ (मोअर?) बेअरेबल, हे ठरवता येत नाही! ऍक्सेप्टेबल काय आहे, हा वेगळाच मुद्दा आहे), थोडक्यात तोवर आपण 'सेफ़' आहोत, ही ज़ाणीवच सुखावह वाटते. आपण म्हणावं की "मला झोप येते आहे गं बाई!", आणि बायकोने म्हणावं "नाटकं करू नकोस जास्त, ज़रा पिल्लूचा युनिफ़ॉर्म कपाटातून काढून हँगरला लावून ठेव उद्यासाठी"; रविवारी दुपारी मस्तपैकी सोलकढी-भात नि फ़्राय पापलेटच्या जेवणानंतर चटईवर पडल्यापडल्या आपण तिच्या अंगावर हात टाकावा आणि उतू गेलेल्या दुधाच्या वासानं तिने दचकून स्वयंपाकघरात धाव घ्यावी; लग्नाआधी "आज़ संध्याकाळी कुठेतरी ज़ाऊया का"वर मी चालू केलेला फोन तास-दीड तासाने "चल बॉस आला, मी ठेवते" वर संपवणाऱ्या बायकोनेच, लग्नाच्या पहिल्या वाढदिवसादिवशी घेतलेली साडी बोहारणीला द्यायचे दिवस आले की मात्र गाडीवरची गवार घेताना "आठ रुपे में देनेका है तो बोल" म्हणताना दाखवलेले व्यवहारचातुर्य दाखवावे, आणि प्रसंगी तिनेच घरी स्वयंपाक करायचा कंटाळा आलाय, म्हणून हॉटेलात घेऊन ज़ावं; पोराबरोबर क्रिकेटची मॅच बघताना बायकोने मस्तपैकी भजी तळावी, तीही इंडियाच्या टीमचा नि आम्हां बापलेकांचा उद्धार करतच, आणि इतकंच नव्हे तर प्रतिस्पर्ध्याची विकेट पडल्यावर आमच्या जल्लोषात तिनेही सामील व्हावं; अशा अनेकानेक 'माफ़क' अपेक्षा पूर्ण करणारी एकमेव व्यक्ती म्हणजे बायको, ही व्याख्या सर्वमान्य आहे की नाही, फ़ारच आदर्शवादी आहे की वास्तववादी वगैरे प्रश्नांची समाधानकारक उत्तरे देता येत नाहीत, तोवर निवांत असे पानभर लेख खरडण्यास आपण पूर्ण मोकळे असतो, हे लक्षात ठेवावे नि वेळेचा असा सदुपयोग करावा.&lt;br /&gt;मुंबई विद्यापिठाच्या अभियांत्रिकीच्या एखाद्या पेपरात उपटलेला अभ्यासक्रमाबाहेरचा प्रश्नसुद्धा सुसह्य ठरावा, असे हे यक्षप्रश्न ज्या परीक्षेत येतात, त्या परीक्षेत केट्या घेत पुढे ज़ाण्यापेक्षा (बरे, महत्त्वाचा मुद्दा असा की तशा त्या कधी क्लिअरसुद्धा करता येत नाहीत  ) विषय फ़र्स्ट अटेंप्टच क्लिअर करावा किंवा ज्ञानशाखाच बदलून घ्यावी, अशा टोकाच्या भूमिकेचाही विचार 'मार्केट'मध्ये येऊ घातलेल्या तरुणांच्या डोक्यात घोळल्यास नवल ते काय! पण तरीही आमच्याच एका बंधुराजांकडून त्यांच्या स्वतःच्या साखरपुड्याच्या दिवशी जेव्हा "अगर शादी ऐसा लड्डू है, जो खाए वो पछताए, जो ना खाए, वो भी पछताए, तो बेटर है की खाकेही पछताओ", हे ऐकले त्यावेळी मात्र 'बायको'वर गेले दोन तास इतके मोठे पारायण खरडले, ते खरडण्याचे मला त्यावेळी कसे काय सुचले नाही, असे वाटून गेले आणि त्याचवेळी कोणत्याही विषयावर टोकाची भूमिका घेऊन चालत नाही, हे पटले. 'बायको'सारख्या नाज़ूक पण तरीही ज्वलंत विषयावर तर नाहीच! &lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/20108582-5235282650565871642?l=meeakshay.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://meeakshay.blogspot.com/feeds/5235282650565871642/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=20108582&amp;postID=5235282650565871642' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/20108582/posts/default/5235282650565871642'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/20108582/posts/default/5235282650565871642'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://meeakshay.blogspot.com/2007/03/blog-post.html' title='बायको'/><author><name>Chakrapani</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06931612066464984955</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_FQLtzf2SP6k/SFjSxj-47MI/AAAAAAAAAzY/J8y52dIXqA4/s72-c/shabdabandha-firstoriginal.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-20108582.post-8106701916954586554</id><published>2007-02-14T21:52:00.000-05:00</published><updated>2007-02-14T22:54:34.349-05:00</updated><title type='text'>या देवी सर्वभूतेषु विद्यारूपेण संस्थिता</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_FQLtzf2SP6k/RdPZLP7HDJI/AAAAAAAAAAM/uaNdQ399cAs/s1600-h/DSC02059.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5031603995979222162" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; CURSOR: hand" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_FQLtzf2SP6k/RdPZLP7HDJI/AAAAAAAAAAM/uaNdQ399cAs/s320/DSC02059.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;गेल्या शनिवारी आमच्या विद्यापिठात हिंदू विद्यार्थी संघटनेतर्फ़े सरस्वती पूजेचे आयोजन केले गेले. या कार्यक्रमाला याआधी कधीच हजेरी लावली नव्हती आणि जूनपासून सॅन होज़ेला गेल्यानंतर रालेला कधी परत यायला मिळेल आणि असे कार्यक्रम, संमेलने यांत सहभागी होता येईल की नाही, ते सांगता येत नाही. त्यामुळे यावर्षी सरस्वती पूजेला हजेरी लावायचे नक्की केले.&lt;br /&gt;विद्यापिठाच्या ज़ुन्या आवारातील (ज्याला आता ऐतिहासिक आवार(historical campus) संबोधले ज़ाते) मॅन सभागृहात आटोपशीरपणे हा सोहळा रंगला होता. देवी सरस्वतीची अतिशय प्रसन्न करणारी मूर्ती, आज़ूबाज़ूची साधीच पण तरीही नज़रेत भरणारी कल्पक सज़ावट आणि सहभागी विद्यार्थ्यांचा उत्साह यांमुळे या कार्यक्रमाला एक वेगळीच शोभा आली होती. सरस्वतीचे पूजन, मंत्रपठण नि आरती आणि त्यानंतरचे प्रसादभक्षण अशा छोटेखानी कार्यक्रमात संध्याकाळचे चार-एक तास कसे निघून गेले कळलं सुद्धा नाही. पण या सगळ्या वेळेच्या सदुपयोगाचं प्रयोजन असलेल्या सरस्वतीच्या चेहर्‍यावरची कोणालाच न दिसलेली अनेक प्रश्न घरी आल्यावर चहा घेतानाही मला अस्वस्थ करत होती.&lt;br /&gt;सर्व प्राणिमात्रांमध्ये विद्येच्या रूपाने वास करणार्‍या या देवीची आराधना केवळ मंत्र नि आरत्यांपुरतीच मर्यादित का म्हणून रहावी? आज़ मी अमेरिकेत उच्च शिक्षण घेतोय; पण माझ्या भारतातच असे किती ज़ण आहेत की ज्यांना शिक्षणापासून वंचित रहायला लागतंय? गावागावांमध्ये आज़ही शिक्षणाबद्दल उदासीनता आहेच. सरकारने अनेक योजना चालू केल्या आहेत, हे खरं. मुलींसाठी मोफ़त शिक्षण, सर्वत्र मोफ़त प्राथमिक शिक्षण, अनेक सवलती नि आरक्षणे अशा कित्येक मार्गांनी सरकार शिक्षणाचा प्रचार नि प्रसार करायचे प्रयत्न करते आहे, हे आम्ही नाकारत नाही. शाळांना मिळणारी अनुदाने, भूखंड किंवा इतर प्रकारची मदत, दूरदर्शनवरील 'स्कूल चले हम', 'पूरब से सूर्य उगा', अशा एकापेक्षा एक सरस जाहिरातींद्वारे केला ज़ाणारा शिक्षणप्रचार यांचंही महत्त्व आम्हांला कळते. पण यापलीकडे ज़ाऊन सरकार ग्रामीण भागात जागृती निर्माण करण्यासाठी काय़ करते आहे, हे आम्हांला कळत नाही. ग्रामपंचायतीच्या सभांमधून आम्हांला शिक्षणाच्या योजना नि साधने यांबाबत माहिती मिळण्य़ापेक्षा किंवा ती मिळवण्यापेक्षा शेतज़मिनीवरून होणारी भांडणे, गावातील भाऊबंदकी आणि पंचायतीतील राजकारण यांत जास्त रस असतो. शिक्षणासाठी मिळालेली सरकारी मदत शाळेची इमारत उभारण्यात खर्च झाली की सरपंचाच्या घरची दारू आणण्यात, हे कळत नाही; आणि त्याबाबत विचारणा करण्याइतके सामाजिक स्वातंत्र्य, राजकीय जागरुकता यांपैकी कसलाच आवाज़ आमच्याकडे काहीच नाही. त्यामुळे आम्ही आवाज़ काढायचा म्हटला तरी तो ऐकला ज़ाण्यापूर्वीच विरून ज़ायची शक्यता अधिक.&lt;br /&gt;आणि असा आवाज़ उठवण्यापूर्वी हे सुद्धा पहायला नको का की आमच्या गावांमधले किती आईबाबा त्यांच्या मुलांना - खास करून मुलींना - शाळेत पाठवतात? किती मुले सातवी किंवा दहावीच्याही पलीकडे ज़ाऊन शिकतात? जी मुले शिकत नाहीत, त्यांना व्यवसायाभिमुख शिक्षण मिळण्याची सोय आहे का? नसते काही ज़णांना शिकायची आवड. काही ज़णांना प्रयत्न करूनही गणित, शास्त्र, भाषा इत्यादी विषयांच्या अभ्यासात, शिक्षणात गोडी निर्माण होत नाही. कबूल आहे आम्हांला हे. पण मग अशी अशिक्षित मनुष्यसंपत्ती आम्ही व्यवसायाभिमुख शिक्षण देऊन समाजोपयोगी कार्यासाठी अधिक सक्षम केली तरी चालू शकेल नाही का? त्यादृष्टीने आमच्याकडे काय योजना आहेत? त्याबाबत किती माहिती उपलब्ध आहे नि किती जागरुकता आहे?&lt;br /&gt;या सगळ्या प्रश्नांची उत्तरं हवी असतील, तर आवश्यक आहे स्वकृती आणि माहितीचा अधिकार. सध्याचं चित्र अधिक प्रसन्न, आश्वासक, आशादायी बनवायची ज़बाबदारी माझी स्वत:ची आहे, ही ज़ाणीव प्रत्येकालाच असणं महत्त्वाचं आहे. स्वहिताच्या नि आत्मसमाधानाच्या संकुचित चष्म्यातून दिसणारं जग हे बरंच काही न दिसल्याचंच चिन्ह आहे असं मला वाटतं. त्यामुळे आपण नि आपल्याबरोबरच आपल्या येणार्‍या पिढ्यांनी शास्त्रोक्त शिक्षण घेणं आणि इतरांना ते घेण्यासाठी उद्युक्त करणं महत्त्वाचं आहे. समाजात सध्या चांगल्या शिक्षकांची कमी आहे. त्यामुळे सामाजिक जागरुकता प्रभावीपणे निर्माण होत नाही, याचं दु:ख आहेच; पण त्याबरोबरच दुसरं दु:ख आहे ते शिक्षकी पेशाला चिकटलेल्या बाज़ारीकरणाचं. "आयुष्याच्या उत्तरार्धात मला प्राध्यापक म्हणून काम करायला आवडेल", असं मी एकदा म्हटलं होतं. त्यावेळी ज़मलेल्या मंडळींकडून केला गेलेला उपहास या पेशाबद्दल असलेली सर्वदूर उदासीनताच दर्शवतो. आणि हे असंच चालत राहिलं तर सध्यच्या परिस्थितीत सुधारणा होण्याबाबत फ़ारसं आशावादी न राहिलेलंच श्रेयस्कर.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;ol&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;परिस्थिती बदलली पाहिज़े, अशी बोंब न मारत बसता ती बदलण्यासाठी स्वत: काहीतरी करा.&lt;/span&gt;&lt;/li&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;शिक्षणाचं महत्त्व पटवून देण्यासाठी स्वत:हून प्रयत्न करणं, केवळ आर्थिक मदतच नव्हे तर प्रत्यक्ष सहभागातून हे कार्य साधणं, याचं महत्त्व इतर कशापेक्षाही जास्तच आहे. शाळासाठी नुसत्या देणग्या देऊ नकात, तर शाळांमध्ये शिक्षक म्हणून रुज़ू व्हा किंवा आपल्या घरीच गरज़ू विद्यार्थ्यांच्या शिकवण्या घ्या. त्यासाठी योग्य तो मोबदला घ्या, पण विद्यार्थ्याच्या आर्थिक पार्श्वभूमीचा यथायोग्य विचार करून, पटल्यास नि गरज़ पडल्यास त्यांना मोफ़त शिकवण्यासाठी मागेपुढे पाहू नकात.&lt;/span&gt;&lt;/li&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;सरकारी शैक्षणिक योजनांचा प्रचार करा. सरकारकडून योग्य ती माहिती मिळवण्यासाठी माहितीच्या अधिकाराचा वापर करा नि या अधिकाराबाबत जनसामान्यांमध्ये जागरुकता निर्माण करा. जनता नि सरकार यांच्यातील दुवा म्हणून काम करता येत असेल, तर नि:संकोच नि नि:स्वार्थीपणे तसे करा.&lt;/span&gt;&lt;/li&gt;&lt;br /&gt;&lt;li&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;शास्त्रोक्त नि पारंपारीक शिक्षणात रस नसलेल्यांना व्यवसायाभिमुख शिक्षण मिळण्यासाठी काय प्रयत्न करता येतील, ते पहा.&lt;/span&gt;&lt;/li&gt;&lt;/ol&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;या आणि अशा अनेक गोष्टी केल्या तर धीरूभाई अंबानी इंटरनॅशनल स्कूलमध्ये वर्षाला चार लाख रुपये भरणारा विद्यार्थी नि गडचिरोलीच्या कुठल्याशा पाड्यामधला कधीही शाळेत न गेलेला बालमज़ूर असं टोकाचं निराशावादी चित्र दिसणार नाही. विद्यार्थीदशेत असताना यातल्या सगळ्याच गोष्टी करता येणं शक्य नसेलही, पण जितक्या ज़मत असतील, त्या करायला तरी आपण मागेपुढे पाहू नये.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;पाहूया तर प्रयत्न करून. सरस्वतीच्या चेहर्‍यावरची अनेक प्रश्नचिन्ह कदाचित आपल्याला पुसता येतील.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/20108582-8106701916954586554?l=meeakshay.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://meeakshay.blogspot.com/feeds/8106701916954586554/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=20108582&amp;postID=8106701916954586554' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/20108582/posts/default/8106701916954586554'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/20108582/posts/default/8106701916954586554'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://meeakshay.blogspot.com/2007/02/blog-post.html' title='या देवी सर्वभूतेषु विद्यारूपेण संस्थिता'/><author><name>Chakrapani</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06931612066464984955</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_FQLtzf2SP6k/RdPZLP7HDJI/AAAAAAAAAAM/uaNdQ399cAs/s72-c/DSC02059.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-20108582.post-6054379380377692359</id><published>2006-11-16T10:36:00.000-05:00</published><updated>2006-11-16T10:38:06.392-05:00</updated><title type='text'>डिपार्टमेंट &lt;-&gt; ऍडवायज़र &lt;-&gt; बडवायज़र &lt;-&gt; अपार्टमेंट (२)</title><content type='html'>&lt;span style="font-size:130%;"&gt;अपार्टमेंट ते डिपार्टमेंट हे अंतर पायी चालत अवघे दहा मिनिटांचे आहे. मात्र मनुष्य हा समाजशील प्राणी आहे, या तत्त्वाला जागून ते दहा मिनिटांचे चालणेही समूहात पार पाडायचे हा आमचा अलिखित नियम आहे. समूहात चालण्याचे फायदे म्हणजे रस्त्याने येणाऱ्याजाणाऱ्या गोऱ्या मडमांकडे पाहून आपल्याच भाषेत टीकाटिप्पणी करता येते (हो आता पक्षीनिरीक्षण वगैरे म्हणून आपणच आपली लाज का काढा!) एकट्याने गेल्यास, प्रयत्नपूर्वक आणि धीराने आपण चोरटी नजर भिरभिरवावी, आणि नेमके त्याच क्षणी तिने आपल्याकडे पाहून मधाळ हसू फेकले की आपण हिट विकेट व्हावे, अशी आपली गत होण्याइतकी कच्ची फलंदाजी कोणत्याही भारतीयाकडून चँपिअन्स ट्रॉफी वगळता इतरत्र केली जाऊ नये. समूहात चालण्याचा दुसरा एक फायदा म्हणजे तोंडाने अखंड (मार्गदर्शनयुक्त)बडबड करणारा तो सिनिअर आणि त्याच्या बाजूने आणि मागून चालणारे, मन लावून ऐकणारे, हसणारे-खिदळणारे ज्युनिअर्स असे चित्र फ्रेशर्सच्या मनात पक्के बसते आणि आपल्याविषयीचा आदर दुणावतो. ३:५० चे लेक्चर असेल, आणि घरी तुम्हाला पावणेचारास जाग आली, तर पायी चालण्यात वेळ न घालवता एक तर पुन्हा झोपून लेक्चर बंक करावे किंवा धावतपळत बस पकडून डिपार्टमेंट गाठावे. परीक्षेच्या काळात चित्र जरासे आशावादी दिसते. म्हणजे विद्यार्थी हातात पुस्तके, नोट्स किंवा तत्सम काहीतरी घेऊन डिपार्टमेंटला जाताना दिसतात. लोकांमधल्या सलीम अलींची जागा त्यांच्यात्यांच्यातल्या विद्यार्थ्यांनी घेतलेली असते, हाच काय तो आशादायी फरक.&lt;br /&gt;डिपार्टमेंटची इमारत म्हणजे आमचे महाविद्यालय ही तीन मजली छोटेखानी पण तरीही डौलदार इमारत. लाल विटांचे बांधकाम, रेखीव रचना आणि उत्तम अंतर्सजावट. प्रांगणात निरनिराळी हिरवीगार झाडे, विविधरंगी फुले आणि दूरवर पसरलेली हिरवळ. बासरीवादकांसाठी धूर सोडायच्या खास जागा, कटाक्षाने स्वच्छता पाळणाऱ्या अमेरिकन वृत्तीशी अनुरूप अशी जागोजागी केलेली कचराकुंड्यांची सोय, ज्यांना टॉयलेट्स म्हणण्याची लाज वाटावी अशी स्वच्छ प्रसाधनगृहे, अशा अनेक सोईंनी नटलेली डिपार्टमेंटची इमारत. या इमारतीत इलेक्ट्रिकल व संगणकीय अभियांत्रिकी (Electrical &amp; Computer Engineering किंवा ECE) आणि संगणक विज्ञान (Computer Science किंवा CSC) या दोन डिपार्टमेंट्सचा कारभार चालतो. त्या त्या डिपार्टमेंट्सशी संलग्न असणाऱ्या प्राध्यापक वर्गाची, प्रशासकीय कर्मचारी, विभागप्रमुख यांची कार्यालये, अद्ययावत सुविधांनी सुसज्ज अशा लहानमोठ्या प्रयोगशाळा नि त्यांत काम करणारे विद्यार्थीमजूर, प्राध्यापकांना संशोधनात तसेच अध्यापनात सहाय्य करणारे मोजके नशीबवान विद्यार्थी असं विश्व हे प्रत्येक डिपार्टमेंटची जान आणि शान आहे. विद्यार्थ्यांना अभ्यास करण्यासाठी प्रत्येक मजल्यावर विस्तीर्ण स्टुडंट्स लाउंज आहे. अभ्यास करताना झोप आली किंवा घरची अर्धवट झोप पूर्ण करायची असेल, तर त्यासाठी आरामशीर सोफासेट्स आहेत. एकाच चवीचे अनेक पदार्थ वेगवेगळ्या नावाने, आणि जवळपास सारख्याच चढ्या दराने विकणारे उपाहारगृह आहे. अभ्यास करताकरता तोंडाला चाळा म्हणून चॉकलेट, बबलगम, झालेच तर वेफर्स, कुकीज नि सोडा विकणारी व्हेंडिंग मशीन्स आहेत. विविध क्षेत्रांतील प्रज्ञावंतांची व्याख्याने आयोजित करण्यासाठी मोठी सभागृहे आहेत. आणि आम्हा विद्यार्थ्यांसाठी काशी-रामेश्वर किंवा मक्का-मदीना या तीर्थक्षेत्रांच्या तोडीच्या असलेल्या लेक्चर रूम्स आहेत.&lt;br /&gt;डिपार्टमेंटमधली लेक्चर्स म्हणजे नुसती लेक्चर्स नसून एक आनंदमेळावा असतो. लेक्चरच्या वेळा या त्या वेळापत्रकाप्रमाणे न पाळता, स्वतःच्या सोईप्रमाणे पाळायच्या, हे येथील शिक्षणव्यवस्थेचे मूलभूत तत्त्व असल्याने ज्या दिवशी एखादा गृहपाठ सुपूर्त करायचा असेल किंवा तपासून मिळणार असेल, प्रॉजेक्ट सुपूर्त करायचे असेल किंवा प्राध्यापकांचे व्याख्यानच तसे अगदी महत्त्वाचे असे, त्यावेळी ठरलेल्या वेळापत्रकाप्रमाणे हजेरी लावावी. अन्यथा चारच्या लेक्चरला तुम्ही साडेचार-पावणेपाचाला जरी वर्गात गेलात, तरीही प्राध्यापकांसकट कोणालाही याचे सोयरसुतक नसते. त्यातून मध्येच भूक किंवा तहान लागली, तर बाहेर जाऊन खाणेपिणे वर्गात आणून खाता येते. म्हणजे तहानभूकही भागते आणि व्याख्यानातही अडथळा येत नाही. भारतात शिकताना भर वर्गात करंगळी वर करून लघुशंका उपस्थित करताना, शंभर वेळा केलेल्या विचाराने नकोसा झालेला जीव चेहऱ्यावर लगेच उमटायचा. इकडे तसा बाका प्रसंग येत नाही. सरळ उठून मोकळ्या मनाने मोकळे होण्यासाठी वर्गाबाहेर पडायचे. लेक्चरला बसून याहू किंवा गूगलवर बिनदिक्कत गप्पाही मारता येतात. अर्थात, ज्यांच्या व्याख्यानाच्या वेळेस असे सौभाग़्य लाभावे, अशी मंडळी फाऱ नाहीत पण तरीही कितीही चांगल्या-वाईट, ज्येष्ठ-कनिष्ठ प्राध्यापकांच्या व्याख्यानांना आंतरजालावरील निरोपकांवर नि चावड्यांवर हजेरी लावणारी मंडळी तर बरीच आहेत. आमची एक मैत्रीण तर निरोपकांवर "in lecture" असा फलक लावून गप्पा छाटते. गेलाबाजार मुद्दामहून एखाद्या चायनीज विद्यार्थ्याशी अस्खलित इंग्रजी बोलण्याचा खोडसाळपणा करून मग त्याच्या चेहऱ्यावरचे बावरलेले भाव पाहून सुवर्णपदक मिळवल्याच्या थाटात आमच्याकडे बघते. चायनीज विद्यार्थी तसे मूळचे हुशार; पण बिचारे संवाद साधण्यात भाषेमुळेच कमी पडतात. हिने किंवा इतर कोणीही शुद्ध इंग्रजीतून विचारलेल्या प्रश्नांना उत्तरादाखल चायनीज विद्यार्थी डोळे मिटून, आणि सगळेच्या सगळे बत्तीस दात दाखवून जातिवंत हसला, ही खुशाल त्याला काही न समजले असल्याची पोचपावती समजावी. मात्र अमेरिकन असोत किंवा चायनीज किंवा इतर कोणी. सगळे विद्यार्थीवर्ग एककेकांशी सौहार्दपूर्ण वागतात, हे पाहून आनंद होतो आणि आपण परदेशी विद्यार्थी असल्याचा सावधपणा जरा निवळतो.&lt;br /&gt;Engineering is a dry field world over या वाक्याची प्रचिती डिपार्टमेंटमधील मुलींकडे पाहून येते. पण डिपार्टमेंटल सोशल्स, हॅलोविन नि थँक्सगिव्हिंग अशा प्रसंगी आजवर कधीही न दिसलेली फुलपाखरं दिसू लागतात. आपल्याकडे मोठमोठ्या राजकीय पक्षांच्या प्रचारसभांना जशी गाडी भरून माणसं आणतात, तसेच अशा खेळकर आयोजनांना जास्तीत जास्त प्रतिसाद लाभावा, म्हणून विद्यापिठाच्या विद्यार्थी संघटनेमार्फतच अशी 'मार्केटिंग स्ट्रॅटेजी' वापरली जाते की काय, असे वाटते. पण अशा खेळीमेळीच्या प्रसंगी विभागप्रमुख, प्राध्यापक, प्रशासकीय तसेच इतर कर्मचारी वर्ग आणि अर्थातच विद्यार्थी हे सगळे एकत्र येण्याचा आनंदसोहळा आणि त्याचाच एक भाग होणारे आमच्यासारखे अनेक आंतरराष्ट्रीय विद्यार्थी समुदाय या गोष्टी सारख्यासारख्या होत नसतात. दिवाळी, होळीसारखे कार्यक्रम स्थानिक भारतीय विद्यार्थी संघटनेमार्फत डिपार्टमेंटच्याच आशीर्वादाने इमारतीच्या मोठ्या प्रांगणातली जागा मिळवून राबवले जातात. त्याचबरोबर विविध कंपन्यांची माहितीसत्रेही डिपार्टमेंटमध्येच आयोजित केली जातात. अशा अनेक माहितीसत्रांना भारतीय विद्यार्थ्यांचा भरघोस पाठिंबा मिळतो. कारण असा पाठिंबा मिळवण्यासाठी 'फ्री फूड' ची खिरापत कंपन्यांनी जाहीर केलेली असते. संगणक विज्ञानाचे आमच्यासारखे विद्यार्थी खास ग्रीक आणि अरेबियन जेवणासाठी कुठल्याशा बांधकाम क्षेत्रातील कंपनीच्या माहितीसत्राला केवळ हजरच राहून नव्हे, तर तिच्या प्रतिनिधिंशी 'अमेरिकेतील सध्या हाती घेतलेले बांधकाम प्रकल्प आणि त्यातील रोजगाराच्या संधी' या विषयावर चर्चा करून आल्याचीही उदाहरणे आहेत. एखादी कंपनी भारतीय जेवण किंवा फुकटचा पापा जॉन्स पिझ्झा देणार असेल, किंवा गो पाक्स उपाहारगृहाच्या रविंदरकाकू दिवाळीनिमित्त सात डॉलरमध्ये अमर्याद बफे घोषित करतील तर ही माहिती समस्त भारतीय विद्यार्थी समुदायाला संघटनेच्या सामाईक ई-पत्राद्वारे कळवण्याचे सत्कार्यसुद्धा सगळ्या डिपार्टमेंट्सचे भारतीय विद्यार्थी इमानेइतबारे करत असतात. क्वचितप्रसंगी जेव्हा दैवाला मानवणार नाही, तेव्हा उलटा अनुभवही येतो. म्हणजे डिपार्टमेंटतर्फेच आयोजित केलेल्या सोशल मध्ये बार्बेक्यू आहे म्हणून उत्साहाने रांगेत उभे रहावे आणि प्रत्यक्षात वाढून घेण्याची पाळी आली, की तिकडे बीफ सोडून काहीही नाही, या सत्याचा साक्षात्कार व्हावा इथवर परिस्थिती ओढवते. अर्थात असे प्रसंग क्वचितच येतात, पण आले की झक मारत घरी जाऊन स्वयंपाक करावा लागतो किंवा जवळच्याच बर्गर किंग, किझनोज किंवा सबवेची वाट धरावी लागते.&lt;br /&gt;अपार्टमेंट ते डिपार्टमेंट नि परत अशा प्रवासातला ऍडवायजरचा टप्पा तसा निरनिराळ्या किश्शांनी परिपूर्ण आणि कधीही चुकवू नये, असा असतो. त्याबद्दल पुन्हा कधीतरी. डिपार्टमेंटमध्येच बसून हे प्रवासवर्णन लिहीत असल्याचा आसुरी आनंद समस्त मनोगतींशी वाटून घेता येतोय, हेही नसे थोडके ;)&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/20108582-6054379380377692359?l=meeakshay.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://meeakshay.blogspot.com/feeds/6054379380377692359/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=20108582&amp;postID=6054379380377692359' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/20108582/posts/default/6054379380377692359'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/20108582/posts/default/6054379380377692359'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://meeakshay.blogspot.com/2006/11/blog-post_16.html' title='डिपार्टमेंट &lt;-&gt; ऍडवायज़र &lt;-&gt; बडवायज़र &lt;-&gt; अपार्टमेंट (२)'/><author><name>Chakrapani</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06931612066464984955</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-20108582.post-6157601646221857394</id><published>2006-11-15T05:22:00.000-05:00</published><updated>2006-11-15T05:24:49.238-05:00</updated><title type='text'>अपार्टमेंट &lt;-&gt; डिपार्टमेंट &lt;-&gt; ऍडवायज़र &lt;-&gt; बडवायज़र (१)</title><content type='html'>&lt;span style="font-size:130%;"&gt;लेखाचे शीर्षक किंवा त्यातील शब्द अमेरिकेत राहणाऱ्या मनोगतींसाठी तरी नवीन नसावेत. आणि ज्यांना हे शब्द परिचयाचे नाहीत, त्यांची यथावकाश त्यांच्याशी (चांगलीच!) ओळख होईल, याबाबत खात्री बाळगावी. या शीर्षकातील '&lt;-&gt;' या चिन्हाकडे "टू अँड फ़्रो" या अर्थाने बघावे; म्हणजे त्यावरून लेखकाच्या व त्याच परिस्थितीत दिवस काढणाऱ्या इतर अनेकांच्या दैनंदिन प्रवासाची (खरे तर परिस्थितीची!) कल्पना येईल. मुंबईकर चाकरमानी घर ते नोकरी, नोकरी ते घर असा प्रवास करतात. पण त्या दैनंदिन प्रवासाची गोडी अनुभवणारे कुणी अपूर्वाई, पूर्वरंग किंवा तत्सम लिहिण्याच्या फंदात पडत नाहीत. इकडे विद्यार्थी(दशेत) जीवन जगणाऱ्या बऱ्याच ज़णांचा प्रवास अपार्टमेंट ते डिपार्टमेंट ते ऍडवायज़र ते बडवायज़र आणि परत असा असतो. त्याच प्रवासवर्णनाचा हा पहिला भाग.&lt;br /&gt;अपार्टमेंट म्हणजे किमान सहा मज़ल्यांची (उत्तुंग?) इमारत ही भारतीय व्याख्या अमेरिकेतील अपार्टमेंट्सनी चुकीची ठरवली. दोन बेडरूम्स विथ ऍटॅच्ड बाथरूम्स, एक हॉल, आणि स्वयंपाकघर (२ बीएचके) च्या सदनिकेस अपार्टमेंट म्हणतात, ही व्याख्या मी अमेरिकेतच येऊन शिकलो. वास्तविक शिक्षण पूर्ण होईपर्यंत दैनंदिन जीवनक्रमात अंग टेकायला मिळणारी धर्मशाळा यापलीकडे अपार्टमेंटचे महत्त्व फारसे काही नाही. त्यातूनही दुर्दैवाची गोष्ट अशी, की धर्मशाळेत निदान फ़ुकटात तरी अंग टाकता येते; अपार्टमेंटमध्ये झोपायला आपल्याला भाडे द्यावे लागते. वर घरमालकांची करडी नज़र असतेच... ए सी नीट आहे ना, कार्पेटची नासधूस केलेली नाही ना, चारपेक्षा जास्त लोक घरात राहत नाहीत ना.....या सगळ्याला सांभाळत दिवस काढायचे. इकडे आलो, तेव्हा बाकीचे घरसोबती (शाळेतले ते शाळासोबती तसे एकाच अपार्टमेंटमध्ये राहणारे घरसोबती) आधीच येऊन त्यांनी एक अपार्टमेंट बुकही करून टाकले होते. त्यामुळे इथल्या कुणा सिनिअरकडे विस्थापितासारखे तात्पुरते राहण्याची पाळीही आली नाही. आणि वसाहतीतील सगळ्यात स्वस्त अपार्टमेंट मिळाले म्हणून सगळेच खूश! बॅगा घेऊन आत पाऊल टाकले न टाकले तोच दोन सोफ़ासेट, दूरदर्शन संच, म्युझिक सिस्टम दृष्टीस पडल्यावर तर डोळ्यांत आनंदाश्रू तरळले! मात्र लवकरच "ये सब वो सुंदर, विक्रांत वगैरे लोगोंका है और यहांसे जानेवाला है" हे कळले, आणि हिरमुसायला झाले. नाही म्हणाला म्युझिक सिस्टम मालकीणबाईंची स्वतःची आहे, आणि ती घरातच राहणार आहे हे कळले, आणि फूल ना फुलाची पाकळीचे समाधान झाले.&lt;br /&gt;जेटलॅग्ड अवस्थेतील पहिली झोप काढून दुसऱ्या दिवशी उठलो आणि आळोखेपिळोखे देत दार उघडून बाहेर गेलो. डोळे चोळून पाहिल्यानंतरही जेव्हा टमरेलच दिसेना, तेव्हा आपण चाळीत नसून अपार्टमेंट संस्कृतीमध्ये आहोत, याचा पहिला साक्षात्कार झाला. तसाच घरात येऊन बेडरुमाच्या कोपऱ्यातील विधिगृहातच 'विधी'पूर्वक सगळे करायचे ही समज़ूत पक्की केली आणि बाथरुमात शिरलो. बरे, मुंबईला असताना, उरलीसुरली झोप आत पूर्ण होण्यापूर्वीच बाहेरून गोखले दार ठोठवायचा आणि त्याच्या "चलाऽऽऽ" ला "ह्ह्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म" असे झोपून उठल्यावर आवाज़ाला जी नैसर्गिक धार येते, तिचे दणदणीत प्रत्युत्तर, आणि ज़ोडीला टमरेलभर पाणी त्याला ऐकू ज़ाईल इतपत वेगाने भस्सकन् ओतणे, अशा दुधारीने प्रत्युत्तर देऊन अस्मादिक बॅक टू घर. इथे तसे काही नाही. टू अँड अ हाफ़ बाथरूम म्हणजे काय हे बाहेरून कुणीच "चलाऽऽऽ" म्हणून ओरडले नाही की समज़ते. कारण आधीच आत कुणी असेल, तर दुसऱ्या बेडरुमातील विधिगृहात ज़ाता येते, किंवा अगदी वर्श्ट केसमध्ये तेही बिझी असेल, तर हॉलमधले अर्धे बाथरूम असतेच. वास्तविक हे जे अर्धे असते, त्याला बाथरूम म्हणणेही शास्त्रीयदृष्ट्या चुकीचे आहे. रोखठोक भाषेत फार फार तर त्याला "जेथे अंघोळ करता येत नाही असा संडास" असे म्हणता येईल आणि बेडरुमांतील विधिगृहांचीही तदनुसार जी करता येईल ती व्याख्या करता येईल. तांब्याभर पाणी मनसोक्त अंगावर घेणे, घसघसून साबण चोळणे आणि पाण्याच्या आवाज़ापेक्षाही मोठ्या आवाज़ात बाहेर ऐकू ज़ाईल इतक्या जोशात गाणे हेच आतापर्यंत अंगवळणी पडलेले. त्यामुळे शावर कर्टन लावलेले नाही, याची ज़ाणीव नाही; तशातच गरम-थंड पाणी कसे वापरायचे याचे ज्ञान नाही. जे दिसले ते रुचेल त्या बाज़ूला वळवले आणि शावर चालू झाला. भारतातून वर्षभरासाठी लागणारा हमामचा साठा आणल्याने शावरजेल कशाला वापरायचे?! अंघोळ उरकून नेहमीच्या सवयीने दोन हातांच्या अंगठ्यांवरून ज़ानवे फ़िरवत मुखाने गणपतीस्तोत्र चालू आणि हॉलमध्ये येरझाऱ्या. त्यातच "अबे साले ये क्या कर दिया यार!!!!!" अशी मित्राची किंकाळी ऐकून वर बेडरूममध्ये धावलो, तर बाथटबाच्या बाहेर माझ्या अंघोळीनंतर तयार झालेले तळे, आणि हातात ओलिचिंब झालेली स्वतःच्या शावरजेलची बाटली घेऊन उभा असलेला माझा बेडरुमी (अपार्टमेंटमध्ये एकत्र राहणारे ते रूमीज़ आणि जे एकच बेडरूम नि ऍटॅच्ड बाथरूम वापरतात, ते बेडरुमीज़) यांचे तसबिरीतल्या लक्ष्मीमातेप्रमाणे अगर सत्यनारायणाप्रमाणे झालेले दर्शन पाहून अमेरिकेतही माझ्या स्तोत्रपठणाचे सार्थक झाल्यासारखे वाटले. मग एका बाज़ूला माझ्या अमेरिकन अंघोळीबद्दलच्या (अ)ज्ञानाचा उद्धार आणि दुसऱ्या बाज़ूला शावर कर्टन्स म्हणजे काय, ते कसे, का वापरायचे, याबद्दलचे ज्ञानदान अशी दुहेरी शिक्षकी भूमिका बेडरुमीने पार पाडली. तळे उपसायचे काम अर्थातच मी केले.&lt;br /&gt;जेवणाच्या (म्हणजे जेवायच्या नाही, जेवण तयार करायच्या!) पाळ्या ठरवल्यानंतर माझी पाळी होती, त्यावेळी स्वयंपाकघरात पदार्पण केले. कुकिंग रेंज, हॉटप्लेट वगैरे सगळे प्रकार नवीनच. सुदैवाने ते कसे वापरायचे, कुठले बटण कशासाठी कुठे वळवायचे, ओव्हन कसा वापरायचा, साफ़ करायचा वगैरे सगळ्या सूचना आयत्याच रेंजवरच लिहिलेल्या असल्याने फारशी अडचण आली नाही. तरीसुद्धा दोनवेळा कुकीज़ आणि चिकनचा कोळसा करून झालाच. सुदैवाने हे महापातक माझ्या एकट्याच्याच हातून घडले नसल्याने आम्हां चौघांची एकमेकांना सामुदायिक क्षमा मिळाली. अमेरिकन सरकारचे जनरल ऍम्नेस्टीचे धोरण आम्ही आमच्या अपार्टमेंटापासूनच राबवायला सुरुवात केली, असे म्हटले, तर ते वावगे ठरू नये. कार्पेटवर बसून जेवले, तर खरकटे आणि त्याहूनही महत्त्वाचे म्हणजे कार्पेट साफ़ कोण करणार, या भीतीने मांडी ठोकून जेवायची सवय मोडून, डायनिंग टेबलावर जेवायची सवयसुद्धा लावून घेतली. कुछ पाने के लिये (बहोत)कुछ खोना भी पडता है :(&lt;br /&gt;दिवसांमागून दिवस ज़ाऊ लागले - अभ्यासालाही आणि स्वयंपाकघरात साठत चाललेल्या कचऱ्यालाही :D. त्यांचे परस्परांशी असलेले समप्रमाण कचराकुंडीतून बाहेर येऊन फ़्रीज़ज़वळची मोकळी ज़ागा, आणि नंतर घराचा दरवाज़ा उघडून आत शिरल्याशिरल्या जो शू रॅक आहे तो, इथवर सगळीकडे दिसू लागले. पिझ्झा बॉक्सेस, दुधाचे गॅलन्स, टोमॅटो प्युरीचे कॅन्स, अंड्याची टरफ़ले आणि असंख्य कागद नि किचन टिशूज़ यांच्यासाठी नसबंदी योजना असायला हवी होती की काय, असे वाटू लागले. आणि ज़सज़सा अभ्यास वाढत ज़ातो, तसतसे फ़्रीज़मधले खाणेही कमी होत ज़ाते. भाज्या, फळे दिसेनाशी होतात. दुधाचा शेवटचा गॅलन चालू झाला, की दुसऱ्या दिवशी प्यायचे ग्लासभर दूध आदल्या रात्रीच ग्लासात ओतून त्यावर "रिज़र्व्ह्ड" असा अलिखित शिक्का उमटवावा लागतो. ज्याच्या हाती ससा तो पारधी, तसे ज्याच्याकडे ग्लासभर दूध तो सावकार! सिंकमध्ये पडलेली घासायची भांडी आणि नुसता स्वयंपाकघरातलाच नाही तर एकूणाच घरातला कचरा, ही अभ्यास आणि वेळेची कमतरता यांची अनौरस अपत्ये आहेत. त्यांचे पालनपोषण करण्याची ज़बाबदारी आमच्यासारखे "बाळाचे बाप ब्रह्मचारी" मोठ्या आनंदाने पार पाडत असतात. या सत्रात मोज़ून दोन वेळा व्हॅक्यूम क्लीनर बाहेर आला होता. गणपतीबाप्पा आले होते तेव्हा आणि कुठूनशी अवदसा सुचून मालकीण स्वतः घरभाडे वसूल करायला येणार होती तेव्हा. आणि त्या दिवशी चक्क चक्क स्वयंपाकघरातल्या कचऱ्याचीही योग्य ती सोय करण्यात आली होती, असे समज़ले. ("असे समज़ते", असे म्हणायचे कारण म्हणजे तशी सोय लावण्यात माझा सहभाग़ नव्हता आणि त्या संध्याकाळी घरात पाऊल टाकल्यावर मला शू ऱॅकज़वळचे दुधाचे गॅलन्स दिसले नव्हते)&lt;br /&gt;डिसेंबरमध्ये सत्रसमाप्ती असते, त्यावेळी तसेच त्याआधीच्या नोव्हेंबरात हॉलमध्ये पुस्तके, आईस्क्रीमच्या न घासलेल्या वाट्या, बुरसटलेली पिझ्झा स्लाइस आणि मॅगीचे रिकामे पाकीट, कोकाकोलाचा चिकट ग्लास, आणि चार दिवस बाउलमध्येच तळाशी राहून दगड झालेली दालफ़्राय, सहासात चमचे, चहाचे दोन कप, मोबाईल फ़ोन्सचे चार्जर्स, लॅपटॉप्स, म्युझिक सिस्टम यांच्या एकांत एक गुंतलेल्या अनेक वायरी, दप्तरं आणि लेक्चर नोट्स, पंधरा दिवस धुवायच्या राहिलेल्या जीन्स नि चार-एक अंडरवेअर्स, कोणाचा कोणता हे ओळखू न येणारे स्वेटर्स नि सोबत कधीकाळी पांढरे असलेले बनियन्स, यांपैकी काहीही किंवा सगळेच दिसत असते. फक्त रूमीज़ दिसत नाहीत. कोण कधी घरात असते, कोण कधी येतो, कधी ज़ातो, कधी झोपतो, काही पत्ता नसतो. घरी आल्यावर दहा पायऱ्या चढून बेडरुममध्ये ज़ाणेही जिवावर आलेले असते. मग कार्पेटवर किंवा सोफ़्यावरच ताणून द्यायची. बाहेर वज़ा एक आहे की वज़ा दोन अंश सेल्सिअस तापमान आहे, याचा झोपेवर परिणाम होऊ द्यायचा नसतो; तर झोपायला मिळते आहे, यातच सुख मानायचे असते. बऱ्याचदा तर आज़ूबाज़ूचे मित्रमैत्रिणी त्यांच्या कचऱ्यासकट येऊन अभ्यास करताना दिसतात. आतापर्यंत पार्ट्या, टाइमपास नि धांगडधिंग्यांसाठी फिरकणाऱी ही मंडळीच अपार्टमेंटमधले भाडेकरू असल्यासारखे वाटू लागतात. बहुदा याची ज़ाणीव त्यांनाही असावी म्हणूनच की काय, पण त्यांच्यातल्याच एकाने या महिन्याचे घरभाडे शेअर करण्याचीही तयारी दर्शवली. त्यातून आम्ही या वर्षी सिनिअर झाल्याने आमचे अपार्टमेंट म्हणजे वसाहतीतील सांस्कृतिक केंद्र, शिक्षण व व्यवसाय मार्गदर्शन केंद्र, भारतीय विद्यार्थी समाजकल्याण केंद्र वगैरे बरीच केंद्रे झाले आहे. त्यामुळे या सुविधांचा विनाशुल्क लाभ घेणाऱ्या विद्यार्थीजनांसाठी आमचे अपार्टमेंट हाच दिवसाचा शेवटचा मुक्काम असतो....... दुसऱ्या दिवशी डिपार्टमेंटला ज़ाण्यापूर्वी.&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/20108582-6157601646221857394?l=meeakshay.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://meeakshay.blogspot.com/feeds/6157601646221857394/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=20108582&amp;postID=6157601646221857394' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/20108582/posts/default/6157601646221857394'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/20108582/posts/default/6157601646221857394'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://meeakshay.blogspot.com/2006/11/blog-post.html' title='अपार्टमेंट &lt;-&gt; डिपार्टमेंट &lt;-&gt; ऍडवायज़र &lt;-&gt; बडवायज़र (१)'/><author><name>Chakrapani</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06931612066464984955</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-20108582.post-114992966512709321</id><published>2006-06-10T03:42:00.000-05:00</published><updated>2006-11-10T20:30:54.648-05:00</updated><title type='text'>नऊ ते पाच - शेवट</title><content type='html'>&lt;p&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;एक भ्रमणध्वनी संच आणि इतर भ्रमणध्वनी संच, संगणक, पीडीए अशा अनेक उपकरणांमधील  '(सु)संवाद' ज्याद्वारे साधला ज़ातो, ते 'ब्लू टूथ' तंत्रज्ञान राबवणारे सॉफ़्टवेअर  तपासणे या खास कामावर माझी नियुक्ती झाली. या तंत्रज्ञानाच्या नावावरून त्याचा आणि  दातांचा (किंवा दातांच्या रंगाचा ... मोत्यासारखे शुभ्र, पिवळट, (निळे!) आणि क्लोज़  अपच्या त्या प्रसिद्ध जाहिरातीत शिशुवर्गातील मुलांनी सांगितलेले आपल्या  शिक्षिकेच्या दातांचे काही रंग) काही संबंध असतो की नाही, याबद्दल मी अज़ूनही माहिती  मिळवण्याच्या खटपटीत आहे. तो चिंतनाचा स्वतंत्र विषय आहे. पहिल्याच दिवशी एकदम  'ढासू' दिसणारे काही भ्रमणध्वनी संच तपासणीसाठी हातात पडले आणि मी त्यांच्या  प्रेमात. त्यामुळे तपासणीच्या सगळ्या पायऱ्या वाचून, त्या समज़ावून घेऊन तदनुसार ते  संच तपासणे हे सगळे मी इमानेइतबारे केले. ज़े काही निकाल हाती आले, त्यांची नीट नोंद  केली आणि त्याबद्दल ओ एल् ची शाबासकीसुद्धा मिळवली. मला खूप आनंद झाला त्या दिवशी.  झालेला सगळा आनंद घरी येईस्तोवरच्या तासाभराच्या प्रवासात, कुणाबरोबर तरी वाटून  घेण्यापूर्वीच पूर्ण हरवून गेला. सकाळाची अपुरी झोप येताना बसमध्ये काढली  (कार्यालयात नव्हे!) आणि घरी आल्यावर मस्तपैकी ताणून दिली. दररोज़चे नऊ ते पाचचे हे  वेळापत्रक असेच, तंतोतंत, प्रामाणिकपणे राबवायचे (अगदी बसमधल्या झोपेसकट!) हा विचार  तेव्हाच पक्का केला.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;पण नव्याचे नऊ दिवस या न्यायाने हळूहळू कामातील नाविन्य संपले. सगळे कसे  'यांत्रिक' होऊन गेले. सकाळी नऊपासून सायंकाळी पाचपर्यंत एका ठराविक साचेबद्ध  कामाचा कंटाळा येऊ लागला आणि मग मुख्य कामाबरोबरच 'ज़ोडधंदे' शोधायला सुरुवात झाली.  सहकाऱ्यांबरोबरचे हास्यविनोद हा त्यांपैकीच एक. अमेरिकेत एक बरे (आणि विचित्र) आहे.  तुमच्या दुप्पट-तिप्पट वयाच्या माणसालाही अगदी  नावाने हाक मारता येते. आमचा  व्यवस्थापकसाहेब 'आज़ोबा' म्हणण्याइतका मोठा नसला तरी सामान्यपणे आपण ज्यांना  अहोज़ाहो करतो, तेव्हढा 'काका'छाप मोठा नक्कीच आहे. पण तरीही त्याला आपल्या  लंगोटीमित्रासारखे "हे स्टीव्ह, व्हॉट्सप" ('क्या रे भिडू स्टीव्ह, कैसा  है'छापाचे!) म्हणणे सुखावून ज़ाते. त्यामुळे कामाच्या ठिकाणी ज़रा जास्तीच खेळीमेळीचे  वातावरण असते. पण मला दिसणारी नाण्याची दुसरी बाज़ू अशी आहे, की यामुळे इकडच्या  'काका', 'आज़ोबा' यांच्याज़वळ ज़ाणाऱ्या व्यक्तिरेखांबद्दलचा आदरभाव निर्माण व्हायला  आणि तो रुज़ला की चिरकाल कायम रहायला तुलनेने जास्त वेळ लागतो. साहेबापासून ते थेट  कंपनीच्या उपाहारगृहातील आचाऱ्याबरोबर थट्टामस्करी चालू झाल्याने कामाचा कंटाळा  थोडातरी निवळला आणि नवीन ज़ोम आला. त्याचबरोबर क्युबिकलसमोरून पॉला, ज्युडी, एमी,  XXXचे खळखळणे (माझ्या मित्रपरिवारात सध्या या फुल्या फारच प्रिय असून प्रकरण  मुलीच्या फोटोपर्यंत (तो तर केव्हाच मिळालाय!) गेले असून आता ते कुंडलीपर्यंत (ती  आहे की नाही हे मलाच माहीत नसणे, हे माझे अहोभाग़्य!) आणि त्याच्याही पुढे नेण्याचा  कट शिज़ायला सुरुवात झाली आहे. त्यामुळे सदर पाककृती लवकरात लवकर पूर्ण न होण्याच्या  खबरदारीस्तव आणि वाचकांच्या कल्पनाशक्तीस वाव द्यावा म्हणून तूर्तास फुल्याच!),  झेरॉक्स मशीनचा आणि प्रिंटरचा लयबद्ध आवाज़, दर आठवड्याच्या बैठका, त्यातली मला  अजिबात न कळणारी चर्चा, काम करताकरता अधूनमधून डोळ्यांवर ऐकायला येणारे 'सोजा  राजकुमारी सोजा' (आणि तसे झाल्यावर लगेच कॉफ़ीमेकरकडे घेतलेली धाव!), दिवसातून  एकदातरी व्हेंडिंग मशीनमध्ये ज़ाणारे काही क्वार्टर्स (स्थानिक २५ पैसे) आणि बाहेर  येणारा सोडा अगर चिप्स आणि या सगळ्यात दडलेले कष्टाचे काम यांमुळे माझे नऊ ते पाच  स्थिरस्थावर झाल्यासारखे वाटू लागले. दररोज़चे काम करतानाच कॅरोलायना हरिकेन्सच्या  हॉकी गेमबद्दलची चर्चा होते. वीकेंडला काय केले आणि येत्या वीकेंडला काय करायचे  आहे, याचे वेळापत्रक व्हेरिफ़िकेशनच्या वेळापत्रकाइतकेच सूत्रबद्धपणे बनवले ज़ाते.  तसे झाले की येणाऱ्या शुक्रवारच्या संध्याकाळच्या प्रतीक्षेत आठवड्याचे बाकीचे दिवस  सुसह्य होऊन गेल्याचे ज़ाणवतही नाही. संध्याकाळी बसमधून घरी येताना काढलेल्या तासभर  झोपेला आता सकाळी कार्यालयात ज़ातानाच्या बसमधील चाळीस मिनिटांच्या झोपेची साथ मिळू  लागली, एव्हढाच काय तो ठरवलेल्या वेळापत्रकातला छोटासा (?) बदल.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;डिसेंबरात भारतात ज़ायचा बेत आहे. त्यासाठीचे तिकीट आतापासूनच आरक्षित केले नाही,  तर लवकरच किमती गगनाला भिडणार हे अटळ सत्य डोळ्यांसमोर दिसते आहे. फ़ीचे पैसे,  देणेकऱ्यांची देणी हा सांसारिक स्वरुपाचा खर्च विद्यार्थीदशेतच झेलायला लागतोय. पण  अज़ून आतापर्यंत काम केलेल्या तीन आठवड्यांचा सोडा, तीन दिवसांचाही पगार मिळालेला  नाही. ते सुद्धा आम्ही तासाच्या बोलीवर काम करणारे वेठबिगार असताना. बरे आतापर्यंत  एकही खाडा केलेला नाही. पण आमच्या हक्काच्या साडेअठरा डॉलर प्रतिताससाठी झगडणारा  कोणी शरद रावांसारखा कैवारी (! हाहाहा... पगार नसला झाला की काय काय (वाट्टेल ते!)  आठवेल/सुचेल काही सांगता येत नाही, हे मला आता पुरेपूर पटले हो!) इकडे नाही आणि  इकडे संप बिंप पुकारता येण्याचा अनुभव आणि कौशल्य दोन्ही नाही ः( कौशल्य आहे ते  सॉफ़्टवेअरच्या तंत्राचे, ज्ञानाचे, त्यामधील पायाभूत संकल्पना आणि त्यांच्या  उपयोजनाचे. अनुभव आहे तो कष्ट करण्याचा आणि नीट काम करण्याचा.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;गिरणगावातल्या बंद पडलेल्या गिरण्यांचे भोंगे कधी काळी वाज़लेले ऐकले आहेत माझ्या  कानांनी. तिथला मुंबईकर साडेअठरा 'रुपये' प्रतितासापेक्षा कमी पगारावर आयुष्य काढत  आला आणि भोंग्यांच्याच गजरावर त्याला ज़ाग येत असे. त्यामानाने मी बराच सुखवस्तू  परिस्थितीत दिवस ढकलतोय (?) याची ज़ाणीव झाल्यावर पुढच्या पहाटे गजर झाला रे झाला की  दात घासायला बेसिनसमोर उभे राहण्याची अनामिक प्रेरणा मिळते. अशा वेळी माझे 'नऊ ते  पाच' मला पगारापासून बरेच दूर कुठेतरी घेऊन गेलेले असते.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/20108582-114992966512709321?l=meeakshay.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://meeakshay.blogspot.com/feeds/114992966512709321/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=20108582&amp;postID=114992966512709321' title='8 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/20108582/posts/default/114992966512709321'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/20108582/posts/default/114992966512709321'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://meeakshay.blogspot.com/2006/06/blog-post_114992966512709321.html' title='नऊ ते पाच - शेवट'/><author><name>Chakrapani</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06931612066464984955</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-20108582.post-114992889184908504</id><published>2006-06-10T03:39:00.000-05:00</published><updated>2006-11-10T20:30:54.450-05:00</updated><title type='text'>नऊ ते पाच - १</title><content type='html'>&lt;div class="content"&gt; &lt;p&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;गजराच्या घड्याळाचा गजर कसा वाज़तो, हे ऐकायची कधी पाळी न आल्याने (गरज़च न  पडल्याने) 'गजर झाल्यावर झोपेतून उठणे' या प्रकाराशी माझा आज़तागायत संबंध नव्हता.  माझ्यासाठी "अरे मेल्या, ऊठ आता. साडेआठ वाज़ले. ऐद्यासारखं खायचं आणि लोळायचं,  बास्! बाकी काही नाही", अशी आईने चालू केलेली आरती हाच खरा गजर. झालंच तर या मुख्य  आरतीला ज़ोडूनच, "कामात काडीची मदत नाही","अभ्यासाच्या नावानेही शून्य", इत्यादी  आरत्या गाऊन झाल्यावर, अगदीच निरुपाय झाला, की "चिटणिसांचा गुण लागलाय, दुसरं काही  नाही", अशी मंत्रपुष्पांजली! पूर्वजांवरच (आणि त्यांच्या कर्तृत्त्वावरच!)असे  खळबळजनक आरोप झाले, की नंतर मात्र प्रसाद वाटायला बाबा हज़र!!! मग तो प्रसाद भक्षण  करून अस्मादिकांची स्वारी बिछान्यातून बेसिनवर. गॅलरीत तोंडात ब्रश धरून पुढची  उरलीसुरली झोप काढायची (म्हणजे तसा प्रयत्न करायचा) आणि काकडआरती सुरू झाल्यावर  दूध, अंघोळीसाठी पुन्हा घरात पाऊल टाकायचे हा दिनक्रम. पण इकडे यायच्या दिवशी  विमानतळावर "अमेरिकेत कसा रे उठणार तू स्वतःचा स्वतः आणि कसं सगळं वेळेवर आवरणार  भराभ्भर!" या वाक्यातली आईच्या जिवाची तगमग, ती दिनचर्या अंगवळणी पडलेल्या  माझ्यासारख्या(निगरगट्टा)लाही क्षणभर भावूक (!) करून गेली ः(&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;चालू उन्हाळ्यात सहाय्यक अभियंता म्हणून एके ठिकाणी नोकरी करण्याची संधी मिळाली,  आणि (नाईलाज़ाने) गजरावर उठणे(ही) आले. आज़पावेतो हे पद फक्त बृहन्मुंबई  महानगरपालिकेच्या बोऱीबंदर येथील मुख्य कार्यालयातच अस्तित्त्वात आहे, असे मला वाटत  होते. आणि त्या कार्यालयातला त्या अभियंता साहेबाचा कारभार पाहून अशी नोकरी मिळणे  खरंच भाग्याचे आहे, असेही वाटायचे ;) त्यामुळे सदर कंपनीकडून मला 'सहाय्यक अभियंता'  पदासाठीचा प्रस्ताव आल्यावर मी त्याचा हसतमुखाने स्वीकार केला. तासाचे साडेअठरा  डॉलर्स मिळत असतील, तर म्या गरीबाची घड्याळाच्या गजरावर उठण्याचीही तयारी आहे  (वावा! काय पण पराक्रम!) नोकरीचा हा प्रस्ताव स्वीकारण्यामागे अमेरिकेतील  शिक्षणाच्या आगामी सत्राची फी, अगदी पूर्ण नसली तरी बव्हंशी ज़मवणे आणि आज़वरच्या  तांत्रिक ज्ञानाचा संगणक आणि दूरसंचार क्षेत्रात उद्योगधंद्याच्या तसेच  अर्थार्जनाच्या दृष्टीने कसा फ़ायदा होतो हे पाहणे असा दुहेरी उद्देश होता (अर्थात  "फ़र्स्ट थिंग्ज़ फ़र्स्ट"च्या तत्त्वानुसार, येथेसुद्धा, पहिला उद्देश पहिला आणि  दुसरा उद्देश दुसरा!)&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;नोकरीच्या पहिल्याच दिवशी मी ठरल्या वेळी कार्यालयात न पोचल्याने, कंपनीच्या  आवारातच माझ्या निरोप समारंभाची तयारी पहायला मिळेल, या विचाराने पाचावर धारण बसली  होती. अर्थात, गजरावर उठण्याच्या नेट प्रॅक्टिसचाही तो पहिलाच दिवस असल्याने, मी  स्वतःला उदार मनाने माफ़ केलेच होते म्हणा. ज़ोडीला बस चुकल्याचे सबळ कारणसुद्धा तयार  ठेवले होते. मात्र कामाचा पहिलाच दिवस असल्याने कंपनी आपल्या नादान कर्मचाऱ्याची  पहिलीच (आणि शेवटचीच) चूक पोटात घालेल असा दृढ विश्वास, आणि कार्यालयात (उशीरा)  पोचलेले इतर काही समदुःखी सहकारी पाहून जिवात जीव आला. मनुष्यबळ व्यवस्थापिका  (हुश्श! एच आऱ मॅनेजर किती सुलभ सुटसुटीत आहे, नाही का?!) बाईंनी स्वागत करून एका  स्वतंत्र कक्षात नेले. तेथे नवीन कर्मचाऱ्यांसाठी कंपनीतर्फ़ेच एक  माहितीसत्र  आयोजित करण्यात आले होते. कंपनीची संरचना, काम, व्यापार, सुरक्षा, कर्मचाऱ्यांचे  हक्क आणि ज़बाबदाऱ्या यांसंबंधी आवश्यक ती माहिती दिली गेली. माहिती देणारी मनुष्यबळ  खात्याची ती कर्मचारी एखाद्या हवाईसुंदरीसारखी असल्याने हे सत्र मुळीच कंटाळवाणे  झाले नाही ः) आवश्यक कागदपत्रांसंबंधीची सगळी औपचारीकता आटोपून झाल्यावर मला आणि  माझ्याच चमूत माझ्याबरोबर काम करण्यासाठी नियुक्त केलेल्या माझ्या  विद्यार्थीमित्रांना आमच्या चमूनायकाने (खरे तर चम्या नायकाने! पण इकडे यांना  आदराने ओ एल् म्हणायचे. ओ एल् = ऑब्जेक्ट लीड!) वरच्या मज़ल्यावरील आमच्या नियोजित  विभागात नेले. दरम्यान, जेवणाच्या वेळेत (कंपनीच्याच खर्चात = फुकटात) सुग्रास  भोजनाचा लाभ झाला आणि गजर लावून मेहनतपूर्वक उठल्याच्या कष्टांचे फळ मिळाल्याच्या  भावनेने अगदी कृतकृत्य व्हायला झाले. मग चमूतील इतर सहकारी कर्मचाऱ्यांबरोबर ओळख  करून देण्याघेण्यासाठी पाचदहा मिनिटांची 'ओळखपरेड' झाली. खरे तर तेव्हाच बारा  आठवड्यांच्या या 'कैद-ए-बामुशक्कत'ची पुसटशी कल्पना यायला हवी होती. पण  पुत्रप्रेमाने अंध झालेल्या (की डोळे दिपलेल्या?) धृतराष्ट्रासारखेच 'साडेअठरा डॉलर  प्रतितास' पाहून माझे डोळे दिपले होते. पहिल्या दिवशीचे पाच वाज़ले आणि  कोंडवाड्यातल्या ज़नावरासारखा मी बससाठी मोकाट धावलो. खरं सांगू का? माणसाने  आयुष्यभर कॉलेजातला नि शाळेतला विद्यार्थीच रहावे, कधी मोठेबिठे होऊ नये, आणि  नोकरीबिकरीच्या मायाजालात अडकू नये, असे त्यावेळी वाटले होते. 'आय ऍम नॉट मेड फ़ॉर  धिस नाइन टु फ़ाइव्ह स्टफ़' अशी पक्की खात्री झाली होती हो मनाची!&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;दुसऱ्या दिवशीपासून प्रत्यक्ष कामाला सुरुवात झाली. मी भ्रमणध्वनी (मोबाइल फोन!)  मध्ये ज़े सॉफ़्टवेअर वापरले ज़ाते, त्याचे कार्य अपेक्षेप्रमाणे चालते की नाही, हे  सॉफ़्टवेअर कंपनीच्या प्रमाणभूत पद्धतीनुसार लिहिले गेले आहे की नाही, त्याचा दर्जा  काय आहे, गुणवत्ता किती आहे, ते निकषांबरहुकूम आहेत की नाही,  ग्राहकांना दिलेल्या  वचननाम्यातली वचने सॉफ़्टवेअर पूर्ण करेल की नाही (निवडणुकीच्या वेळी राजकीय पक्ष  कसे आपापला जाहीरनामा प्रसिद्ध करून आपल्याला गंडवतात, तसे तर काही या सॉटवेअरमुळे  होणार नाही ना?!), इत्यादी इत्यादी तपासण्या करण्याचे काम करतो. या सगळ्याला एक छान  सोपा शब्द आहे, 'सॉफ़्टवेअर व्हेरिफ़िकेशन'. आता, जे लोक हे सॉफ़्टवेअर लिहितात  (त्यांना 'डेव्हलपर्स' म्हणतात), ते या कामाला आणि हे काम करणाऱ्या आमच्यासारख्या  पामरांना तुच्छ नज़रेने पाहतात आणि या सगळ्या धर्मकार्याची फक्त 'टेस्टिंग' अशी  संभावना करतात. वास्तविक पडताळा (व्हेरिफ़िकेशन) हे तपासणी/चाचणी (टेस्टिंग) बरोबरच  आणखीही काही अशा विस्तृत स्वरुपाचे काम आहे. आणि महत्त्वाचेसुद्धा आहे (तुम्ही भले  कितीही काही सॉफ़्टवेअर लिहाल हो! पण ते चालायला हवे ना आणि प्रमाणबरहुकूम असले  पाहिज़े ना!) त्यामुळे डेव्हलपर्सनी केलेल्या कोणत्याही हेटाळणीकडे दुर्लक्ष करून  'कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन'च्या तत्त्वाने प्रामाणिकपणे, सचोटीने हे  धर्मकार्य सिद्धीस न्यायचे हे आमच्या व्यवस्थापक साहेबांनी या पदासाठी मुलाखत  घेतानाच माझ्या मनावर पक्के बिंबवण्याची खबरदारी घेतली होती. 'व्हेरिफ़ायर' किंवा  'टेस्टर' हे डेव्हलपरच्या अस्तित्त्वाला धोका असल्याची भीती डेव्हलपरच्या मनात  बसली, की त्यांची मुज़ोरी बरीचशी निवळते, वगैरे कानमंत्र दिले गेले आणि माझे 'नऊ ते  पाच' चालू झाले.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/20108582-114992889184908504?l=meeakshay.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://meeakshay.blogspot.com/feeds/114992889184908504/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=20108582&amp;postID=114992889184908504' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/20108582/posts/default/114992889184908504'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/20108582/posts/default/114992889184908504'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://meeakshay.blogspot.com/2006/06/blog-post_10.html' title='नऊ ते पाच - १'/><author><name>Chakrapani</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06931612066464984955</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-20108582.post-114965767271000684</id><published>2006-06-07T00:14:00.000-05:00</published><updated>2006-11-10T20:30:53.992-05:00</updated><title type='text'>जगाच्या राजधानीतून - शेवट</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://photos1.blogger.com/blogger/7530/2003/1600/ny46.jpg"&gt;&lt;img style="margin: 0px auto 10px; display: block; text-align: center; cursor: pointer;" src="http://photos1.blogger.com/blogger/7530/2003/400/ny46.jpg" alt="" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://photos1.blogger.com/blogger/7530/2003/1600/NYC-1%20160.jpg"&gt;&lt;img style="margin: 0px auto 10px; display: block; text-align: center; cursor: pointer;" src="http://photos1.blogger.com/blogger/7530/2003/400/NYC-1%20160.jpg" alt="" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;    परतीच्या छोटेखानी प्रवासात न्यूयॉर्क दर्शनातील एकूण उत्सुकता ज़रा कमी  झाल्यासारखे वाटले. असे का होते आहे याची चाचपणी केली असता पोटातल्या कोकलणाऱ्या  कावळ्यांनी त्याचे उत्तर दिले. काहीतरी खायलाच पाहिज़े, हे तर कळत होते पण उरलेसुरले  न्यूयॉर्कसुद्धा बघायचे होते. बोट पुन्हा बॅटरी पार्कला (न्यूयॉर्कमधला भाऊचा धक्का  ;)) आल्यावर तेथे खाण्यापिण्याचे बरेचसे (चांगले पण महाग) पर्याय खुले होते. ज़वळच  एक हौशी कलाकार अमेरिकेच्या स्वातंत्र्यदेवतेसारखा पोशाख करून आणि चेहऱ्याची तशी  रंगरंगोटी करून अमेरिकेचा राष्ट्रध्वज हातात घेऊन उभा होता आणि येणाज़ाणाऱ्या  चिल्ल्यापिल्ल्यांशी हस्तांदोलन करून त्यांना आकर्षित करत होता. मग त्यांचे  आपापल्या पालकांकडे त्याच्याबरोबर फ़ोटो काढून घेण्यासाठी सुरू झालेले हट्ट पाहून  मला त्या सगळ्या प्रकारामागील 'बिझनेस स्ट्रॅटिजी' कळली. तशीच काहीशी मोर्चेबांधणी  बाज़ूलाच बसलेल्या एका कृष्णवर्णीय भिकाऱ्याने केली होती. आपल्या मनात आज़वर 'भिकारी'  या व्यक्तिरेखेचे ज़े चित्र कायम झाले आहे, ते लक्षात घेता, अमेरिकेतील या  व्यक्तिरेखांना भिकारी म्हणणे मला खरोखरच जिवावर येते. या महाशयांनी छान युक्ती  केली होती. येणाज़ाणारे पर्यटक कोणत्या देशाचे आहेत हे अचूक हेरून त्या देशाचे  राष्ट्रगीत तो आपल्या व्हायोलीनवर वाज़वत होता. अर्थात, त्याने 'जन-गण-मन' सुद्धा  वाज़वले. पण आम्ही भारतीय आणि त्यातून मराठी माणूस. राष्ट्रगीत संपेस्तोवर आम्ही ताठ  मानेने 'सावधान' स्थितीत उभे होतो (म्हणजे काय, तर खिशातून पैसे काढून भीक दिली  नाही. भारतात असताना चार आणे, आठ आणे अगदी क्वचित प्रसंगी बाहेर निघालेही असतील, पण  डॉलर? छे! कधीकधी मला माझ्या अशा वागण्याचे हसूही येते. हे योग्य की अयोग्य असा  प्रश्नही पडतो. पण उत्तर मात्र कधीच मिळत नाही ः( )&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;br /&gt;    बॅटरी पार्कबाहेरील एका फेरीवालीकडून न्यूयॉर्कची आठवण म्हणून दोन टी शर्टस्  घेतले (ते सुद्धा पाच डॉलरमध्ये दोन! अमेरिकेत असे 'गुड् डील' मिळण्याला आणि  अर्थातच मिळवण्याला फार महत्त्व आहे) निदान पोलीस तरी अपेक्षाभंग करणार नाही या  आशेपोटी पुढचा पत्ता ज़वळच उभ्या असलेल्या पोलिसालाच विचारला. त्याच्या सुचवणीनुसार  त्याने सांगितलेल्या ठिकाणी बसची वाट पाहत उभे राहिलो. आता आम्हांला एंपायर स्टेट  ही जगप्रसिद्ध गगनचुंबी इमारत बघायला ज़ायचे होते.&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;    बसमधून बघायला मिळालेले न्यूयॉर्कही तितकेच सुंदर आणि अमेरिकेतील इतर काही  शहरांच्या तुलनेने बरेच वेगळे वाटले. बसमधून बाहेरची वर्दळ आणि चिरकालीन आनंद नि  समाधानाचे चेहरे रंगवलेली माणसे बघायला मजा येत होती. हा न्यूयॉर्कमधला  'सामान्य'(?!) माणूस. सोमवार ते शुक्रवार काम आणि शनिवार-रविवार कामाच्या दुप्पट  आराम. रस्त्याच्या दुतर्फ़ा छोटीमोठी दुकाने, उपाहारगृहे, मध्येच न्यूयॉर्क  विद्यापीठ, मॅरिअट फ़ायनॅन्शिअल सेंटर हॉटेल, बसथांबे असे सगळे बघत बस पुढे चालत  होती. इच्छित स्थळी उतरल्यानंतर उजवीकडचा रस्ता पकडून पन्नास-एक पावले गेलो आणि १०३  मज़ली एंपायर स्टेटचे पहिले दर्शन झाले.&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;br /&gt;    इमारतीत पाऊल टाकण्याआधी पोटोबाची पूजा करायची ठरली. ज़वळच उभ्या असलेल्या  गाडीवरून सीग कबाबचा सुगंध जीभ चाळवत होता. त्याच्या बाज़ूच्या गाडीवर खारे दाणे,  चणे, मसालेदा काज़ू वगैरेची गाडी होती (अमेरिकेतही चणेवाल्याचे दर्शन झाले आणि मी  भरून पावलो;मात्र त्याच्याकडे मुंबईचा चनाछोर काही मिळाला नाही ः() सीग कबाब आणि  मसालेदार काज़ू हे आमचे त्या दिवशीचे जेवण आटोपले आणि एंपायरमध्ये प्रवेश केला.  अपेक्षेप्रमाणे याही ठिकाणी विमानतळसदृश सुरक्षाव्यवस्था होतीच. तिच्यातून यथासांग  पार पडून, तिकिटे काढून दूरनियंत्रित लिफ़्टमध्ये चढलो. आत उभे राहून ज़ाणवणारही नाही  अशा वेगाने ज़ाणाऱ्या त्या लिफ़्टने आम्ही ज़वळज़वळ एका मिनिटातच ८६व्या मज़ल्यावरील  सज्ज्यात पोचलो.&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;br /&gt;    ही इमारत न्यूयॉर्कचे आणखी एक भूषण. वर्ल्ड ट्रेड सेंटरचे ज़ुळे मनोरे उभे  राहिस्तोवर ही न्यूयॉर्कमधली सर्वात उंच इमारत होती. आणि अर्थात आता त्या  मनोऱ्यांना वीरगती प्राप्त झाल्यानंतर ही सर्वात उंच इमारत आहे. हिचे बांधकाम  विल्यम लँब या स्थापत्यशास्त्रज्ञाच्या मार्गदर्शनाखाली १७ मार्च १९३० रोजी चालू  झाले. एक वर्ष ४५ दिवसांच्या अथक परिश्रमांनंतर ही पूर्ण उभी राहिली. हिच्या  उभारणीस न्यूयॉर्कचे तत्कालीन राज्यपाल आणि त्यांचे सहकारी यांचा आर्थिक तसेच  राजकीय मार्गाने वरदहस्त लाभल्याचे समज़ते. इमारतीचा इतिहास, काही दुर्मिळ  छायाचित्रे, सद्यस्थिती आणि पर्यटकांसाठी उपयुक्त माहिती याबद्दल उत्सुकता  असणाऱ्यांनी &lt;a href="http://www.esbnyc.com/index2.cfm"&gt;http://www.esbnyc.com/index2.cfm&lt;/a&gt; या  इमारतीच्या अधिकृत संकेतस्थळाला अवश्य भेट द्यावी. आज़ही ही इमारत 'न्यूयॉकची  राजदूत' म्हणून अभिमानाने मिरवते.&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;br /&gt;    इमारतीचे मुख्य आकर्षण म्हणजे ८६व्या मज़ल्यावरून चहूबाज़ूंनी दिसणारे 'अख्खे'  न्यूयॉर्क. तेथील निरीक्षण सज्ज्यात उभे राहून आपण जगाच्या डोक्यावर उभे असल्याचा  भास झाल्यावाचून राहत नाही. हडसन नदी, ब्रूकलिन पूल, एलिस आणि लिबर्टी बेटे असा  नज़ारा एका बाज़ूला आणि दुसरीकडे न्यूयॉर्क बंदर, मेटलाइफ़ इन्शुरन्स बिल्डिंग आणि इतर  अनेक गगनचुंबी इमारती. एंपायर स्टेटच्या उंचीपुढे त्या खुज्याच वाटत होत्या. कदाचित  हेच या एंपायर नामक एंपरर चे एंपायर ः) रस्त्यावरच्या गाड्या तर अक्षरशः  मुंग्यांप्रमाणे भासत होत्या. आणि साहजिकच, माणसे तर दिसतही नव्हती.&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;br /&gt;    घोंघावणारा वारा, सहपर्यटकांचे हसणेखिदळणे आणि छायाचित्रे काढणे आणि सूर्यास्त  यांनी गज़बज़लेली एंपायर स्टेट मनसोक्त भटकून झाल्यावर बाहेर पडलो. पुढचा मुक्काम  होता टाइम स्क्वेअर (याला टाइम 'चौक' म्हणणे मला खरेच आवडणार नाही. चौक असावा तर तो  म्हणजे अप्पा बळवंत चौक, हुतात्मा चौक असा काहीतरी. यांना 'चौक' म्हणण्यातला  जिव्हाळा आणि शान टाइम स्क्वेअरला चौक म्हणण्यात नाही and vice versa)&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;br /&gt;    टाइम स्क्वेअर म्हणजे फ़क्त रोषणाई आणि नुसती रोषणाई. टाइम स्क्वेअर म्हणजे  जाहिराती आणि रहदारी. टाइम स्क्वेअर म्हणजे निळे, लाल, हिरवे, गुलाबी सगळ्या  रंगांचे दिवे. येथील विद्युत जाहिरातफलकांवर आपली जाहिरात लावण्याचा दर प्रतिसेकंद  काही दशलक्ष डॉलर्सच्या घरात असल्याचे समज़ते. त्यामुळे कोकाकोला, एच एस् बी सी,  सॅमसंग यांसारख्यांचे लाड हा टाइम स्क्वेअर इमानेइतबारे पुरवतो. न्यूयॉर्कमधील  प्रसिद्ध 'हार्ड रॉक कॅफ़े' येथेच. बँक ऑफ़ अमेरिकेचे कार्यालय, 'व्हर्जिन' हे  गाण्यांच्या कॅसेट्स, सीडीज़, डीव्हीडीज़ चे प्रसिद्ध दुकान, एक मोट्ठे खेळण्यांचे  दुकान सारे काही येथे होते. आणि नुसतेच उभे नव्हते तर रोषणाईने ओसंडून वाहत होते.  न्यूयॉर्क पोलीस खात्याची इमारत तर विद्युत रोषणाईने इतकी झगमगून गेली होती, की  लालबागचा राजा किंवा गणेश गल्लीचा गणपती अगर चेंबूरच्या टिळकनगरचा छोटा राजनचा  गणपती यांचे वैभव त्या झगमगाटापुढे फिके पडावे. आमच्याकडच्या काही पोलीस  ठाण्यामध्ये आज़ही मेणबत्तीच्या प्रकाशात कारभार चालतो, याचे त्यावेळी खूप वाईट  वाटले. "टाइम स्क्वेअरमधील एक शतांश टक्के वीज़ महाराष्ट्राला दिली तर देव अमेरिकेचे  (थोडेतरी) भले करो", अशी प्रार्थना करण्याचा मोह मी त्यावेळी मुळीच आवरला नाही (आणि  एन्रॉनच्या करंटेपणाच्या नावाने बोटे मोडायलाही विसरलो नाही) जाहिरातींबरोबरच दोन तीन विशाल विद्युतपटलांवर बातम्या चालू होत्या. दिवसाचे  हवामान आणि आठवडाभराच्या हवामानाचे अंदाज़ वर्तवणे चालू होते. शेअर निर्देशांक  दाखवला ज़ात होता. ज्ञानविज्ञान, राजकारण, मौज़मजा सगळे येथे हातात हात घालून,  गुण्यागोविंदाने नांदत होते.&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;br /&gt;    टाइम स्क्वेअरच्या प्रकाशात मनसोक्त न्हाऊन निघाल्यावर ज़वळच्याच एका उपाहारगृहात  रात्रीचे जेवण घेतले. खरे तर आम्हांला न्यूयॉर्क मध्ये भेळपुरी, पाणीपुरी असे  चाटवर्गीय पदार्थ नि तिथल्या वडापावची चव घ्यायची होती. पण फारच उशीर झाल्याने तो  संकल्प सिद्धीस नेता आला नाही.  एका भारतीय चायनीज़ (म्हणजे जेथील चायनीज़ जेवणाला आपल्या  पुण्यामुंबईतल्या 'गाडीवरच्या चायनीज़'ची चव असते) उपाहारगृहात हादडायचा बेतही  पाण्यात गेला. फार फार वाईट वाटले ः(&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;    रात्रीच्या साडेबारा वाज़ताही या भागात तुळशीबागेत असते तशी (किंबहुना त्याहून  जास्त) गर्दी होती. सारे न्यूयॉर्क शनिवारच्या रात्रीत झिंगले होते. जेवून झाल्यावर  तडक घरी आलो आणि मुकाट्याने झोपलो, कारण दुसऱ्या दिवशी सकाळी अंमळ लवकरच (सकाळचे ११  म्हणजे तसे लवकरच नाही का!) परतीची बस पकडायची होती. टाइम स्क्वेअरचा लखलखाट इतका  भिनला होता अंगात, की डोळे मिटूनही झोप येत नव्हती. झोपायलासुद्धा प्रयत्न करावे  लागतील असे काही बरेवाईट प्रसंग प्रत्येकाच्या आयुष्यात येतच असतात. टाइम स्क्वेअर  भेट हा त्यांपैकीच एक म्हणावा लागेल.&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;br /&gt;    आदल्या दिवशीच्या चकचकीत न्यूयॉर्क भेटीमुळे आलेला थकवा आणि न्यूयॉर्क दौरा  संपल्याचे दुःख यांचा परिणाम म्हणून परतीची बस पकडताना मन (आणि अंग!) थोडे ज़ड झाले  होते. मावशीचा निरोप घेऊन बसमध्ये बसलो. सुदैवाने या प्रवासात लक्कू कमी होते  त्यामुळे प्रवास सुखाचा होणार होता. आमच्या अंगात न्यूयॉर्कला घेतलेले 'आय लव्ह  न्यूयॉर्क'वाले टी शर्टस् पाहून काही सहप्रवासी आमच्याकडे ज़रा हेटाळणीपूर्ण नज़रेने  पाहत आहेत ('कुठल्या गावाहून आलेत' अशी काहीशी नज़र!) हे आमच्या नज़रेतून सुटले  नव्हते. तरीही न्यूयॉर्क भेटीचा अपार आनंद यत्किंचितही कमी होऊ न देता मी उरलीसुरली  झोप बसमध्येच काढली. ज़ाग आली, तेव्हा माझे 'गाव' आले होते. बसमधून उतरलो आणि घराकडे  रवाना झालो.&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;br /&gt;    उण्यापुऱ्या दोन दिवसांच्या सहलीतला हा दोन तपांचा आनंद उपभोगून मी स्वगृही  परतलो होतो. खूप मजा केली. माझ्यातला प्रवासी सुखावला होता आणि विद्यार्थी आपल्या  सामान्यज्ञानात आणि अनुभवात भर टाकून आला होता. जगाच्या राजधानीत फिरण्याचे आणि ती  अनुभवण्याचे भाग्य काहीसे लवकरच लाभल्याचे समाधान चेहऱ्यावर झळकत होते. या सहलीने  मला काही ताणतणावाचे प्रसंग, दुःखे या सगळ्यांपासून दूर दूर नेऊन प्रकाशाच्या,  आनंदाच्या राज्यात, सुखवर्षावात न्हाऊ घातले होते. आतापर्यंतची मरगळ झटकून नव्या  ज़ोमाने कामाला लागायची प्रेरणा या प्रवासातून मिळाली. अशा तरतरीत करणाऱ्या सहली  तुमच्याआमच्या सगळ्यांच्याच वाट्याला येवोत हीच सदिच्छा. पंधरा दिवसांपूर्वीच्या  त्या सहलीची ही कहाणी आता या भागात सुफळ संपूर्ण होते आहे. कोणा अनामिक कवीमनातून  उमटलेल्या मला अज़ूनही स्मरत आहेत - &lt;/span&gt; &lt;p align="center"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt; हासत दुःखाचा केला मी स्वीकार&lt;br /&gt;वर्षिले चांदणे पिऊन  अंधार&lt;br /&gt;प्रकाशाचे गाणे अवसेच्या रात्री&lt;br /&gt;आनंदयात्री मी आनंदयात्री!&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/20108582-114965767271000684?l=meeakshay.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://meeakshay.blogspot.com/feeds/114965767271000684/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=20108582&amp;postID=114965767271000684' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/20108582/posts/default/114965767271000684'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/20108582/posts/default/114965767271000684'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://meeakshay.blogspot.com/2006/06/blog-post_114965767271000684.html' title='जगाच्या राजधानीतून - शेवट'/><author><name>Chakrapani</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06931612066464984955</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-20108582.post-114965529290490359</id><published>2006-06-06T23:39:00.000-05:00</published><updated>2006-11-10T20:30:53.772-05:00</updated><title type='text'>जगाच्या राजधानीतून - ३</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://photos1.blogger.com/blogger/7530/2003/1600/NYC-1%20104.1.jpg"&gt;&lt;img style="margin: 0px auto 10px; display: block; text-align: center; cursor: pointer;" src="http://photos1.blogger.com/blogger/7530/2003/400/NYC-1%20104.1.jpg" alt="" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;डुलतडुलत मिस न्यू जर्सी समुद्राच्या रँपवर कॅटवॉक करत होती आणि आम्ही आसपासचे सौंदर्य न्याहाळण्यात रंगून गेलो होतो. न्यूयॉर्कच्या किनाऱ्यापासून दूर ज़ाताना मॅनहॅटन स्कायलाइन, जगप्रसिद्ध ब्रूकलिन पूल, डाव्या हातास न्यू जर्सी आणि उजवीकडे न्यूयॉर्क असे विहंगम दृश्य दिसत होते. ज़ोडीला भुर्ऱकन ज़ाणारी अमेरिकन तटरक्षक दलाची एखादी नौका आणि आकाशातून न्यूयॉर्क दर्शन घडवण्याची ज़बाबदारी पेलणारे एखादे हेलिकॉप्टर (अमेरिकेत या वाहनाला चॉपर म्हणायचे बरे का! ;)) होतेच. पहिला थांबा होता एलिस बेटाचा ज़े लिबर्टी बेटाच्या बाज़ूलाच आहे. पण एलिस बेटावर एक संग्रहालय आणि छान हवा या यतिरिक्त दुसरे काही नसल्याचे मावशीबाईंनी सांगितल्याने आम्ही तेथे उतरलो नाही. पाचच मिनिटात मिस न्यू जर्सी लिबर्टी बेटाकडे सरकल्या आणि 'हाऽऽ', 'ओऽऽ' च्या गजरात जनतेने आपापले कॅमेरे सरसावले. मिस न्यू जर्सींची स्वातंत्र्यदेवतेला हळुवार प्रदक्षिणा चालू झाली आणि वेगवेगळ्या कोनांमधून त्या देवीला कॅमेऱ्यांच्या क्लिकक्लिकाटांचे दंडवत लाभले. &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;आता देवी आली म्हणजे तिची कथाही आलीच! हा अमेरिकेच्या स्वातंत्र्यदेवतेचा पुतळा फ़्रान्सने अमेरिकेला आंदण म्हणून दिला. त्यावेळी तो तांब्याचा की ब्राँझचा होता. त्याला छान झळाळी होती. कालांतराने त्यातील तांब्याचे ऑक्सिडेशन होऊन हिरव्या रंगाचा तांब्याच्या ऑक्साइडचा थर तयार होऊन पुतळ्यावर ज़मा झाला आणि आता हा पुतळा हिरवट पिस्ता रंगाचा झाला आहे. न्यूयॉर्कमधील अनेक टोलेजंग इमारतींच्या छतांचा रंग हिरवा असण्याचीही हीच हकीकत आहे. आणि ती इत्थंभूत सांगणारा माहितीफलक पुतळ्याच्या चरणी समर्पित आहे, हे वेगळे सांगायलाच नको. मी मात्र अगदी अलीकडेपर्यंत हा पुतळा ताजमहालाच्या रंगासारख्या पांढऱ्याशुभ्र रंगाचा आहे, असेच समज़त होतो आणि सगळी माहिती वाचून झाल्यावर, ऑक्साइडचा थर खरवडून काढून पुतळ्याला पूर्वीची झळाळी प्राप्त करून देण्यासाठी हा धनवान देश काहीच का करत नाही, असा प्रश्न माझ्या बालमनाला पडल्यावाचून राहिला नाही.&lt;br /&gt;पुतळा ज्या चबुतऱ्यावर उभा आहे, तेथे पुतळ्याच्या पायथ्याशी असलेल्या सज्ज्यातून दूरस्थ न्यूयॉर्कचे सुंदर दर्शन घडते. तसेच पुतळ्याच्या मुकुटातूनही शहराचे अतिसुंदर दृश्य दिसते. दुर्दैवाने आम्हांला या दोन्ही ठिकाणी ज़ाता आले नाही. अमेरिकेवरील दहशतवादी हल्ल्यानंतर पर्यटकांसाठी हे स्थळ बंद करण्यात आले होते. अलीकडेच ते पुन्हा खुले करण्यात आले आहे. पुतळ्याच्या उज़व्या हातात उंचावलेली मशाल असून तिची ज्योत सोन्याची आहे. डाव्या हातात एक पुस्तक असून त्यावर ४ जुलै १७७६ लिहिले आहे. हा नक्कीच अमेरिकन स्वातंत्र्याचा जाहीरनामा असणार ज़ो थॉमस जेफ़रसनने तयार केला होता (तारखेवरून आठवले. अन्यथा माझे इतिहासज्ञान फ़ारसे स्पृहणीय नाही!) पुतळ्याचा डावा पाय खंबीरपणे रोवला असून उज़वा पाय पुढचे पाऊल टाकण्यासाठी किंचितसा उचलला आहे. खंबीरपणे रोवलेले पाऊल हे अमेरिकन सामर्थ्याचे प्रतीक आहे. या देशाने आर्थिक आणि राजकीय क्षितिजांवर लावलेले प्रगतीचे झेंडे, विज्ञान-तंत्रज्ञानात केलेली प्रगती, शिस्तबद्ध जीवनमान आणि पायाभूत सोईसुविधांचा विकास यांद्वारे जगात पक्के केलेले स्थान म्हणजे या स्वातंत्रदेवतेचे खंबीर पाऊल. उचललेले उज़वे पाऊल म्हणजे सतत प्रगतीशील आणि गतीशील असल्याची निशाणी. नवी क्षितिजे पादाक्रांत करण्याची महत्त्वाकांक्षा (ज़से मध्यपूर्वेतील इराक, सिरीया वगैरे ;)) आणि अवघ्या जगाचे नेतृत्त्व करण्याच्या क्षमतेचे प्रतीक. उंचावलेली मशाल म्हणजे अंधारातून प्रकाशाकडे, प्रगतीकडे ज़ाण्याची दिशा दाखवणारा दिशादर्शक (म्हणजे आम्ही नायक आणि तुम्ही अनुयायी. "आमच्या मागून यायचे हं बाळांनो, मस्ती करायची नाऽही!" असा भावार्थ ः)) (हे सगळे स्थलकालोत्पन्न विचार असून त्यांच्याशी या भटकंतीचा वाटाड्या या नात्याने माझ्यातला लेखक सहमत असेलच असे नाही ः)), बुशसाहेब मात्र नक्कीच असतील)&lt;br /&gt;हल्ली ही देवता ज़राशी काळवंडली आहे. तो वाढत्या प्रदूषणाचा परिणाम आहे की अमेरीका नावाच्या आपल्या लेकराची वाटचाल याचि देही याचि डोळां पाहण्याचे भाग्य लाभल्यामुळे, हे तीच सांगू शकेल ;)&lt;br /&gt;या ठिकाणी सगळ्याच पर्यटकांनी भरभरून फ़ोटो काढले. मूर्तीची भव्यता एकाच दृष्टिक्षेपाच्या आवाक्यापलीकडची आहे खरी. भालचंद्र नेमाड्यांनी 'कोसला' मध्ये अजिंठा लेण्यांचे वर्णन करताना म्हटल्याप्रमाणे याही ठिकाणी मूर्तीवर वारंवार डोळे फिरवावे लागतात. मूर्ती पाहणे इतकेच आपण करू शकतो (ती 'समज़ते' फक्त अमेरिकेलाच बहुतेक!) तिच्या कपड्यांवरील चुण्यांपासून ते सुबक बांध्यापर्यंत, हातातील पुस्तकापासून ते रेखीव मुकुटापर्यंत सगळेच वास्तुकलेचा एक सुंदर नमुना आहे. पहावे आणि नक्कीच पहावे यासारखे काहीतरी.&lt;br /&gt;या बेटावर पर्यटकांच्या सोईसाठी एक उपाहारगृह कम विश्रांतीगृह आहे. पर्यटनस्थळ असले तरी शिस्त, स्वच्छता आणि सुरक्षा व्यवस्था लक्षणीय आहे. मूर्तीवर किंवा चबुतऱ्यावर तर सोडाच, पण तेथील साध्या भिंतींवरसुद्धा 'विजू लव्ह्ज़ मुक्या'सारखी किंवा इतर ('भ'/'म' कारी) मुक्ताफळे कोणीही उधळलेली नाहीत. कोणाच्या घराण्याचा उद्धार केलेला नाही, की कोणाचा दूरध्वनी क्रमांक लिहिलेला नाही. शिवाजीमहाराजांनासुद्धा त्यांचे गडकिल्ले या ज़ागेइतके स्वच्छ आणि त्यामुळेच सर्वार्थाने पवित्र राहिलेले नक्कीच आवडले असते.&lt;br /&gt;आणखी खूप वेळ तिथल्या सदैव ताज्या वाटणाऱ्या पिवळ्यापोपटी हिरवळीवर बसून मूर्तिचिंतन करण्याचा विचार होता, पण एका सुरक्षा रक्षकाने सायंकाळी पाच वाज़ता नम्रपणे 'आता घरी ज़ाण्याची वेळ झाली' असे सांगितले (दंडुका आपटत 'चलो चलो चलो' केले नाही, त्यामुळे थोडे चुकचुकल्यासारखे झाले खरे!) त्यामुळे पुन्हा बेटावरील धक्क्याकडे पावले वळली. 'मिस न्यू जर्सी'चा कॅटवॉक पुन्हा अनुभवायचा होता ः)&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/20108582-114965529290490359?l=meeakshay.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://meeakshay.blogspot.com/feeds/114965529290490359/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=20108582&amp;postID=114965529290490359' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/20108582/posts/default/114965529290490359'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/20108582/posts/default/114965529290490359'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://meeakshay.blogspot.com/2006/06/blog-post_114965529290490359.html' title='जगाच्या राजधानीतून - ३'/><author><name>Chakrapani</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06931612066464984955</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-20108582.post-114965505675383863</id><published>2006-06-06T23:33:00.000-05:00</published><updated>2006-11-10T20:30:53.554-05:00</updated><title type='text'>जगाच्या राजधानीतून - २</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://photos1.blogger.com/blogger/7530/2003/1600/NYC-1%20047.jpg"&gt;&lt;img style="margin: 0pt 10px 10px 0pt; float: left; cursor: pointer;" src="http://photos1.blogger.com/blogger/7530/2003/400/NYC-1%20047.jpg" alt="" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;पण तो सूर्योदय उजाडलेला पहायलाच मिळाला नाही. पहायला मिळाले ते टळटळीत ऊन आणि घड्याळात वाज़लेला 'दुपारचा' एक! म्हणजे यावेळीही न्यू यॉर्क बोंबलले म्हणायचे ः( पण सुदैवाने देविकामावशी म्हणाली की अज़ून वेळ गेलेली नाही. स्टॅच्यू ऑफ़ लिबर्टी मात्र सायंकाळी पाचला पर्यटकांसाठी बंद होतो. त्यामुळे पटापट आवरून न्यू यॉर्कला ज़ाणारी गाडी पकडणे क्रमप्राप्त होते. सकाळच्या न्याहारीला तिने केलेली थालिपिठे कोंबून आणि अक्षरशः कावळ्याची अंघोळ आटोपून आम्ही घराबाहेर पडलो आणि धावतच गाडी पकडली.&lt;br /&gt;न्यूअर्कला गाडी बदलायची होती. न्यू जर्सी ट्रान्झिटमधून आता आम्ही 'पाथ'मध्ये आलो होतो. ही न्यू यॉर्क मधली मेट्रो रेल. ट्रान्झिटपेक्षा देखणी आणि आपल्या मध्य नि पश्चिम रेल्वेसारखी गज़बज़लेली. ज़रा मुंबईत आल्यासारखे वाटले. गप्पाटप्पा करत मुक्कामी उतरलो. मुक्काम होता 'वर्ल्ड ट्रेड सेंटर'. साडेचार वर्षांपूर्वी जेथे ते दोन प्रसिद्ध जुळे मनोरे (ट्विन टॉवर्स) उभे होते आणि लादेनने त्यांवर विमाने आपटवून अनेक निष्पाप जिवांचे बळी आणि असंख्य शिव्याशाप घेतले तेच. सध्या तिकडे फ़क्त शून्य आहे (ग्राउंड ज़ीरो) आणि आधीच्या मनोऱ्यांपेक्षाही जास्त उंचीचे स्मारक उभारण्याचे काम चालू आहे. त्याचबरोबर त्या वास्तूबाबत माहिती देणारे, हल्ल्याबाबत माहिती देणारे नि न्यू यॉर्क शहराने घडवलेल्या माणुसकी व जिद्दीचे गोडवे गाणारे फलक आहेत.&lt;br /&gt;वर्ल्ड ट्रेड सेंटरचे ते ज़ुळे मनोरे उध्वस्त करून लादेनने अमेरिकेच्या 'कानाखाली आवाज़ काढला' असे म्हणतात. अमेरिकी आर्थिक स्वायत्तता आणि सार्वभौमत्त्व यांचे प्रतीक, अमेरिका ही जागतिक महासत्ता असल्याची ती निशाणी, प्रत्येक अमेरिकी नागरिकाच्या अस्मितेचा मानबिंदू असे सगळे त्या मनोऱ्यांबरोबरच जेव्हा धुळीला मिळाले त्यावेळी रस्त्यावरचा फाटका अमेरिकनसुद्धा कोट्याधिशाइतकाच हळहळला असेल. आज़ही न्यू जर्सीला मित्रासोबत मॅनहॅटनची आकाशरेषा (स्कायलाइन!) न्याहाळताना त्या मनोऱ्यांची अनुपस्थिती ज़ाणवत होती. आज़वर चित्रातच त्यांना पाहिले होते. प्रत्यक्ष पाहण्याचा योग आला नव्हता. आणि जेव्हा तो आला, तेव्हा ते तेथे नव्हते (दात आहेत तर चणे नाहीत आणि चणे आहेत तर दात नाहीत). "दे आर मिसिंग" असे ज़वळच उभा असलेला एक अमेरिकन खेदपूर्वक म्हणाला. मला मात्र तेथे फिरताना खंत लागून राहिली होती, ती जगातल्या अनेक प्रेक्षणीय स्थळांपैकी नि वास्तुशिल्पांपैकी एक नष्ट झाल्याची. तेथे फिरताना ज़वळज़वळ प्रत्येक फलकावर ते ज़ुळे मनोरे माझे लक्ष वेधून घेत होते. आज़ ज़र ते तेथे असते तर कसे दिसले असते, याचाच विचार मी करत होतो. आणि त्याचबरोबर एक विचित्र आंतरीक आनंद झाला होता, तो मुंबईत (आणि भारतात) असे कोणतेही टोलेजंग वास्तुशिल्प नसल्याचा, जे तमाम भारतीयांच्या अस्मितेचे नि भारताच्या राजकीय,आर्थिक वगैरे वगैरे अस्मितेचे प्रतीक आहे (ये मेल्या लादेन! कुठे आपटवणार आहेस विमान? असा तो वन रूम किचन मराठमोळा मध्यमवर्गीय आनंद ः))&lt;br /&gt;वर्ल्ड ट्रेड सेंटरसमोरून सरळ आतल्या बाज़ूस ज़ाणारा रस्ता भटकंतीसाठी निवडला आणि आमच्या पायगाडीला किक मारली. अमेरिकेत आल्यापासून प्रथमच मी 'फेरीवाले' पाहत होतो. हा रस्ता मुंबईच्या फॅशन स्ट्रीटची आठवण करून देत होता. रस्त्यावर बसून खाण्यापिण्याचे जिन्नस, कपडे, अत्तरे, पायताणे इत्यादींची विक्री चालली होती. पर्यटक तसेच स्थानिक इतरेजन खरेदीत रमले होते. आमचा आपला दृष्टीक्रय (विंडो शॉपिंग!) चालू होता. न्यूयॉर्क इतकी रहदारी मी आज़वर अमेरिकेत फिरलेल्या ठिकाणी कुठेच बघितलेली नाही. तो ट्रॅफ़िक डोळेभरून पाहिल्यावर, मी जेथे राहतो त्याला आमच्या स्थानिक मित्रमंडळात 'खेडेगाव' का म्हणतात, ते पटले. आनंदाची गोष्ट म्हणजे आसपासच्या दुकानांमध्ये तसेच रस्त्यावर बरीचशी आशियाई (प्रामुख्याने भारतीय) तोंडे दिसत होती. त्यामुळे परदेशात राहत आहोत ही ज़ाणीव काही काळ पुसली गेली. खूप बरे वाटले. पुढे ज़ातोय तोच फेरीवाल्यांची पळापळ चालू झाली आणि कळले की पोलिसांची धाड पडली आहे. छान! म्हणजे दादर(पश्चिम) स्थानकाबाहेर जशी 'गाडी आली गाडी आली' अशी वर्दी येते आणि सगळे फेरीवाले आपले चंबूगबाळे आवरून पळ काढतात, तसाच काहीसा हा प्रकार. मन सुखावले. पण इथले मामा लोक बहुदा हप्ता घेत नसावेत. कारण दोनच मिनिटात रस्ता पादचाऱ्यांसाठी मोकळा झाला होता ः) अमेरिकेतील ती दादरकर समस्या पाहून माझ्यातल्या दादरकराची छाती अभिमानाने फुलून आली. अमेरिकेतील दहा महिन्यांच्या वास्तव्यानंतर पहायच्या राहून गेलेल्या गज़बज़ाट, रहदारी, आवाज़ या सगळ्या गोष्टी मला 'याचि देही याचि डोळा' अनुभवायला मिळत होत्या.&lt;br /&gt;फिरत फिरत, इकडेतिकडे वाट विचारत आम्ही न्यूयॉर्क शेअर बाज़ाराज़वळ पोचलो. आश्चर्याची गोष्ट म्हणजे अमेरिकेत तुम्ही कोणाला पत्ता विचारला तर ती व्यक्ती गडबडून ज़ाते. घरटी किमान दोन गाड्या घेऊन भटकणाऱ्या अमेरिकन मंडळींना रस्ते नि पत्ते कसे माहीत नसतात, याचे राहून राहून आश्चर्य वाटायचे. मात्र या प्रश्नाला मॅपक्वेस्ट, गूगल मॅप्स, रोड ऍटलस् अशी उत्तरे मिळाली. जिथे जायचे आहे ते ठिकाण, आणि जिथून जायचे आहे ते ठिकाण हे दोन्ही अंत्यबिंदू नोंदवायचे आणि इंटरनेटवरून रस्ते व पत्ते शोधायचे, याची या मंडळींना इतकी सवय आहे, की उद्या त्यांच्यापैकी कोणाला पुण्यात वाडिया कॉलेजच्या आसपास सोडले आणि बुधवार पेठेतल्या पोस्टात ज़ायचे आहे असे सांगितले, तर बिचारा उद्विग्न होऊन आत्महत्या बित्महत्या करायचा. आमच्याकडे अमुक रस्त्यावरचा तमुक पानवाला कुठे आहे, हे कोणीही लीलया सांगतो. त्यासाठी आम्हांला नकाशे गुगलून काढायला लागत नाहीत. येथे मात्र न्यूयॉर्क शेअर बाज़ाराकडे ज़ाणारा रस्ता कुठे आहे, या आमच्या प्रश्नाच्या उत्तराची सुरुवात "दॅट्स ऍक्च्युअली अ गुड क्वेश्चन" अशी होत होती. अमेरिकन माणसाच्या स्थल-दिशा ज्ञानाची कीर्ती ऐकून होतोच, आज़ ती अनुभवायला मिळत होती.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शनिवार असल्याने बरेच पर्यटक होते. हास्यविनोद, छायाचित्रण आणि खाण्यापिण्याची रेलचेल होती. न्यूयॉर्क शेअर बाज़ार आणि तेथील वातावरण पाहून तरी १९२९ च्या जागतिक मंदीत हा बाज़ार रसातळाला पोचला होता आणि अवघी अमेरिका दिवाळखोरीत निघाली होती, हे सांगूनही खरे वाटले नसते. त्याच्या बरोबर समोरच अमेरिकेचे पहिले राष्ट्राध्यक्ष जॉर्ज वॉशिंग़्टन यांचा पूर्णाकृती पुतळा आहे. याच ठिकाणी त्यांनी ३० एप्रिल १७८९ रोजी अमेरिकेचे पहिले राष्ट्राध्यक्ष म्हणून शपथ घेतली होती. मग जॉर्जसाहेबांबरोबर एक छायाचित्र काढले. शेज़ारच्या गोऱ्याचा अस्वलसदृश (!) बलदंड कुत्रा आणि ज़वळून चाललेल्या मडमेचे शेंबडे फ़्रेंच पूडल यांच्या प्रेमळ संवादांना कंटाळून आम्ही तिकडून काढता पाय घेतला.&lt;br /&gt;हे सगळे आटोपेस्तोवर दुपारचे ३ वाज़ले. दुपारच्या जेवणाला बुट्टी मारायचे ठरले कारण आता अमेरिकेच्या स्वातंत्र्यदेवतेच्या दर्शनास ज़ायचे होते. वैष्णोदेवीस ज़ाताना, एकवीरेच्या दर्शनास ज़ाताना कष्ट करून ज़ायचे असते. पायऱ्या चढत, नागव्या पायाने नि दगडधोंड्यांची पर्वा न करता, मुखी देवीनामाचा जप करत ('तूने मुझे बुलाया शेरावालिये' स्टाइलमध्ये) आणि श्रद्धायुक्त, निर्मळ अंतःकरणाने; पण या देवतेच्या दर्शनासाठी खास बोटींची सोय आहे (आपल्याकडे घारापुरीची लेणी पाहण्यासाठी भाऊच्या धक्क्यावरून लाँच पकडतात तसे). कारण हिचे देवालय खुद्द न्यूयॉर्कमध्ये नसून ज़वळच्याच लिबर्टी बेटावर आहे. आपल्याकडे कश सागरकन्या, मरमेड, मत्स्यगंधा वगैरे असतात, तशी आमच्याकडे कोणा मिस न्यू जर्सी नामक बोटीचे तिकीट होते. आणि ते तिकीट मिळवण्यासाठी आम्हांला, वानखेडेवरच्या भारत-पाकिस्तान क्रिकेट सामन्याचे तिकीट मिळवायला जितकी रांग असेल, त्यापेक्षा मोठ्या रांगेत पाऊण तास ताटकळायला लागले. अर्थात मिस न्यू जर्सी म्हणण्याइतके तिच्याकडे काही नव्हते म्हणा (तिच्यापेक्षा आपल्या मिस केशवजी नाईक चाळ छाप अंबेसेडर्स किंवा भाऊचा धक्क्यावरची 'मुंबईची देखणी' सुद्धा देखण्या वाटाव्यात), पण ११सप्टेंबरच्या त्या हल्ल्याचा अमेरिकेने इतका धसका घेतलाय, की बोटीत चढण्यापूर्वी अक्षरशः विमानतळावर असते तशा सुरक्षेव्यवस्थेतून पार पडावे लागले. अखेर बोटीत चढलो आणि महासत्तेच्या स्वातंत्र्यदेवतेचे पहिले दर्शन झाले.&lt;br /&gt;लिबर्टी बेटावर पोचून आम्ही या स्वातंत्र्यदेवतेची, १० महिन्यांची प्रतीक्षा, ग्रे हाउंडच्या प्रवासातले जागरण आणि अर्थातच खर्ची घातलेले शंभर-एक डॉलर्स, या सगळ्याच्या खणानारळाने ओटी भरण्यासाठी आता आणखी अर्धा तास वाट बघायची होती.&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/20108582-114965505675383863?l=meeakshay.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://meeakshay.blogspot.com/feeds/114965505675383863/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=20108582&amp;postID=114965505675383863' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/20108582/posts/default/114965505675383863'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/20108582/posts/default/114965505675383863'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://meeakshay.blogspot.com/2006/06/blog-post_07.html' title='जगाच्या राजधानीतून - २'/><author><name>Chakrapani</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06931612066464984955</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-20108582.post-114965474073321410</id><published>2006-06-06T23:27:00.000-05:00</published><updated>2006-11-10T20:30:53.342-05:00</updated><title type='text'>जगाच्या राजधानीतून - १</title><content type='html'>&lt;span style="font-size:130%;"&gt;सयाजी शिंदे, रेणुका शहाणे, वर्षा उसगांवकर अभिनित 'अबोली' या चित्रपटातले 'बंबई मोठी बाबा बंबई मोठी, पैशाची दाटी समिंदराकाठी' हे गाणे त्या दिवशी अचानकच आठवले. अमेरिकेत येण्यापूर्वी अवघा जन्म मुंबईत गेलेला. त्यामुळे समुद्राकाठी असणाऱ्या पैशाच्या दाटीबरोबरच, मुंबईतील बी बी दादरचे (दादर पश्चिमचे!!) किर्तीकर मार्केट (त्याचे आधुनिक नाव वीर सावरकर मंडई आहे), शिवाजी पार्क नि लगतची चौपाटी, कुलाब्याचे बडे मियां नि दादरचे प्रकाश नि सायबिणी, रिगलपासून ते थेट प्रबोधनकार ठाकरेपर्यंतची नाट्य-चित्रपटगृहे, लोकलगाड्या नि 'बेस्ट' (खरोखर!), या सगळ्यासगळ्यातली मौज़ अनुभवलेली. तिसरीच्या भूगोलात महाराष्ट्राची राजधानी मुंबई असे घोकले होते. गेल्या बावीसएक वर्षांत त्याची पुरेपूर प्रचिती आली. राज्याचे प्रशासन, देशाच्या तसेच महाराष्ट्राच्या आर्थिक नाड्या, अठरापगड ज़ातीधर्मांचे लोक, सगळे आमच्या चिमुकल्या मुंबईतच अडकलेले. त्यामुळे हे छोटेसे शहर 'राज'धानी म्हटल्यावर 'गर्व से कहो हम हिंदू हैं'सारखी 'गर्व से कहो हम मुंबईकर हैं'ची गर्जना मनात घुमायची.&lt;br /&gt;जगाच्या राजधानीबाबत नुसतेच ऐकून होतो. प्रत्यक्ष पाहण्याचा योग मात्र इतक्या लवकर येईल असे वाटले नव्हते. वास्तविक डिसेंबरात फ़िलाडेल्फ़ियाला गेलो होतो, तेव्हाच दोन दिवसाचा न्यू यॉर्क दौरा आखला होता, पण काही अडेलतट्टू मंडळींनी न्यू यॉर्कला ज़ाण्याऐवजी 'न्यू यॉर्क'नावाच्या क्लबमध्ये जगाच्या राजधानीची सफ़र घडवली तेव्हा हसावे की रडावे कळेनासे होऊन गेले होते. यावेळी मात्र संधी सोडायची नव्हती. नाही म्हणायला विद्यापिठातले एक प्रशासकीय काम आड येत होते, पण तिथल्या 'दयाळू'(!?) बाईंना 'वीकेंडला घरी बोलावून भारतीय जेवण करून घालतो'चा नवस बोलल्यावर गाडी सुटायला तीनच तास बाकी असताना ते काम तडीस नेले (आता तर नवस फेडायलाच हवा!)&lt;br /&gt;त्या तीन तासात कपडे घालण्यापासून (बॅगेत!!!!!) ते प्रवासातले खाणेपिणे, औषधे, कॅमेरा, इतर साधनसामुग्री यांच्या ज़मवाज़मवीत वेळ कसा ज़ात होता कळलेच नाही. हे सगळे चालू असतानाच एका हितचिंतकाने 'ग्रे हाउंडका ओव्हरनाइट जर्नी इतना सेफ़ नही है' सांगून बॅगेत घातलेले आमचे लॅपटॉप्स बाहेर काढायला लावले आणि त्याचबरोबर पाकिटातली काही रक्कमसुद्धा घरच्याच कपाटात बंद झाली. त्याचे सूचना देणे चालू असतानाच अस्मादिकांची स्वारी केव्हाच न्यू यॉर्कला पोचली होती. धावतपळत स्थानिक बस पकडून ग्रे हाउंड बस स्थानकावर गेलो. ग्रे हाउंड ही अमेरिकेच्या पूर्व किनारा आणि लगतच्या ठिकाणांना ज़ोडणारी बससेवा आहे. आमच्या गावातल्या त्या स्थानकावर गेल्यावर मुंबई सेंट्रलच्या एस टी स्थानकाची आठवण झाल्याशिवाय राहत नाही. थोडक्यात, ग्रे हाउंड ही अमेरिकेच्या पूर्व किनाऱ्यावरील एस टी आहे. 'अलिबाग अलिबाग' करणाऱ्या मुंबई सेंट्रलच्या गणवेशधाऱ्यांप्रमाणेच येथेही 'रिचमंड, बॉल्टीमोर, न्यू यॉर्क' अशी (उंची) नावे कोकलणारे सिनेमातल्या जल्लादांप्रमाणे भासणारे ग्रे हाउंडचे चालक असतात. 'कोमॉन कोमॉन मॅऽऽन' म्हणत एका जल्लादाने आमचे स्वागत केले. हातातली बॅग आणि तिकिटे छातीशी घट्ट आवळून भेदरलेल्या कोकरांसारखे आम्ही बसमध्ये शिरलो. बसमध्ये मी आणि माझा मित्र असे दोनच भारतीय आणि बाकीचे लक्कू! अमेरिकेतील कृष्णवर्णीयांना 'निग्रो' किंवा 'ब्लॅक' म्हणणे म्हणजे ज़ातीवाचक शिवी देण्यासारखे आहे. त्यांना प्रेमाने 'आफ़्रिकन अमेरिकन' असे म्हणायचे (त्यांच्याबरोबर 'ब्लॅकजॅक' खेळताना लाडेलाडे 'आफ़्रिकन अमेरिकन जॅक' खेळतोय असे म्हणायचे ;) ) इकडच्या देसी जनतेने काळ्यांना कल्लू केले आणि त्यांची बलदंड शरीरयष्टी, निर्विकार पण तरीही ज़ुलमी नि एखाद्या खुन्यासारखा भासणारा चेहरा बघून त्यांना 'कल्लू' म्हणजे काय ते कळेल या (महाराष्ट्रीय) भीतीने 'कल्लू'चे 'लक्कू' केले.&lt;br /&gt;बसमधल्या त्या लक्कूंच्या भीतीने आमची अख्खी रात्र आळीपाळीने सामानावर पहारा करण्यात (आणि रिचमंडच्या थांब्यावर आळीपाळीने अनावर विधी उरकण्यात) गेली. त्यांचे विचित्र इंग्रजीतील हास्यविनोद, गाणी आणि बसभर एअर फ़्रेशनरसारखा पसरलेला सिगार आणि मद्याचा (सु?)गंध यांनी आम्ही गुरखे आमच्या ड्युटीवर न झोपण्याची खबरदारी घेतली. चाळीस मिनिटे उशीराने धावत असलेली आमची बस चालकाने नियोजित स्थळी चाळीस मिनिटे आधीच कशी काय पोचवली, याचे उत्तर मात्र आम्हांला अज़ूनही मिळालेले नाही. वाटेत वॉशिंग़्टन डीसी ला (ही अमेरिकेची राजधानी) मेमोरिअल बिल्डिंग, बुश साहेबांचे निवासस्थान आणि वॉशिंग़्टनचा तो प्रसिद्ध मनोरा यांना निळ्यापांढऱ्या, दुधाळ प्रकाशात न्हाऊन निघाल्ले पाहिले. दुर्दैवाने त्यांना कॅमेऱ्यात बंद करता आले नाही.&lt;br /&gt;नियोजित स्थळी म्हणजे न्यूअर्कला पोचलो तेव्हा सकाळचे साडेसहा झाले होते. मित्राची मावशी आम्हांला उतरवून घ्यायला यायची होती. पण ठरल्या वेळेचा चाळीस मिनिटे अगोदरच पोचल्याने आम्हीच तिला बस स्थानकावरून फ़ोन करून झोपेतून जागे केले. थोड्या काळजीयुक्त स्वरातच तिने 'मी सांगते त्याप्रमाणे तुम्ही या' सांगितल्यावर तिच्यापेक्षा आमची काळजी वाढली (या क्षणी माझी आई असती तर कदाचित पुढच्याच बसने मला परत रालेला घेऊन आली असती!) पण न्यू यॉर्क मोहिमेवर निघालेल्या आम्ही मावळ्यांनी स्थानिक आगगाडीची तिकिटे काढून मावशीबाईंच्या घरची गाडी पकडली. 'न्यू जर्सी ट्रान्झिट' ही ती 'लोकल'. पण रुबाब, व्यवस्था सगळे आपल्या इंद्रायणी एक्स्प्रेसच्या प्रथम श्रेणीसारखे. ते पाहून नक्की 'लोकल' कशी असते असा प्रश्न मला पडला.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;तिकडच्या तिकीट तपासनिसांची पद्धतही अजबच. तुमच्याकडचे तिकीट घेऊन कुठे जायचे हे पाहून आपल्याज़वळच्या तिकीटसदृश एका कागदी पट्टीवर ठराविक वेळा 'टाक् टाक्' करून ज़वळच्या टोच्याने भोके पाडणार आणि तुमच्या आसनावर एका पट्टीत ते खोवणार. त्या पट्टीवर पाडलेली भोके आणि तुम्हाला जेथे जायचे आहे ते ठिकाण यांचा काहीतरी परस्परसंबंध आहे. तो काय आहे ह ज़ाणून घ्यायचा प्रयत्न केला असता तपासनीस मामा मनापासून हसले ("काय तू! च्यायला इतके पण कळत नाही?! ज़ाऊ दे, सोड" अशी काहीशी भावना!) आणि पुढच्या प्रवाशाकडे गेले.&lt;br /&gt;आम्हांला 'रावे' नावाच्या स्थानकावर उतरायचे होते. त्यामुळे मावशीबाईंनी दिलेल्या सूचनांचे काटेकोर पालन करून (डोळ्यांत तेल (आतापर्यंत पाणी आले होते, बदल म्हणून थोडे तेल घालायला लागले!) घालून स्थानकांची नावे वाचत आणि हे स्थानक कुठले आहे हे सांगणाऱ्या गाडीतील ध्वनिक्षेपकावरील गोड आवाज़ाकडे कान लावून) न्यूअर्क नंतरची एअरपोर्ट, नॉर्थ एलिझाबेथ, एलिझाबेथ आणि लिंडन ही स्थानके सोडली आणि रावेला उतरलो.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;मित्राच्या मावशीकडे गरमागरम पोहे, आदल्या रात्रीचा खिमापाव, पावभाजी, संत्र्याचे सरबत असा जंगी बेत होता. त्यावर आडवा हात मारला, अंघोळ आटोपली, टीव्हीवर 'ब्लू स्ट्रीक' हा धमाल चित्रपट लावला आणि तो बघून झाल्यावर मस्तपैकी ताणून दिली. साडेनऊ तासांच्या प्रवासाचा इतका शीण ज़ाणवत होता, की सोफ़्यावर पडल्यापडल्या झोप कधी लागली कळलेसुद्धा नाही. संध्याकाळी मित्राने उठवले तेव्हा आठ वाज़ून गेले होते (आज़काल म्हणजे उन्हाळ्यात अमेरिकेत 'रात्री'(!) नऊला वगैरे सूर्यास्त होतो. हिवाळ्यात मात्र 'संध्याकाळी'(!) पाचालाच रात्रीच्या साडेआठसारखा काळोख होतो) भराभर आवरून घेतले कारण 'दा विंची कोड' बघायला ज़ायचे होते. चित्रपट बघायला ज़ाण्यापूर्वी तेथील 'ओक ट्री रोड' वर ज़रा भटकलो. हा रस्ता म्हणाजे पुण्यातला लक्ष्मी रोड किंवा दादरचा कबुतरखान्याज़वळचा परिसर आहे. बिस्मिल्ला नि ए वन चिकन शॉपपासून घसीटामल हलवाई, कंगन ज्युवेलर्स, शगुन सारीज़्, अमेरिकेतील प्रसिद्ध 'पटेल ब्रदर्स' (भारतीय वाणसामान आणि इतर गृहोपयोगी वस्तू भांडार या प्रकारात मोडणारी अमेरिकेतील दुकानांची प्रसिद्ध साखळी... त्यावरूनच 'पटेल' आडनावाच्या लोकांना अमेरिकेचा व्हिज़ा मिळायला इतके कष्ट का पडत असावेत, याची थोडीशी कल्पनाही आली. अमेरिकेत आलेला पटेल इथेच राहून असा फळला-फुलला नसता, तर आज़ ओक ट्री रोड आहे तसा दिसला नसता... रामसेंप्रमाणेच हे पटेल बंधू किती असा प्रश्न पडायला हरकत नाही) असे सगळे भटकल्यावर एका केरळी उपाहारगृहात जेवलो. बऱ्याच दिवसांनी अस्सल केरळी मसाले आणि ओल्या नारळाचा चव असलेले, खोबरे असलेले जेवण पोटात गेले. ते सुद्धा हळदीच्या पानाच्या मंद, प्रसन्न सुगंधासह!कृतकृत्य झालो. तृप्त मनाने ढेकर देऊन बाज़ूच्याच चित्रपटगृहात गेलो आणि 'द विंची कोड' पाहिला. फ़र्स्ट डे लास्ट शो. मजा आली.&lt;br /&gt;आटोपल्यावर टॅक्सी पकडून घरी आलो आणि पुन्हा ताणून दिली. दुसऱ्या दिवशीची सकाळ कधी उजाडतेय याची वाट पाहतच झोपलो. न्यू यॉर्क आता एका सूर्योदयावर येऊन ठेपले होते.&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/20108582-114965474073321410?l=meeakshay.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://meeakshay.blogspot.com/feeds/114965474073321410/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=20108582&amp;postID=114965474073321410' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/20108582/posts/default/114965474073321410'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/20108582/posts/default/114965474073321410'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://meeakshay.blogspot.com/2006/06/blog-post.html' title='जगाच्या राजधानीतून - १'/><author><name>Chakrapani</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06931612066464984955</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-20108582.post-114874388257189865</id><published>2006-05-27T10:29:00.000-05:00</published><updated>2006-11-10T20:30:53.015-05:00</updated><title type='text'>वाढदिवसाची अमूल्य भेट!</title><content type='html'>&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://photos1.blogger.com/blogger/7530/2003/1600/jagjit.jpg"&gt;&lt;img style="margin: 0pt 10px 10px 0pt; float: left; cursor: pointer;" src="http://photos1.blogger.com/blogger/7530/2003/400/jagjit.jpg" alt="" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="content"&gt; &lt;p&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;आईबाबा आणि मित्रमैत्रिणींपासून हज़ारो मैल लांब असताना वाढदिवस 'साज़रा' होऊ  शकतो, ही कल्पनाच मुळात असह्य आहे. त्यामुळे परवा माझ्या वाढदिवसादिवशी आणि  किंबहुना त्याच्या दोन-एक दिवस आधीपासूनच 'काय कपाळ साज़रा करणार' अशी भावना झाली  होती. त्यातच कार्यालयात नवीनच रुज़ू झालेला असल्याने बराच 'स्व-अभ्यास' चालू होता  (ज़से स्वतःहून कॉफ़ी मेकरवर कॉफ़ी बनवायला शिकणे, इतर कर्मचाऱ्यांशी काम  सोडून बाकीच्या सगळ्या विषयांवर गप्पा मारायला शिकणे, भ्रमणध्वनी प्रणाली पडताळा  चमूच्या (सॉफ़्टवेअर व्हेरिफ़िकेशन ग्रुप!!!) साप्ताहिक बैठकीत चर्चेच्या  मुद्द्यांपेक्षा समोरच्या अमँडाशी दृष्टीविनोद(!) करण्यातली मजा अनुभवणे वगैरे) या  अभ्यासात घरी येईस्तोवर इतके थकायला होते(!) की आठवडाभराची झोप काढण्यासाठीसुद्धा  वेळ मिळत नाही (कार्यालयात आणि साप्ताहिक बैठकीत झोपणे तर मुळीच परवडणार नाही!  अभ्यास कसा हो होणार नाहीतर! ;)); वाढदिवस 'साज़रा' करणे तर बाज़ूलाच राहिले. &lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;दोन दिवसांपूर्वीच विद्यापिठातला जगजीत सिंगचा गाण्यांचा नियोजित कार्यक्रम  'हाऊसफ़ुल्ल' असल्याचे कळले होते. हा कार्यक्रम माझ्या वाढदिवसाच्या पूर्वसंध्येला  असल्याने तीच वाढदिवसाची भेट असा स्वतःचा आगाऊ समज़ करून घेतला होता, आणि परीक्षा  झाली की बघू, म्हणून तिकिटे आरक्षित करण्यात दिरंगाई केली होती (त्याबद्दल इकडच्या  समस्त देसी जनतेने मला वेड्यात काढणेही झाले होते) वास्तविक कार्यक्रमाची घोषणा,  तिकिटांसंबंधी कुणाला संपर्क करायचा वगैरे माहिती तीन महिने (अति)आगाऊच मिळाली  होती, पण परीक्षा आणि अभ्यासाच्या धांदलीत तिकिटे काढायचे लक्षातच राहिले नाही, आणि  आता इतक्या सुंदर कार्यक्रमाला मुकावे लागणार याची हळहळ लागून राहिली होती.  तरीसुद्धा देवा (आणि दैवा) वर भरवसा ठेवून काहीही झाले तरीसुद्धा तिकीट मिळवायचा  प्रयत्न करायचाच या निर्धाराने अस्मादिकांची स्वारी कार्यालयातून घरी येण्याऐवजी  विद्यापिठाच्या आवारात वळली.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;अपेक्षेप्रमाणेच कार्यक्रमाला अलोट गर्दी होती. अनिवासी भारतीय आणि पाकिस्तानी  कुटुंबे, विद्यार्थीवर्ग, नोकरदार, बाबागाडीतल्यांपासून ते काठी टेकत  चालणाऱ्यापर्यंत सगळ्या वयाचे, सगळ्या प्रकृतींचे प्रेक्षक कार्यक्रमाला लाभले  होते. साडी, सुरवार-कुर्ता वगैरे पारंपारिक पोषाखातल्या बऱ्याचज़णांनी यानिमित्ताने   आपापला सांस्कृतिक दिन साज़रा करण्याचे मनावर घेतल्याचे दिसत होते. पण त्याचबरोबर  आपण अमेरिकेत राहतो याचा बडेजाव मिरवणे चालू होतेच, जसे 'कूल' ऐवजी 'खूऽल' (!),  'वॉटर' ऐवजी 'वॉठर्र' याप्रमाणे (उत्साहाच्या भरात कोणी एक पटेल की शहा चक्क 'गिव  मी टू वॉटर्स' असे म्हणाले. भावना महत्त्वाच्या म्हणून माझ्यातल्या मराठी  माध्यमाच्या विद्यार्थ्याने त्यांचे चुकीचे इंग्रजी व्याकरण पोटात घातले!) माझ्या  दोन मित्रांना आयोजकांनी स्वयंसेवक म्हणून नियुक्त केल्याने आणि मी तूर्तास  प्रेक्षक किंवा स्वयंसेवक कोणीही नसल्याने समाजसेवा करताना उडणारी त्यांची  तारांबळ (विनातिकीट!!) बघायला मजा येत होती. पावणेदोन तासांच्या प्रतीक्षेनंतर  शेवटी एकदाचे तिकीट मिळाले. ते सुद्धा जिचे तिकीट होते, ती व्यक्ती न आल्याने.  अर्थातच त्या तिकिटासाठी मला जास्त किंमत मोज़ायला लागली हे अधिक सांगणे न लगे  (कार्यक्रमाचे शेवटचे तिकीट दोनशे डॉलर्सना विकले गेल्याचे ऐकले होते तेव्हा माझे  खिसे दडपले होते, पण आयत्या वेळी मला मिळालेले हे तिकीट त्यामानाने चौपट स्वस्त  पडले म्हणायला हरकत नाही) एका बाईंनी "अरे पैंतीस डॉलरवाला तिकीट पचपन में कैसे बेच  रहे हो"चा घरगुती लढाऊपणा (अपेक्षेप्रमाणे!)दाखवला खरा, पण "अरे मेडम, डोलर चाहिये  के साहब का गाना चाहिये" म्हणून आयोजकांनी बाईंना कधीच चारीमुंड्या चीत केले. शेवटी  शिस्तबद्धपणे रांगेत उभे राहून सभागृहात गेलो नि स्थानापन्न झालो. तोवर जगजीतचे  "होशवालों को खबर क्या" चालूही झाले होते.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;मंचावर अतिशय साधी सज़ावट, समोर मध्यभागी रांगोळी, डाव्या हातास साथीला सिताऱ व  बासरी, मागे गिटार नि सिंथेसायझर, उजवीकडे तबला, ढोलक आणि घुंगरू, आणि मध्यभागी  गज़लसम्राट स्वतः गातोय, असे ते दृश्यच त्या संध्याकाळचे पहिले समाधान देऊन गेले.  जिवाचा कान करून मी शब्दन् शब्द हृदयात साठवत होतो.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p align="center"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;em&gt;हम् लबों से कह न पाए उनसे हाल-ए-दिल कभी&lt;br /&gt;और वो समझे नहीं  ये खामोशी क्या चीज़ है&lt;/em&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p align="left"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;em&gt;और वो समझे नहीं ये &lt;/em&gt;नंतरची शांतता खूप काही सांगून गेली.  त्यानंतरची &lt;em&gt;खामोशी &lt;/em&gt;टाळ्यांच्या कडकडाटात नि 'वाहवा', 'क्या बात है' च्या  गजरात कुठेशी हरवून गेली. आणि त्यानंतर सुरू झाला शब्द आणि सुरांचा चमत्कार. &lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p align="left"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;गज़ल ही खरी शब्दप्रधान गायकी. पण जगजीतच्या आवाज़ाने आणि सुरांनी  गज़लेला शब्दांच्या पलीकडे नेले आहे. त्याला प्रत्यक्ष गाताना ऐकले की  गीताच्या बोलांपेक्षा त्याच्या आवाज़ानेच वेड लागते. याचा अर्थ शब्दांचे मोल कमी  होते असा मुळीच नाही, तर एकाच शब्दाचे किंवा शेराच्या मिसरेचे अनेक पदर तो आपल्या  गायनातून उलगडून दाखवत असतो. त्यामुळे शब्दांची किंमत दुणावते असेच म्हणायला लागेल.  जगजीतचा धीरगंभीर आवाज़, पण योग्य वेळी हवा तिकडे तोच गंभीर आवाज़ थोडासा खट्याळ  होणं, एखाद्या मिसरेतील एक किंवा अनेक शब्द गाताना शब्दांवर ज़ोर देणं अगर  शब्दांनुसार आवाज़ातले चढ-उतार सांभाळणं यांमुळे ते गाणं फ़क्त कवीचं किंवा गायकाचं न  राहता आपसूक श्रोत्यांचंसुद्धा होऊन ज़ातं. &lt;em&gt;तेरे बारे में जब सोचा नही था&lt;/em&gt;,  &lt;em&gt;कोई फ़र्याद तेरे दिल में दबी हो जैसे&lt;/em&gt; या आणि अशा कित्येक गज़लांमधून आणि  कवितांमधून जगजीत सिंग नावाची जादू प्रेक्षकांना संमोहित करत होती आणि आम्ही सगळे  तिच्या तालावर डोलत होतो.  &lt;em&gt;कोई फ़र्याद तेरे दिल में&lt;/em&gt; ही वास्तविक  हुस्न-ए-मतला गज़ल आहे. आणि त्यातला दुसरा मतला हाच गज़लेचा गाभा किंवा हासिल-ए-गझल  शेर (ज़से गाण्याचे ध्रुवपद) आहे, हे जगजीत सिंगने ती गज़ल गायल्याशिवाय पटत नाही.  अर्थात याबाबत दुमत असू शकते, पण आधीच म्हटल्याप्रमाणे त्या आवाज़ातच अशी काही जादू  आहे की कोणता(ही) शेर किंवा शब्द श्रोत्याच्या मनात कायमचा घर करून राहील हे  गायकानेच ठरवावे आणि श्रोत्यांनी त्याला मूक मान्यता द्यावी. ऐकणाऱ्याला आपलेसे  करणाऱ्या या वशीकरणाची कला लाभलेल्या निवडक व्यक्तींमध्ये जगजीत सिंग हे नाव नक्कीच  आहे आणि असेलही! &lt;em&gt;हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी की हर ख्वाहिश पे दम निकले&lt;/em&gt; या  गालिबच्या गज़लेचा मक्ता गाताना तर जगजीत गाण्यामध्ये इतका हरवून गेला, की त्याने तो  मक्ता चार-पाच वेळा गायला आणि गातागाताच त्याचा अर्थसुद्धा सांगितला. मैखाना, वाइज़  यांच्यातला उपरोधात्मक परस्परसंबंध, तो गाण्यातून तसेच विनोदातून स्पष्ट करताना  तसेच इतरही काही शेर समज़ावून सांगताना त्याने दाखवलेली विनोदबुद्धी, हित्ने इन्शाची  &lt;em&gt;कल चौदवी की रात थी  &lt;/em&gt;गाताना प्रत्येक शेराची सानी मिसरा टाळ्या घेत होती.  'मक्ता पेश करता हूं, इन्शाजी की गज़ल है, हित्ने इन्शा' म्हटल्यावर अवघे सभागृह कान  टवकारून बसले.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p align="center"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;em&gt;बेदर्द ,सुननी हो तो चल, कहता है क्या अच्छी गज़ल,&lt;br /&gt;आशिक  तेरा, रुसवा तेरा, शायर तेरा, इन्शा तेरा&lt;/em&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p align="left"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;सानी मिसरा गाऊन झाल्यावर उमटलेले वावा-वावा आणि तोच टाळ्यांचा  कडकडाट कान भरून साठवून घेतला. &lt;em&gt;सरकती जायें है रुखसी नकाब आहिस्ता आहिस्ता&lt;/em&gt;  च्या वेळी तर पहिल्या ओळीपासून श्रोत्यांनी ठेका धरला होता आणि 'आहिस्ता आहिस्ता'  म्हणायला सुरुवात केली होती. &lt;em&gt;हया यकलख्त आई और शबाब&lt;/em&gt; नंतरचे आणि &lt;em&gt;दबे  होठों से देते हैं जवाब&lt;/em&gt; नंतरचे, &lt;em&gt;इधर तो जल्दी जल्दी है, उधर&lt;/em&gt;  नंतरचे &lt;em&gt;आहिस्ता आहिता&lt;/em&gt; तर श्रोत्यांनीच पूर्ण केले. &lt;em&gt;वो बेदर्दी से  सरकाते हैं अमी और मैं कहूं उनसे &lt;/em&gt;मधल्या &lt;em&gt;बेदर्दी &lt;/em&gt;वर घेतलेल्या हरकती  तर निव्वळ अप्रतिम! &lt;em&gt;ठुकराओ के अब के प्यार करो, मैं नशे में हूं&lt;/em&gt; मधल्या  नशा शब्द गातानाच्या वेळची त्याच्या आवाज़ातली नशा, &lt;em&gt;मैं नशे में हूं&lt;/em&gt;&lt;em&gt; &lt;/em&gt;वरच्या हरकती खरोखरच सगळ्यांनाच चढल्या होत्या असे म्हटल्यास ते वावगे ठरू नये. मी  इथे ते लिहिण्यापेक्षा आणि तुम्ही वाचण्यापेक्षा प्रत्यक्ष ऐकून झिंगण्यातच खरी मौज  आहे. &lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;em&gt;होठों से छू लो तुम&lt;/em&gt;, &lt;em&gt;तुम इतना जो मुस्करा रहे हो&lt;/em&gt;, &lt;em&gt;वो कागज़ की  कष्टी वो बारिश का पानी &lt;/em&gt;या 'टिपिकल' जगजीत गज़लासुद्धा झाल्या. मात्र त्यातले  माझ्या आवडीचे काही शेर त्याने न गायल्याने मी ज़रा खट्टू झालो (पण जरासाच! ः) )  काही गज़लांची चित्रपटीय आवृत्ती आणि प्रत्यक्ष मैफ़िलीतील आवृत्ती यांतला फ़रकसुद्धा  ज़ाणवत होता, पण चित्रपट संगीताला मिळणारी आधुनिक तंत्रज्ञानाची ज़ोड, एकूणच गाण्याचे  संदर्भ, गरज़ यांनुसार ती आवृत्ती,ते गाणे घडत असते. प्रत्यक्ष मैफ़िलीची गोष्टच काही  वेगळी असते आणि मजा और असते. चित्रपटातील अशी काही गाणीच हृदयात घर करून राहिल्याने  ती प्रत्यक्षात मैफ़िलीत ऐकताना त्यांचा पुरेपूर आनंद लुटता येतोच असे नक्कीच नाही.  मात्र दोन्हींच्या संदर्भांतला फ़रक लक्षात घेता अशी मजा लुटणे तितकेसे कठीणही नसते  एव्हढे मात्र सांगू शकतो. खरे तर जगजीतची काही गाणी ही अतिशय सुमार दर्जांच्या  चित्रपटांमध्ये होती. गाणी लोकांच्या हृदयांत अज़ूनही आहेत, चित्रपट नक्कीच  नाहीत.&lt;/span&gt;   &lt;/p&gt; &lt;p align="left"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;गाताना ध्वनीनियंत्रकांना आणि वादक साथीदारांना सूचना देणे,  'मॉनिटरमें बेस कम करो', 'सितार बढाओ' हे सगळेसगळे श्रोत्यांना सुखावून ज़ात होते.  गाण्याच्याच ज़ोडीला गाणे चालू असतानाच सितार-तबला, तबला-घुंगरू जुगलबंदी आणि बासरी,  सिंथेसाइझर, गिटार यांचे 'सोलो' आविष्कार ज़बरदस्त परिणाम साधून ज़ात होते आणि  अर्थातच टाळ्यांची बिदागी घेऊन जात होते. प्रामाणिकपणे आणि तितक्याच तन्मयतेने साथ  करणाऱ्या आपल्या या सगळ्या साथीदारांबद्दलचे प्रेम आणि कृतज्ञता जगजीत त्यांना आपली  कला सगळ्यांसमोर सादर करण्याची संधी देऊन व्यक्त करत होता, असेच मला वाटले. आणि  त्यातच या कलाकाराचे मोठेपण सामावले आहे.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p align="left"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;कार्यक्रमाच्या शेवटी नित्यनेमाचे आभार प्रदर्शन वगैरे झाले; आणि  कार्यक्रमाची सांगता होतानाच २५ मे सुद्धा उजाडला होता. प्रेक्षकांनी जगजीतबरोबर  छायाचित्र काढण्यासाठी रांग लावली होती; पण दैवाने यावेळी मला घरी झोपायला न्यायचे  ठरवले होते. मिणमिणत्या दिव्यांच्या उजेडात जगजीतचे एकेक गाणे असे काही सुखावून  गेले होते की मला माझ्या वाढदिवसाची अमूल्य आणि अविस्मरणीय भेट मिळाली होती.  कार्यक्रमाला एकटाच होतो आणि कदाचित त्यामुळेच एकाग्र चित्ताने गाणी आणि गज़ला ऐकता  आल्या, ज़गता आल्या. माझ्या कानांनी ज़े ऐकले, डोळ्यांनी ज़े पाहिले, ते तुमच्या मनात  पोचवण्यासाठी हा वृत्तांताचा खटाटोप. मध्यंतरातले थंडगार बटाटवडे आणि कोल्ड्रिंकवर  वाया गेलेल्या वेळ आणि पैशाची काही किंमतच उरली नव्हती. घरी आल्यावर  सर्वसाक्षीकाकांचे सुंदर शुभेच्छापत्र आणि ज़ोडीला मनोगतींच्या शुभेच्छा ही आणखी एक  भेट! त्यामुळे जगजीतचे हेच शब्द नव्याने ज़गायला मिळाले - &lt;/span&gt;&lt;/p&gt; &lt;p align="center"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;em&gt;मुझको कदम कदम पे भटकने दो वाइज़ों&lt;br /&gt;तुम अपना कारोबार करो,मैं  नशे में हूं&lt;/em&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/20108582-114874388257189865?l=meeakshay.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://meeakshay.blogspot.com/feeds/114874388257189865/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=20108582&amp;postID=114874388257189865' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/20108582/posts/default/114874388257189865'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/20108582/posts/default/114874388257189865'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://meeakshay.blogspot.com/2006/05/blog-post_27.html' title='वाढदिवसाची अमूल्य भेट!'/><author><name>Chakrapani</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06931612066464984955</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-20108582.post-114732783245418232</id><published>2006-05-11T00:04:00.000-05:00</published><updated>2006-11-10T20:30:52.803-05:00</updated><title type='text'>पुस्तकनिष्ठांची मांदियाळी</title><content type='html'>&lt;span style="font-size:130%;"&gt;टॅगिंगचा खेळ कदाचित आपल्याला माहीत असेल. एखाद्या विषयाशी संबंधित प्रश्नांची आपण उत्तरे द्यायची आणि आपल्या परिचितांना/मित्रांना तेच प्रश्न विचारून त्यांची या संदर्भातील मते जाणून घ्यायची आणि त्यांनी हीच साखळी पुढे चालवायची असे या खेळाचे स्वरूप आहे. बुक-टॅगिंग हा त्यातला माझा एक आवडता प्रकार. हाच उपक्रम मराठी ब्लॉगविश्वातही राबवावा, या हेतूने हा लेखप्रपंच. &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;ज्याने हा खेळ चालू केला तो माझा मित्र नंदन होडावडेकर याचे या निमित्ताने पुन्हा एकदा आभार आणि त्याच्या मराठी जगण्याच्या नि जगवायच्या या प्रयत्नांमध्ये माझे खारूताईचे योगदान.&lt;br /&gt;या खेळात अर्थात सर्वप्रथम महत्त्वाचे आहे ते आपले सहकार्य. पुस्तकांविषयी विचारलेल्या काही प्रश्नांची कृपया यथामती उत्तरे आपापल्या ब्लॉगवर लेख (पोस्ट) लिहून द्यावीत आणि शक्य झाल्यास तुमच्या परिचित/अपरिचित मराठी भाषक ब्लॉगर्सना (३ ते ५) हेच प्रश्न विचारावेत. सध्या मराठी अनुदिनीकारांची संख्या &lt;/span&gt;&lt;a href="http://marathiblogs.net/"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;२०० च्या पुढे &lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;गेली असल्याने ही साखळी बरीच वाढू शकेल, नवीन पुस्तकांच्या आणि ब्लॉगर्सच्या ओळखी होतील आणि छोट्याशा प्रमाणावर का होईना, माहितीच्या या महाजालात मराठी पुस्तकनिष्ठांची एक मांदियाळी तयार होईल.&lt;br /&gt;असो, नियमांत अधिक वेळ न घालवता मी माझ्यापासून प्रश्नांची उत्तरे देण्यास सुरुवात करतो&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;१. सध्या वाचनात असलेले/शेवटचे वाचलेले वा विकत घेतलेले मराठी पुस्तक -&lt;br /&gt;'लज्जा'&lt;br /&gt;मूळ लेखिकाः तस्लीमा नसरीन&lt;br /&gt;मराठी अनुवादः लीला सोहनी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;२. वाचले असल्यास त्यावर थोडक्यात माहिती -&lt;br /&gt;बांगलादेशच्या स्वातंत्राच्या वेळी तेथे उसळलेल्या जातीयवादी हिंसाचाराचे आणि तेथील हिंदूंच्या मनातील दहशतीचे,त्यांच्या हलाखीच्या परिस्थितीचे आणि त्यापेक्षाही महत्त्वाचे म्हणजे, आदर्शवाद विरुद्ध व्यवहारी वृत्ती या झुंजीचे सुंदर चित्रण केलेले हे पुस्तक. आणि ते केले गेले आहे ते एका हिंदू बंगाली कुटुंबाला केंद्रस्थानी ठेवून. प्राण गेला तरी बांगलादेश ही मातृभूमी असल्याने तिला सोडून ज़ाणे ज़मणार नाही या आदर्शवादाला प्राणपणाने ज़पणारे या कुटुंबातील ज्येष्ठ पुरुष सुधामयबाबू दत्त, त्यांचा बेरोज़गार पण तरीही वडिलांप्रमाणेच कणखर,जिद्दी/हट्टी मुलगा सुरंजन, हट्टी मुलाच्या जिद्दीला कंटाळून नि परिस्थितीच्या हातात स्वतःला सोपवून आला दिवस आज़ारी नवऱ्याच्या सेवेत निष्ठापूर्वक व्यतीत करणारी त्याची आई किरण्मयी आणि सुरंजनची धाकटी बहीण माया असे हे कुटुंब. मायाचे जहांगिर नावाच्या एका मुस्लिम युवकाबरोबर प्रेमसंबंध आहेत, जो सुरंजनचा मित्र आहे. जातीयवादी दंगलींच्या पार्श्वभूमीवर हे प्रेमसंबंध, आणि एकूणच या कुटुंबाचे शेजारपाजारच्या मुस्लिम कुटुंबांशी असलेले पूर्वीचे सलोख्याचे संबंध, सद्य परिस्थितीच्या पार्श्वभूमीवर त्यांच्यात झालेले बदल/स्थित्यंतरे, प्रत्येक व्यक्तिरेखेच्या मनातील विचारांची वादळे, त्यांची स्वतःशीच होत असलेली भांडणे, स्वतःचीच समज़ूत काढणे, त्याचबरोबर आपल्या प्रिय मुला-मुलीबाबत, आई-बाबांबाबत वाटणारी काळजी आणि प्रेम या सगळ्याचे परिणामकारक चित्रण करणारे सुंदर, सजीव, छोटे-मोठे प्रसंग हे या पुस्तकाचे वैशिष्ट्य म्हणता येईल. माया घरातून गायब होणे, तिच्यावरील बलात्काराच्या बातमीने हादरलेले दत्त कुटुंब आणि त्यातूनच उद्विग्न झालेल्या सुरंजनने एका वेश्येला घरी बोलावून तिच्यावर 'बलात्कार' करून अघोरी सूड उगवण्याचा अन् आत्मसमाधान शोधण्याचा केलेला अनाकलनीय प्रयत्न, अखेर परिस्थितीला शरण जाऊन मोडून पडलेला सुधामयबाबूंचा आदर्शवाद आणि दत्त कुटुंबाची बांगलादेश सोडून ज़ाण्याची तयारी हा कथेचा नि पुस्तकाचा शेवट.&lt;br /&gt;छोटे-मोठे पण तरीही महत्त्वाचे प्रसंग जिवंत करणारी, व्यक्तिरेखेच्या मनाचे बारीकसारीक पैलू उलगडून दाखवणारी लेखनशैली. सहज आणि प्रवाही अनुवाद. पण दंगलीतल्या आर्थिक आणि मनुष्यहानीची कल्पना देणारी आकडेवारी, वर्तमानपत्रातल्या वास्तववादी तसेच अतिरंजित बातम्या ही पुस्तकाच्या आणि लेखनाच्या सौंदर्याला नि परिणामकारकतेला काहीसे गालबोट लावते असे माझे मत आहे. निर्घृण कृत्यांची, मानसिक हानीची आणि अनुभवांची तुलना आणि मोजदाद आकडेवारीने करता येत नाही. अनुभवांनी पोळलेली माणसे आकडेवारीच्या पलीकडची असतात हेच खरे नाही का!&lt;br /&gt;मूळ लेखिका तस्लीमाबाईंना या पुस्तकाबद्दल बरेच पुरस्कार मिळाले असून बांगलादेशातील कट्टरपंथियांच्या रोषासही त्यांना सामोरे जावे लागले आहे. त्यांची हत्या करणाऱ्यास या मूलतत्त्ववादी, धर्मांध संघटनांकडून खास पारितोषिक जाहीर करण्यात आल्याचेही सर्वश्रुत आहे.&lt;br /&gt;अनुवादिका लीलाताई सोहनी यांनाही या अनुवादासाठी महाराष्ट्र शासनातर्फ़े विशेष पुरस्काराने सन्मानित करण्यात आहे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;३. अतिशय आवडणारी/प्रभाव पाडणारी ५ मराठी पुस्तके -&lt;br /&gt;तशी बरीच आहेत जसे श्रीमान योगी, स्वामी, मृत्यंजय, पु. ल. ची बहुतेक सगळी पुस्तके, भा. रा. भागवतांचे बालसाहित्य इ. पण चाकोरीबद्ध नसलेली किंवा वेगळी पण तरीही प्रभावी वाटलेली अशी म्हणजे -&lt;br /&gt;महात्म्याची अखेर - जगन फडणीस&lt;br /&gt;झुलवा - उत्तम बंडू तुपे&lt;br /&gt;हिटलर - वि. स. वाळिंबे&lt;br /&gt;एक होता कार्व्हर - वीणा गवाणकर&lt;br /&gt;बनगरवाडी - व्यंकटेश माडगूळकर&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;४. अद्याप वाचायची आहेत, अशी ५ मराठी पुस्तके-&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;भावार्थदीपिका - संत ज्ञानेश्वर&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;गीतारहस्य - लोकमान्य बाळ गंगाधर टिळक&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;स्मृति-चित्रें - लक्ष्मीबाई टिळक&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;गारंबीचा बापू - श्री. ना. पेंडसे&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;ययाती - वि‌. स. खांडेकर&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;५. एका प्रिय पुस्तकाविषयी थोडेसे -&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;'कोल्हाट्याचं पोर' हे डॉ. किशोर शांताबाई काळे यांचे पुस्तक खूप आवडले. कोल्हाटी समाजातल्या लोकांचे हलाखीचे जीवन, त्यांना येणाऱ्या अडीअडचणी, निकृष्ट सामाजिक दर्जा नि वास्तववादी जगाशी दूरान्वयानंही नसलेला संबंध, पण तरीही किशोररावांसारख्या काही नवोदितांची जिद्द, जगण्यावरचे प्रेम,पुरोगामी विचार यांमुळे या समाजाला दिसलेले प्रगतीचे नवकिरण या सगळ्याचे चित्रण, किशोररावांची त्यांच्या आईसाठीची भक्ती, प्रेम आणि मानसिक गुंतवणूक यांचे चित्रण हे खरोखरच वाचनीय आहे.&lt;br /&gt;किशोररावांनी एका बक्षीस समारंभाच्या वेळी सांगितलेले त्यांचे अनुभव जेव्हा त्यांच्याच हातून बक्षीसरुपात मिळालेल्या पुस्तकातून, त्यांच्याच शब्दांत जिवंतपणे अनुभवायला मिळाले तेव्हा त्या बक्षीसाचे खरे मोल कळले असे म्हणावयास हरकत नाही.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;हा खेळ पुढे चालू ठेवण्यासाठी पुढील ५ खेळाडूंची निवड करण्याची प्रक्रिया माझ्यातर्फ़े सध्या चालू असून येत्या आठवड्यात ती पूर्ण होईल अशी आशा आहे. तेव्हा फिरून इथे चक्कर टाकण्याचे आमंत्रण आगाऊच देऊन ठेवतो ः)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;मी निवडलेली पहिली खेळाडू: &lt;a href="http://pandharyavarachekale.wordpress.com/"&gt;राधिका&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;मी निवडलेली दुसरी खेळाडू: &lt;a href="http://pustakayan.blogspot.com/"&gt;अदिती&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/20108582-114732783245418232?l=meeakshay.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://meeakshay.blogspot.com/feeds/114732783245418232/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=20108582&amp;postID=114732783245418232' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/20108582/posts/default/114732783245418232'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/20108582/posts/default/114732783245418232'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://meeakshay.blogspot.com/2006/05/blog-post.html' title='पुस्तकनिष्ठांची मांदियाळी'/><author><name>Chakrapani</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06931612066464984955</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-20108582.post-114288514819968213</id><published>2006-03-20T15:04:00.001-05:00</published><updated>2009-05-15T13:36:17.197-05:00</updated><title type='text'>माझा आवडता ऋतू</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://photos1.blogger.com/blogger/7530/2003/1600/ShowLetter4.1.1.jpg"&gt;&lt;img style="margin: 0px auto 10px; display: block; text-align: center; cursor: pointer;" src="http://photos1.blogger.com/blogger/7530/2003/400/ShowLetter4.1.0.jpg" alt="" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="content"&gt;&lt;div style="text-align: left;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;मी लुटलेल्या विचारांच्या सोन्यापैकी असलेलं हे आपट्याचं एक पान-&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="center"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;दिवसांमागुनी दिवस संपले,&lt;br /&gt;ऋतूंमागुनी ऋतू,&lt;br /&gt;जिवलगा, कधी रे येशील तू?&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;गाणं नेहमीचंच. तुमच्या, माझ्या, सगळ्यांच्या ओळखीचं. पण आज मात्र ते गुणगुणताना कुणासाठी तरी आसुसण्यापेक्षा, जिवलगाची वाट बघण्यापेक्षा, येणाऱ्या नवीन ऋतूलाच 'कधी रे येशील तू' असं विचारावसं वाटतंय. ऋतूचक्रातून अनंत आवर्तनं गाणाऱ्या निसर्गराजाचा नवीन रंग बघण्याची हुरहूर लागून राहिलीये. होलिकोत्सवाच्या समाप्तीनंतर लागलेत वसंताचे वेध. करड्या, सुकलेल्या वृक्षवेलींच्या अंगाखांद्यावर डवरलेली पांढरी-पिवळी फुलं, बोचऱ्या थंडीचा त्रास कमी करणारी सोनेरी ऊब, आपल्या जोडीदारास साद घालणारा कोकीळ, या सगळ्यांसाठी जीव वेडावलाय. पण सगळी दुनिया वसंताच्या स्वागतासाठी सज्ज झाली असताना मी मात्र माझा आवडता ऋतू कोणता, या एकाच प्रश्नाचं उत्तर देण्याच्या प्रयत्नांत.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;आणि या प्रश्नाचं उत्तरसुद्धा किती फसवं आहे पहा. वसंताचं नाव घ्यावं, तर मनात पावसाच्या सरी थैमान घालणार. त्या झेलून चिंब भिजायचं ठरवलं, तर घोंघावणारा वारा नि बोचरी थंडी, अंगणतली शेकोटी, तिच्याभोवती फेर धरून गायलेली गाणी हिवाळ्याचं नाव पुढे करणार. बरं, पर्याय तर मर्यादित आहेत, आणि फ़िफ़्टी-फ़िफ़्टी, ऑडिअन्स पोल किंवा फ़ोन-अ-फ़्रेंडची जीवनरेखासुद्धा कामाची नाही. या कोड्याचं उत्तर दिलं तर बक्षीस म्हणून एक करोड रुपयेसुद्धा कमी पडावेत अशी अवस्था. पण त्याच वेळी, उत्तर शोधल्याशिवाय स्वस्थ न बसण्याची खुमखुमीसुद्धा. त्यातच हे निबंधलेखनाचं निमित्त.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;माझा आवडता ऋतू शोधण्याच्या प्रयत्नांत आजतागायतच्या बावीस वर्षांच्या या आयुष्यरुपी चित्रपटाची रिळं रिवाइंड करून पहावीत, तर दिसतो 'बालपणीचा काळ सुखाचा'. कोणीही येऊन गोबरे गालगुच्चे घेऊन जावं, नि आपण मात्र टकाटका बघत बसावं; मध्येच गोड हसून सगळ्यांची शाबासकी मिळवावी, आणि कुणी लाडानं कडेवर घेतलंच, तर बिनदिक्कत आपल्या प्रेमानं त्याला किंवा तिला भिजवून वर साळसूदपणे गळा काढावा. आयुष्यातला वसंतच तो जणू. आईनं घेतलेला अभ्यास, बाबांकडून झाडूनं खाल्लेला मार, शाळेतल्या बाईंचे चुका केल्यावर दटावणारे डोळे, पण त्याचबरोबर परीक्षेत पहिला नंबर आल्यावर याच सगळ्यांनी मला डोक्यावर घेऊन नाचणं. शाळेपासून आजपर्यंत नेहमीच बरोबर राहिलेले मित्रमैत्रिणी, आलेले अनुभव आणि झालेले संस्कार यांनी रुजवलेलं आजचं तरुणपण. बालपणीचे ते नानाविध रंग, त्या सोनेरी दिवसांची अजूनही जाणवणारी ऊब आणि त्या वसंतानं दिलेली आजच्या ग्रीष्माची नि पुढच्या पावसाळ्याची नि हिवाळ्याची वर्दी.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;आज हाच वसंत मला पावसासारखं भिजवून टाकतोय. आठवणींच्या सरींमध्ये चिंब झाल्यानंतर दरवळणाऱ्या तारुण्याच्या सुगंधाचा गोडवा आज जास्त मोहक वाटतोय. आयुष्याच्या या टप्प्यावर सगळेच ऋतू आपापला ठसा उमटवू पाहताहेत. आजपर्यंत मिळवलेलं यश, उद्याबद्दलच्या अपेक्षा नि स्वप्नं या सगळ्यांबरोबरच जाणीव होतेय ती नवीन जबाबदाऱ्यांची आणि पार पाडाव्या लागणाऱ्या नवीन भूमिकांची. जे मिळवलं ते टिकवायचं आणि ते टिकवतानाच नवीन काहीतरी मिळवायचं असे दुहेरी चटके देणारा ग्रीष्मसुद्धा आजच अनुभवायला मिळतोय. आणि तो सुद्धा आठवणींच्या पागोळ्यांवरून टपटपणाऱ्या बालपणीच्या रंगीबेरंगी वसंताचा पाऊस अंगावर झेलताना. म्हणजे या तारुण्याला पुढच्या आयुष्याची वर्दी देणारा नि गत आयुष्याचे रंग नव्याने उलगडून दाखवणारा वसंत समजावं, जबाबदारी नि स्पर्धेच्या रणरणत्या उन्हात घाम गाळायला लावणारा ग्रीष्म समजावं, की आषाढसरींनी जन्माला घातलेल्या, मनात खळखळणाऱ्या विचारांच्या धबधब्यांनी कानात दडे बसवणारा पाऊस समजावं, हे कळेनासं होऊन गेलंय.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;तारुण्याच्या या पावसाळ्यातच लपलाय गृहस्थाश्रमाचा हिवाळा. काही वर्षं अनुभवलेली कुणाच्यातरी प्रेमाची ऊब, आणि ती हरवल्यावर चोरपावलांनी आलेली मनातली पानगळ. चार-सहा वर्षांत आजचा पावसाळा संपलेला कळणारही नाही; आणि नोकरीधंदा, संसार, रोजचं नऊ ते पाच, मुलंबाळं हे सगळं झोंबायला लागेल. आजवर जे काही शिकायला नि अनुभवायला मिळालं, त्याचेच स्वेटर्स, मफ़लर्स विणून तेव्हा वापरायचेत. हीच त्यावेळची शेकोटी असणार आहे हे आज कळतंय. अनंतात कुठेतरी लपलेल्या होळीत स्वतःला झोकून दिलं नि पानगळीतल्या तपकिरी-पिवळ्या पानासारखं हळुवार तरंगत गळून पडलं की मगच आयुष्याचं हे ऋतूचक्र पूर्ण होईल याची जाणीव करून देणारा हिवाळासुद्धा ऐन उमेदीच्या काळात जाणवतोय खरा. आणि म्हणूनच कालच्या बालपणीचा वसंत नि उद्याच्या उरलेल्या आयुष्याचा हिवाळा यांत सँडविच झालेलं सगळे ऋतू सामावलेलं माझं आजचं तारुण्य हा माझा आवडता ऋतू. विचारांची बैठक, तर्कसंगती, निबंधाची शब्दसंख्या नि मांडणी इत्यादी मोजपट्ट्या हा ऋतू अनुभवायला, त्यातला आनंद लुटायला (की मोजायला?) कामाच्या नाहीत. हा आनंद पोटभर पिऊन घेणं, डोळे भरून साठवून घेणं हेच या ऋतूचं बिनव्याजी कर्ज - परतफेडीची यत्किंचितही अपेक्षा न ठेवलेलं. मनातल्या प्रत्येक कोपऱ्याची, जीवनातल्या प्रत्येक सेकंदाची या ऋतूत केलेली गुंतवणूक मात्र महत्त्वाची आहे.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;माझा आवडता ऋतू कोणता या प्रश्नाचं उत्तर शोधण्याची आता गरज उरलेली नाही. या निबंधातूनच मला माझं उत्तर मिळालंय. किंबहुना माझ्या सदाबहार, तरुण मनानं ते आपल्याआपणच हुडकून काढलंय. कदाचित आयुष्यभर 'अजून यौवनात मी' गाण्यासाठीच. What about you?&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/20108582-114288514819968213?l=meeakshay.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://meeakshay.blogspot.com/feeds/114288514819968213/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=20108582&amp;postID=114288514819968213' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/20108582/posts/default/114288514819968213'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/20108582/posts/default/114288514819968213'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://meeakshay.blogspot.com/2006/03/blog-post.html' title='माझा आवडता ऋतू'/><author><name>Chakrapani</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06931612066464984955</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry></feed>
